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अपनी घरेलू जिंदगी से परेशान थे मुंशी प्रेमचंद (पुण्यतिथि विशेष)

आरती यादव, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 8 , 2017 , 12:35 IST | नई दिल्ली

रविवार को भारत के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंदजी की पुण्यतिथि है। प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। दु:खों और संघर्ष का सिलसिला प्रेमचंदजी के जन्म के साथ ही शुरू हो गया था। कम उम्र में ही माता के देहांत के बाद पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेली माता ने कभी प्रेमचंद को मातृत्व स्नेह नहीं दिया। पिता ने भी प्रेमचंद जी के ऊपर ध्यान नहीं दिया।

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प्रेमचंद जी का अपनी निजी जीवन भी काफी उथल-पुथल भरा रहा। पिता ने महज 15 वर्ष की उम्र में उनकी इच्छा के विपरीत उनका ब्याह कर दिया था। पत्नी झगड़ालू और कुरूप थी, किंतु पिता ने अमीरी देखकर यह विवाह करवा दिया था। उन्होंने इस दुखद अनुभव के बारे में खुद लिखा है, 'उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया। उसके साथ-साथ जबान की भी मीठी न थी।' उन्होंने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है, 'पिताजी ने जीवन के अंतिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया। मेरी शादी बिना सोचे समझे कर डाली।' हालांकि उनके पिताजी को भी बाद में इसका अहसास हुआ और काफी अफसोस किया।

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प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी जुड़ने के पीछे भी एक कहानी है। शुरू में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परंपरा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़ने की यही वजह रही। 

मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य रचना की दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बनाया। उन्होंने भले ही यूरोपीय ढांचे का साहित्य रचना में इस्तेमाल किया हो लेकिन उसकी छाया अपनी रचनाओं पर पड़ने नहीं दी। उक्त ढांचे में भारतीय आत्मा का स्पंदन कायम रख पाना सिर्फ प्रेमचंद के बूते की ही बात थी। प्रेमचंद ने शुरुआती सभी उपन्यास उर्दू में लिखे जिनका बाद में हिंदी में अनुवाद हुआ। 1918 में 'सेवासदन' उनका हिंदी में लिखा पहला उपन्यास था। इस उपन्यास को उन्होंने पहले 'बाज़ारे हुस्न' नाम से उर्दू में लिखा लेकिन हिंदी में इसका अनुवाद 'सेवासदन' के रूप में प्रकाशित हुआ।

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प्रेमचंद का रचना संसार बहुत बड़ा और समृद्ध है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, उपन्यास, लेख, आलोचना, संस्मरण, संपादकीय जैसी अनेक विधाओं में साहित्य का सृजन किया है। उन्होंने कुल 300 से ज़्यादा कहानियां, 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें लिखीं। इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है।

इसके बाद 1921 में किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में 'प्रेमाश्रम' किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का शायद पहला उपन्‍यास है। फिर 'रंगभूमि', 'कायाकल्प', 'निर्मला', 'गबन', 'कर्मभूमि' से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका यह सफर 1936 में 'गोदान' के उफ़क तक पहुंचा।

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प्रेमचंद के उपन्यासों में 'गोदान' सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। गोदान पढ़कर महसूस होता है कि किसान का जीवन सिर्फ़ खेती से जुड़ा हुआ नहीं होता। उसमें सूदखोर जैसे पुराने ज़माने की संस्थाएं तो हैं ही नए ज़माने की पुलिस, अदालत जैसी संस्थाएं भी हैं। यह सब मिलकर होरी की जान लेती हैं। होरी की मृत्‍यु पाठकों के ज़हन को झकझोर कर रख देती है। गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था। उनकी आख़िरी दौर की कहानियों में भी ये देखा जा सकता है। जीवन के आख़िरी दिनों में वे उपन्यास मंगलसूत्र लिख रहे थे जिसे वे पूरा नहीं कर सके। लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 में उन्होंने आख़िरी सांसें लीं। 

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