ओपिनियन

कुर्सी के लिए...कौन ‘नाच’ रहा है?

icon अश्विनी कुमार | 10
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| मार्च 13 , 2018 , 20:47 IST

कला की समझ हो, तो फिल्म और अभिनय है। कला की समझ न हो तो ‘नाचने वाली’ है। सुरों की समझ हो तो संगीत है। सुरों की समझ ना हो, तो सारा जहां बेसुरा है। क्रिएटिविटी समझ में आए, तो रचना है। समझ में न आए, तो काला अक्षर भैंस बराबर।

रचना की बात चली है, तो पुराने समाजवादी और नए भाजपाई श्री नरेश अग्रवाल जी की एक रचना याद कर लीजिए:-

''व्हिसकी में विष्णु बसें, रम में श्रीराम, जिन में माता जानकी और ठर्रे में हनुमान। सियावर रामचंद्र की जय।“

                                                   नरेश अग्रवाल, पुराने समाजवादी-नए भाजपाई

जिन नेताजी के लिए करोड़ों के अराध्य भगवान के बारे में ऐसी सोच हो, उन्होंने अगर जया जी के लिए थोड़ी ऐसी-वैसी बात कह ही दी, तो नाराजगी किस बात की? शायद ये बात उन्होंने (जया बच्चन ने) भी समझी। तभी तो मीडिया के सवालों के जवाब में पति की सेहत पर तो बोलीं, लेकिन नरेश जी को जवाब देने की जरूरत तक नहीं समझी। संकट तो बीजेपी के लिए है कि श्रीराम को रम में बसा हुआ समझने वाले नरेश जी को पार्टी कैसे समझाएगी कि वो तो कण-कण में बसे हैं और उनकी नई पार्टी अयोध्या में राम लला को ‘बसाने’ की ‘लंबी लड़ाई’ लड़ रही है।

ये वही नरेश जी हैं, जिनकी समाजवादी पार्टी ने कलाकारों के नाच-गाने का इस्तेमाल वोट जुटाने के लिए सबसे ज्यादा किया। तब समाजवादियों के अच्छे दिन थे। सितारे भीड़ (वोटर) जुटाते थे। बदले में उन्हें देने के लिए पार्टी के पास गांठ में राज्यसभा की सीटें या फिर कोई और ओहदे हमेशा होते थे। अब वो दिन रहे नहीं। 2014 में 4 लोकसभा सांसदों की पार्टी के 2017 में विधानसभा में भी 50 विधायक भी नहीं रह गए। अखिलेश के पास देने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं था। एक राज्यसभा की सीट के लिए जया बच्चन को तरजीह क्या दे दी नरेश अग्रवाल के समाजवाद की चूलें हिल गईं। बरसों की वफादारी बिखर गई। जिसे सिद्धांतों की लड़ाई कहा जा रहा था, वो खाली डिब्बा निकला।

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गलती इन सेलिब्रिटी की भी है। कितना फर्क होता है फिल्म और खेल के सितारों और राजनेताओं में। सितारों और खिलाड़ियों के फैंस की एक दीवानगी होती है। फैंस उनमें नायक की छवि देखते हैं। उन्हें पूजते हैं। उनके अच्छे की चाहत रखते हैं। जबकि ज्यादातर नेताओं के मामले में स्थिति ठीक इससे उलट होती है। अपवादों को छोड़ दें, तो सबसे ज्यादा शक की निगाह से नेताओं की बिरादरी ही देखी जाती है। फिर भी कई सेलिब्रिटी की आखिरी चाहत अगर राजनीति बन जाती है, तो सोचना उन्हें भी है। फिल्म के कलाकार सितारे कहलाते हैं। खिलाड़ी देश के लिए गर्व के पात्र होते हैं।  किसी पर तोहमत लगानी हो, तो उस पर राजनीति करने का आरोप लगाते हैं। ‘राजनीति करना’ सबसे नकारात्मक कार्यों में शुमार है।

राजनीति का नरेश अग्रवाल हो जाना...

पिछले दिनों एक दिलचस्प शीर्षक मीडिया में किसी भाई ने दिया था। ‘राजनीति ने रजनीकांत को ज्वाइन किया।’ इन छह शब्दों में रजनीकांत का कद बयां हो रहा था। बयां हो रहा था कि राजनीति छोटी है और रजनीकांत उससे कहीं बहुत ही बड़े। इतने बड़े कि भला रजनीकांत क्यों राजनीति को ज्वाइन करेंगे। राजनीति ने भले ही उन्हें ज्वाइन कर लिया हो। अब नरेश अग्रवाल ने बीजेपी को ज्वाइन कर लिया। कथित सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ झंडा बुलंद करते थे। अब उन्हीं का झंडा उठाकर चलेंगे। शायद इसी वजह से रजनीकांत के फैंस ने कहा होगा कि उनके आइकन ऐसी संस्कारों को खो चुकी राजनीति को ज्वाइन नहीं कर सकते। अब ये आगे देखने वाली बात होगी कि खुद रजनीकांत राजनीति के मौजूदा चरित्र का हिस्सा हो जाते हैं या उसके डीएनए में बदलाव लाने का वाहक बनते हैं।

बहरहाल, यूपी की तमाम पार्टियों में भ्रमण कर चुके नरेश जी अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। सत्ता तक पहुंच और कुर्सी के लिए इस पार्टी से उस पार्टी तक उनका ‘नाचना’ लगा ही रहा है। लेकिन निकले तो बरसों तक साथ रही जया बच्चन ‘नाचने वाली’ हो गईं। वहां रहते हुए बीजेपी सांप्रदायिक पार्टी थी। शामिल हुए तो बीजेपी देश की उम्मीदों, आशाओं और आकांक्षाओं की पार्टी बन गई। ख्वाहिश राज्यसभा के एक टिकट की रखी और बीजेपी में शामिल होते हुए इरादा देश सेवा का जाहिर कर दिया। मात्र एक टिकट के इनकार से पुराने साथियों के लिए आस्था बदल गई लेकिन नई पार्टी के नए लीडर्स में आस्था दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

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राजनीति को खुद राजनेताओं ने कई खेमों में बांट दिया। धर्मनिरपेक्ष, सांप्रदायिक, वामपंथी, दक्षिण पंथी, मध्य मार्गी। और न जाने क्या-क्या? फिर इतने भर से भी काम नहीं चला, तो जनता परिवार के न जाने कितने दल बन गए। मुख्य कांग्रेस पार्टी से अलग होकर उपनामों के साथ कुछ और ‘कांग्रेस का नाम धारण करने वाली पार्टियां’ बनीं और बिगड़ीं। कुल मिलाकर जितनी ‘दुकान’ उतने मौके। लेकिन हर बार दुहाई सिद्धांतों की। नीतियों की। आदर्शों की। और सबसे बढ़कर देश की। कोई वजह नहीं रही लेकिन काफी समय तक देश इनका और इनके सिद्धांतों का कायल भी रहा। अब भी है। लेकिन सिद्धांतों और प्रतीकों के लिहाफ के नीचे दरअसल कुछ और ही होता है। सिद्धांतों और संस्कारों के मुखौटे उतरते देर नहीं लगते, बस कुर्सी की टेक हटाकर देखिए। राजनीति न सांप्रदायिक है और न ही धर्मनिरपेक्ष। राजनीति सिर्फ सुविधा की राजनीति है। देश के नाम पर अपने लिए है। आपने देखा नहीं नरेश जी को !