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...तो इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में बरी हो गए आरुषि के मम्मी-पापा। फैसले की 10 बातें

अमितेष युवराज सिंह, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 13 , 2017 , 14:26 IST | इलाहाबाद

देश के सबसे बड़े रहस्यमयी हत्याकांड में उम्र कैद का सज़ा काट रहे राजेश और नूपुर तलवार अब सभी आरोपों से मुक्त हो चुके हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरुषि के पिता राजेश और मां नूपुर को बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना है कि आरुषि को मम्मी-पापा ने नहीं मारा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई की विशेष अदालत के जज की तुलना गणित के अध्यापक और फिल्म निर्देशक से की। आपको बता दें कि सीबीआई की विशेष अदालत ने ही राजेश और नूपुर को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि तलवार दंपति को दोषी करार देने वाले जज ने न्याय की सामान्य प्रक्रिया से 'भटककर' काम किया। हाईकोर्ट के अपने फैसले में कहा कि "जज गणित के किसी अध्यापक की तरह काम नहीं कर सकते, जो किसी भी संख्या को फर्ज़ कर तुलनाओं से किसी गणितीय प्रश्न को हल कर रहा है। किसी फिल्म निर्देशक की तरह निचली अदालत के जज ने बेहद छितराए हुए तथ्यों के आधार पर गढ़ी गई कहानी पर ज़ोर दिया, लेकिन इस बात पर कतई ज़ोर नहीं दिया कि वास्तव में क्या हुआ था।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई स्पेशल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। साथ ही सीबीआई की थ्योरी को भी खारिज कर दिया। पुलिस की थ्योरी को भी सिरे से नकार दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की बड़ी बातें:

1.पहली बात कि तलवार दंपति को मर्डर करते हुए किसी ने नहीं देखा था, इसलिए उन्हें संदेह का लाभ मिला।

2.कोर्ट ने कहा, तलवार दंपति का हत्या के वक्त घर के अंदर होना उनके दोषी होने का सबूत नहीं है।

3.इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से आरोप साबित नहीं होता है।

4.परिस्थिति से पैदा हुए सबूतों की चेन सीबीआई साबित नहीं कर पाई, इनके साबित होने पर उन्हें दोषी करार दिया जा सकता था।

5.घटनाक्रम का तारतम्य इतना पुख्ता नहीं है कि दोनों को हत्या का दोषी ठहराया जा सके।

6.कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीआई ने अपनी जांच में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए।

7.जिस फ्लैट में हत्या हुई, उसमें किसी तीसरे व्यक्ति के होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। HC ने सीबीआई कोर्ट की इस थ्योरी को नहीं माना कि फ्लैट में किसी तीसरे व्यक्ति के आने की संभावना नहीं है, इसलिए हत्या तलवार दंपति ने ही की है।

8.हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित कानूनी सिद्धान्तों के मुताबिक तलवार दंपति का केस संदेह का लाभ देने के लिहाज से सही केस है क्योंकि जिन मामलों का आधार परिस्थितिजन्य सबूत होते हैं, आरोपी संदेह के लाभ का हकदार होता है।

9.हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई कोर्ट ने साक्ष्यों और केस की परिस्थितियों को स्वीकार किया और गणित का सवाल हल करने की तरह नतीजे तक पहुंच गए। असल में यहां-वहां बिखरे तथ्यों को एक कड़ी में पिरोया, फिर विचार किया कि वास्तव में क्या हुआ। और इस तरह का निर्णय दे दिया गया।

10.हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जिन्हें परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना, वह असल में 'कल्पना' साबित हुए। आरुषि और हेमराज के मर्डर के समय सिर्फ तलवार दंपति ही घर में थे, इसी बिनाह पर पेश परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को स्वीकार करके जजमेंट दे दिया गया।

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गुरुवार को अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई यह साबित करने में नाकाम रही कि तलवार दंपति ने ही अपनी बेटी का कत्ल किया, तथा निचली अदालत के जज द्वारा निकाला गया निष्कर्ष 'गैरकानूनी और विकृत' था, क्योंकि अदालत ने रिकॉर्ड किए गए सबूतों पर विचार ही नहीं किया। हाईकोर्ट के दोनों जजों ने कहा, "संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूतों की जगह नहीं ले सकता।


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