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कंट्रोवर्सी से डरकर क्यों भागी क्रिएटिविटी?

icon अश्विनी कुमार | 10
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| जनवरी 31 , 2018 , 20:58 IST

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल संपन्न हो गया। प्रसून जोशी इस बार फेस्टिवल में नहीं गए। या कहें कि मजबूरीवश जा नहीं पाए। चंद लफ्जों में बड़ी बातें कह और लिख देने वाले प्रसून ने इसकी वजह भी थोड़े ही लफ्जों में बताई कि- ‘मैं नहीं चाहता कि मेरे वहां होने की वजह है क्रिएटिविटी की जगह कंट्रोवर्सी पर चर्चा हो।’

ये दो शब्द सुनने में जितने भी एक जैसे लगें, लेकिन कितनी दूरी है इनमें। जब क्रिएटिविटी की समझ न हो या चीजें सिर के ऊपर से गुजर जाएं, तो कंट्रोवर्सी क्रिएट करने वाले अपनी दुकान सजा लेते हैं। कंट्रोवर्सी के लिए आपको ईमानदार होने की जरूरत नहीं होती, जबकि क्रिएटिविटी ईमानदारी मानती है। कंट्रोवर्सी के लिए आपके अंदर सिर्फ खुराफाती और विध्वंसक दिमाग चाहिए, लेकिन क्रिएटिविटी साधना से आती है।

तभी तो कंट्रोवर्सी आज की दुनिया में हर दिन हजारों में पैदा होती है। लेकिन एक अच्छी फिल्म सालों में एक बार बनती है। इसरो के हमारे वैज्ञानिक बड़ी मेहनत से साल में चंद सैटेलाइट लॉन्च कर पाते हैं। डीआरडीओ के वैज्ञानिक सालों की मेहनत के बाद अग्नि-5 का निर्माण कर पाते हैं। और हां, सैकड़ों वादे करने वाले राजनेता चंद अच्छी योजनाओं को ही अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। क्योंकि इन सब में क्रिएटिविटी की जरूरत होती है।

और क्रिएटिविटी विजन मांगती है। और अगर करणी सेना वाले लोकेंद्र कालवी जी के पास विजन होता, तो पिता की बनी-बनाई राजनीतिक जमीन के बावजूद अपने लिए राजनीतिक जमीन की तलाश में पिछले 10-15 साल से अलग-अलग मुद्दों और पार्टियों की दहलीजों पर दर-दर नहीं भटक रहे होते। कभी बीजेपी, कभी कांग्रेस तो कभी बीएसपी। कभी आरक्षण तो कभी इतिहास की ठेकेदारी।

बहरहाल, जाने-माने लेखक, गीतकार, कवि और विज्ञापन की दुनिया के बादशाह प्रसून जोशी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं जा पाए। जरा सोचिए। प्रसून जोशी अगर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन के चेयरमैन नहीं होते, तो क्या होता? यकीनन फेस्टिवल में मौजूद होते और साहित्य और कला की इज्जत करने वालों को उनके वहां होने का लाभ भी मिलता। लेकिन फिलहाल वे 6.9 करोड़ सालाना बजट वाले CBFC के चेयरमैन होने के नाते 4 दिन में 100 करोड़ की कमाई करने वाली फिल्म ‘पद्मावत’ को पास करने के ‘मुजरिम’ हैं।

इसलिए जयपुर से तड़ीपार हैं। जिस वसुंधरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी फिल्म को प्रदेश में चलने नहीं दिया, उससे प्रसून जोशी को सुरक्षा देने के वादे के साथ न्योते की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। आप भले ही इसको क्रिएटिविटी पर कंट्रोवर्सी को तरजीह देने की एक सरकारी करतूत कह लें, लेकिन मौजूदा राजनीति ऐसे आरोपों को तवज्जो नहीं देती।

प्रसून जोशी CBFC के चेयरमैन हैं। उनसे पहले पता नहीं कितने इस ओहदे पर आए और गए। देश को कितने पूर्व CBFC चेयरमैनों के नाम याद होंगे? ज्यादा से ज्यादा दो-तीन या पांच? अब सवाल है कि प्रसून जोशी की यूएसपी क्या है? और जो यूएसपी उनकी है क्या उसकी जरूरत एक फिल्म को पास करने, ना करने या कट लगाने के लिए है?

