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निजता का अधिकार संपूर्ण नहीं, सरकार ने SC में रखा पक्ष

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 26 , 2017 , 17:28 IST | नई दिल्ली

निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। निजता के अधिकार पर याचिकाकर्ताओं की दलील पूरी होने के बाद अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सरकार का पक्ष रखा है।
सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी, 'संविधान में निजता के अधिकार को भी मूल अधिकार का दर्जा दिया जा सकता था, पर इसे संविधान निर्माताओं ने जान बूझकर छोड़ दिया। उन्होंने कहा, 'इसलिए आर्टिकल 21 के तहत जीने या स्वतन्त्रता का अधिकार भी अधिकार नही है, अगर यह सम्पूर्ण अधिकार होता तो फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं होता। यह अपने आप में मूल सिद्धांत है।

आधार योजना लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए

सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने आगे दलील दी कि इस देश में करोड़ों लोग फुटपाथ पर और झुग्गी में रहने को मजबूर हैं। आधार जैसी योजना इनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए लाई गई है। महज कुछ लोगों के निजता के अधिकार की दुहाई देने से एक बड़ी आबादी को उनकी बुनियादी जरूरतों से वंचित नहीं किया जा सकता। इस पर बेंच के एक जज ने टिप्पणी कि निजता का अधिकार सिर्फ अमीरों के लिए नहीं है ये सबके लिए है।

Venugopal

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि,

बिना कानून स्थापित तरीकों को अमल में लाए किसी व्यक्ति से ज़मीन, सम्पति और जिंदगी नहीं ली जा सकती है। लेकिन पर कानून सम्मत तरीकों से ऐसा किया जा सकता हैं। ऐसे में यह अधिकार सम्पूर्ण अधिकार नहीं हैं, इन अधिकार पर प्रतिबन्ध लागू होते हैं

बायोमैट्रिक से नहीं होता मूल अधिकार का हनन

वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि,

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट भी यह तस्दीक करती है कि हर विकासशील देश में आधार कार्ड जैसी योजना होनी चाहिये। कोई शख्स यह दावा नहीं कर सकता कि उसके बायोमेट्रिक रिकॉर्ड लेने से मूल अधिकार का हनन हो रहा है

इन लोगों ने दायर की है याचिका

यूनिक आइडेंटफिकेशन नंबर या आधार कार्ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। ये याचिकाएं हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पुट्टास्वामी, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की चेयरपर्सन शांता सिन्हा, रिटायर्ड मेजर जनरल एस जी वोम्बातकरे, दलित अधिकार कार्यकर्ता बेज़वाड़ा विल्सन समेत कई जाने-माने लोगों ने दाखिल की हैं। इन याचिकाओं में सबसे अहम दलील है आधार से निजता के अधिकार के हनन की।

Biometric

याचिकाकर्ताओं ने आधार के लिए बायोमेट्रिक जानकारी लेने को निजता का हनन बताया है। जबकि सरकार की दलील है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच सबसे पहले इस बात पर सुनवाई कर रही है कि निजता का अधिकाई मौलिक अधिकार है या नहीं।

9 जजों की बेंच क्यों

इसकी वजह 50 और 60 के दशक में आए सुप्रीम कोर्ट के 2 पुराने फैसले हैं. एम पी शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट के 8 जजों की बेंच ये कह चुकी है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। खड़क सिंह मामले में 6 जजों की बेंच का भी यही निष्कर्ष था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट की ही छोटी बेंचों ने कई मामलों में निजता को मौलिक अधिकार बताया। इसलिए 9 जजों की बेंच अब पूरे मसले पर विचार कर रही है।

याचिकाकर्ताओं की दलील

गोविन्द बनाम मध्य प्रदेश, राजगोपाल बनाम तमिलनाडू जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की ही छोटी बेंचों ने निजता को मौलिक अधिकार माना है। 1978 में मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच ने सम्मान से जीने को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना है। इस लिहाज से भी निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत माना जाएगा।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम, श्याम दीवान, अरविंद दातार और सोली सोराबजी ने जिरह की है। सुब्रमण्यम ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 को अगर एक साथ देखा जाए तो नागरिक के मौलिक अधिकारों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। अगर ये कहा जाए कि निजता कोई अधिकार नहीं है तो ये बेमतलब होगा।

श्याम दीवान की दलील थी कि,

मेरी आँख और फिंगर प्रिंट मेरी निजी संपत्ति हैं। मुझे इनकी जानकारी किसी को देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सरकार को भी ये जानकारी लेने का हक नहीं है

सोली सोराबजी का इस मसले पर क्या है कहना

सोली सोराबजी ने कहा, “निजता के अधिकार का ज़िक्र संविधान में नहीं होने से कोई असर नहीं पड़ता। संविधान से लोगों को मिले अधिकारों को देखें तो कोर्ट ये आसानी से कह सकती है कि निजता एक मौलिक अधिकार है। ठीक वैसे ही जैसे प्रेस की आज़ादी का अलग से ज़िक्र नहीं है। लेकिन इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा माना जाता है।

 

 


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