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'भारत का रहने वाला हूं...भारत की बात सुनाता हूं', जानें मनोज कुमार की कहानी (जन्मदिन विशेष)

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 24 , 2017 , 09:00 IST | मुंबई

आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के भारत कुमार यानी एक्टर मनोज कुमार 80 साल के हो चुके हैं। मनोज कुमार यानी हरिकिशन गिरी गोस्वामी। जी हां, यही था मनोज कुमार के बचपन का नाम।  मनोज कुमार के नाम के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य है। दरअसल मनोज कुमार अपने जवानी के दिनों में दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक हुआ करते थे। जब 1949 में दिलीप साहब की फिल्म शबनम आई तो फिल्म देखने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल कर हरिकिशन गिरी से मनोज कुमार रख लिया। क्योंकि फिल्म में दिलीप कुमार के किरदार का नाम मनोज कुमार था।

मनोज कुमार भारतीय सिनेमा के एक अवॉर्ड विनिंग अभिनेता और निर्देशक हैं। पाकिस्तान के एबटाबाद में 24 जुलाई 1937 को मनोज कुमार का जन्म हुआ। भारत पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान उनका परिवार पाकिस्तान को छोड़कर दिल्ली आ गया। उस समय मनोज कुमार की उम्र दस वर्ष थी और उनका परिवार किंग्स्वे कैंप दिल्ली में एक शरणार्थी के तौर पर रहा करता था। यह जगह बाद में दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर एरिया के नाम से पहचाना जाने लगा।

बचपन के दिनों में मनोज ने दिलीप कुमार की 'शबनम' देखी थी। फिल्म में दिलीप कुमार के निभाए किरदार से मनोज इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने भी फिल्म अभिनेता बनने का फैसला कर लिया। मनोज कुमार को उनकी देशभक्ति फिल्‍मों के लिए जाना जाता है। इसी के चलते उन्‍हें लोग भारत कुमार भी कहने लगे।

शिक्षा

मनोज कुमार परिवार सहित दिल्ली में रह रहे थे और यहीं उनकी शिक्षा भी पूरी हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘हिंदू कॉलेज’ से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद मनोज ने फिल्म इंडस्ट्री में जाने का मन बना लिया।

निजी जीवन

कुमार ने हरियाणा के सिरसा जिले की शशि गोस्वामी से विवाह किया। उनके दो बेटे हैं, पहला विशाल और दूसरा कुणाल। विशाल ने बॉलीवुड में एक गायक के तौर पर तथा कुणाल ने एक्टर के तौर पर अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन दोनों ही इंडस्ट्री में कदम नहीं जमा पाए।


फिल्मी करियर

मनोज कुमार ने 1957 में बनी फिल्म ‘फैशन’ के जरिए हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया। इस फिल्म में उन्हें एक बहुत छोटा भिखारी का रोल मिला था। 1960 में आई फिल्म ‘कांच की गुड़िया’ में मनोज कुमार को पहली बार मुख्य भूमिका में लिया गया। इस फिल्म में वह सईदा खान के साथ दिखाई पड़े।

पहली ही फिल्म के बाद मनोज कुमार को इतना पसंद किया गया कि उन्हें लगातार कई फिल्मों में देखा गया। इनमें ‘हरियाली और रास्ता’ में वह माला सेन के साथ दिखाई दिए।

राज खोसला की 1964 में आई फिल्म ‘वो कौन थी?’ में साधना के साथ लीड रोल में दिखे। राज खोसला द्वारा निर्देशित ‘दो बदन’ में मनोज कुमार और आशा पारेख की बेहतरीन जोड़ी को कौन भूल सकता है।