इसके उलट जोशी की अपनी जो विधा है वो अद्भुत है। जबकि CBFC का चेयरमैन बनना और इसमें रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाना या तो ‘थैंकलेस’ काम है या फिर विशुद्ध रूप से राजनीतिक। तय खुद प्रसून जोशी को करना है कि वो अपने चाहने वालों को अपनी लेखनी से सुख देकर अभिभूत करना चाहते हैं या विवादित हो चुके फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड का मुखिया बनकर क्रिएटिविटी पर अपना वक्त लगाने की जगह चंद नादान और बेईमान लोगों की नादानी और बेईमानी पर सफाई देते फिरना चाहते हैं? चूंकि क्रिएटिव लोगों पर उनके चाहने वालों का भी अधिकार होता है, लिहाजा पूरे सम्मान के साथ प्रसून जोशी से इस सवाल पर एक बार सोचने की प्रार्थना जरूर रहेगी।

वैसे यहां एक अजीब मनोविज्ञान भी काम करता हुआ नजर आता है। ये वो मनोविज्ञान है, जिसमें ‘राजनीति सर्वश्रेष्ठ’ और ‘राजनीति अंतिम लक्ष्य’ की सोच दिखती है। और राजनीति का मतलब सिर्फ सांसद, विधायक या मंत्री बनना नहीं होता। CBFC के चेयरमैन हों या FTII के, ऐसे पदों में भी ‘राजनीति के रुतबे वाली बात’ पूरी-पूरी दिखती है। और इसी रुतबे की चाहत अच्छे-अच्छों को कई बार सीधे राजनीति में खींच लाती है, तो कई बार बैक डोर एंट्री के लिए मजबूर करती है।

लेकिन इसके बाद कोई हेमा मालिनी ड्रीम गर्ल से पार्टी के लिए शो पीस भर बनकर रह जाती हैं। कोई सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के ‘भगवान’ होकर भी सदन में अपनी गैरहाजिरी के लिए चर्चित और बदनाम हो जाते हैं। कोई रेखा नजरें झुका और चुराकर संसद से गायब रहने के लिए उलाहना झेलती हैं। एक बार फिर से गुस्ताखी माफ, लेकिन जिस दिन ये सेलिब्रिटी और अपने-अपने फन के हरफनमौला समझ लेंगे कि राजनीति सिर्फ उनका उपयोग करती है, उस दिन राजनीतिज्ञों को भी अकल आएगी और इनके अपने पेशे का मान भी बढ़ेगा।

हमने तो अनुपम खेर और परेश रावल के अभिनय को चाहा था। प्रसून जोशी की लेखनी को दिलों में उतारा था। आपने अपना ये क्या हाल बना लिया? अपनी क्रिएटिव विधा पर जुगाड़ वाली विधा को आपने तरजीह क्यों दे दी? आपकी क्रिएटिविटी को कंट्रोवर्सी के राहू ने क्यों अपनी आगोश में ले लिया?


DHANANJAY RAI

तथा कथित पत्र कार महोदय आप ने प्रशुन जोशी पे तो लिखा वो तो सही है । लेकिन तसलीमा के साथ क्या किया गाया इसी देश में तुम्हारी विचार धारा के लोगों के द्वारा जरा उस पे भी लिखों । पत्रकारिता का मतलब यह नहीं की किसी का आंख मुंद के विरोध करों । अपनी पत्रकारिता को सहीं करों बाकी तुम जानते हो कि तुम क्या खबरों के साओथ करते हो-