1960 के दशक में उनकी रोमांटिक फिल्मों में ‘हनीमून’, ‘अपना बना के देखो’, ‘नकली नवाब’, ‘पत्थर के सनम’, ‘साजन’, ‘सावन की घटा’ और इनके अलावा सामाजिक परिवेश से जुड़ी फिल्मों में ‘शादी’, ‘गृहस्थी’, ‘अपने हुए पराये’, ‘पहचान’ ‘आदमी’ और ‘गुमनाम’, ‘अनीता’ और ‘वो कौन थी?’ जैसी थ्रिलर फिल्में शामिल थीं।


1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री ने उनसे 'जय जवान, जय किसान' नारे पर एक फिल्‍म बनाने के लिए कहा था। इसी का नतीजा 1967 में फिल्‍म 'उपकार' के रूप में सामने आया।

मनोज अपने करियर में सात फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किये गए हैं। इन सबके साथ ही फिल्म के क्षेत्र में मनोज के उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 2002 में पदमश्री पुरस्कार, वर्ष 2008 में स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार और वर्ष 2016 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

मनोज से जुड़े कुछ राज़

मनोज कुमार ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया कि जब अमिताभ बच्चन बॉलीवुड में लगातार हो रहीं अपनी नाकामयाबी से परेशान होकर वापस अपने घर जा रहे थे तब मनोज जी ने ही उन्हें रोका और अपनी फिल्म 'रोटी,कपड़ा और मकान' में अभिनय करने का मौका दिया। मनोज कुमार कहते है कि मुझे पूरा भरोसा था कि अमिताभ एक दिन बहुत बड़े अभिनेता बनेंगे।

मनोज कुमार ने बताया कि उनकी फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' में काम करने के लिए दिलीप कुमार ने अपनी पत्नी सायरा बानो को मनाया। इसके बाद उन्होंने दिलीप कुमार को अपनी फ़िल्म 'क्रांति' में कास्ट किया।

मनोज कुमार ने राज कपूर की बेहद चर्चित फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' में काम किया था।
मनोज कुमार कहते हैं, "जब मेरे क़रीबी दोस्तों जैसे राज कपूर, देव आनंद और प्राण की फ़िल्में टीवी पर आती हैं तो मैं चैनल बदल देता हूं क्योंकि उन कलाकारों की यादें मुझे रुला देती हैं।"

मनोज कुमार के अभिनय से प्रभावित होकर उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शस्त्री ने उन्हें फिल्म उपकार बनाने की प्रेरणा दी। इस फिल्म में मनोज कुमार ने एक भारत नाम के किसान का किरदार निभाया था। फिल्म का प्रसिद्ध गाना मेरे देश की धरती आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय है। इस फिल्म के लिए मनोज कुमार को फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरूस्कार भी मिला।

मनोज कुमार अपनी फिल्मी सफर से संतोष जाहिर करते हुए कहते है कि मैंने 40 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। मैं सिर्फ उन्हीं फिल्मों में अभिनय करता था जो मुझे विशेष लगती थीं।
मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए पैसों से ज्यादा नाम और लोगों के दिलो में जगह बनाई है। शायद यही कारण है कि आज भी मनोज कुमार को देशभक्ति प्रधान फिल्मों के लिए ही जाना जाता है।

क्रांति के बाद नहीं मिली सफलता

फिल्म ‘क्रांति’ के बाद मनोज कुमार का करियर ढालान पर आ गया और उनकी सभी फिल्में फ्लॉप साबित हुर्इं। ये फिल्म कुमार के करियर की आखिरी सफल फिल्मों में गिनी जाती है। इसके बाद उन्हें एक पंजाबी फिल्म ‘जाट पंजाबी’ में भी अभिनय करते देखा गया। 1995 में फिल्म ‘मैदान-ए-जंग’ के बाद उन्होंने फिल्में करनी बंद कर दीं। इसके बाद उनके बेटे कुणाल गोस्वामी ने 1999 में फिल्म ‘जयहिंद’ में उन्हें कास्ट किया। ये फिल्म भी फ्लाप रही, लेकिन इसी वर्ष कुमार को लाइफटाइम अचीवमेंट फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।

देखिये मनोज कुमार के सुपरहित गाने:


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