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देश को 'दीपक' तले अंधेरा मंजूर नहीं !

icon अश्विनी कुमार | 6
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| जनवरी 14 , 2018 , 16:43 IST

जब उम्मीद और न्याय की सारी रोशनी आनी बंद हो जाती है, तो एक चौखट पर न्याय का दीपक जरूर नजर आता है। तभी हम इसे देश की सर्वोच्च अदालत कहते हैं। लेकिन आरोप है कि उसी दीपक के तले अंधेरा है। उन्हीं को न्याय नहीं मिल रहा है, जो खुद न्याय देने और मिलने की गारंटी होते हैं। जहां से न्याय की आखिरी उम्मीद सबको होती है।

देश की सर्वोच्च अदालत के दूसरे नंबर के सीनियर जस्टिस चेलमेश्वर हाथ जोड़कर अपने और अपने साथियों के लिए न्याय की मांग कर रहे थे। उनके साथ तीन और जज थे। मीडिया के कैमरे थे। और सांसें थामे सहमा हुआ बेबस-सा देश था। दो स्थितियां हैं। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से थोड़ी गलती हुई हो। या फिर आवेश में आकर चार जजों ने उतनी सारी बातें कह दीं, जितनी की हुई ही नहीं हों।

दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं। क्योंकि हमारे चीफ जस्टिस से इतनी बड़ी भूल हो जाए, ये हम झेल नहीं पाएंगे। क्योंकि उन पर सवा अरब से ज्यादा की उम्मीदें टिकी हैं। और हम ये भी नहीं सह पाएंगे कि हमारी सर्वोच्च अदालत के नंबर-2, नंबर-3, नंबर-4 और नंबर-5 के सीनियर जज छोटी-सी बात या अपने बॉस की छोटी-सी भूल को दुखद ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तब्दील कर दें।

इसी सुप्रीम कोर्ट से 2G केस में उतना बड़ा फैसला (लाइसेंस रद्द करने का) हो गया था, जितना शायद होना नहीं था। नतीजतन 2G केस ने देश को 1.76 लाख करोड़=0 का फॉर्मूला दिया। इसी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान को सिनेमाघरों में अनिवार्य किया और फिर पलटकर कहा कि नहीं, इसे अनिवार्य करने की जरूरत नहीं है। ये दो उदाहरण इसलिए कि कहीं चीफ जस्टिस बनाम 4 जस्टिस की जंग में कोई न कोई पक्ष वैसे ही नतीजे पर पहुंचने में जल्दी तो नहीं कर गया, जैसा कि तब हुआ था?

वैसे देखें तो इस घटना में एक सकारात्मक पक्ष भी है। न्याय न मिलने या न्याय मिलने में देरी की तकलीफ क्या होती है, शायद पहली बार देश के 4 मी लॉर्ड ने खुद पर महसूस की है। वैसे ही, जैसे अकसर साल और कई दशक बीत जाने के बाद भी अपने देश में आम लोगों को न्याय नहीं मिलने पर होता है। दो महीने पहले चिट्ठी लिखी थी। इंसाफ नहीं मिला।

सब्र का बांध ऐसे टूट गया कि वो कर बैठे, जो आज तक किसी ने नहीं किया था। कभी नहीं हुआ था। जबकि ये चार कोई आम लोग नहीं हैं। इन्हें अच्छे-बुरे का हम सबसे ज्यादा भान है। इन्हें संस्थाओं की गरिमा की सबसे ज्यादा ज्ञान है। और तो और, इन्होंने चिट्ठी में लिखी गई अपनी पीड़ा सार्वजनिक भी कर दी, तो भी न्याय का इंतजार ही रहा।

न्याय-अन्याय की इस जंग का एक पक्षकार मीडिया भी है। मीडिया इस बात के लिए गर्व कर सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के 4 जस्टिस को जब अपनी ही अदालत में न्याय की उम्मीद धुंधली होती दिखी, तो वे मीडिया के सामने आए। लेकिन यहीं पर मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ भी गई। सुप्रीम कोर्ट के अंदर छिड़ी जंग में मीडिया (सोशल मीडिया को छोड़कर) अब तक संयमित दिखा है। न खुलकर CJI के साथ और न बाकी चार जस्टिस के साथ। न्याय की उम्मीद में कैमरे के सामने पहुंचे 4 जजों के मामले में अगले कुछ दिन और मीडिया के लिए अग्निपरीक्षा वाले हैं। क्योंकि हम पर भरोसा जताया गया है।

निरपेक्ष रहने का भरोसा। हम न अपने 4 सीनियर जजों का भरोसा तोड़ सकते और न चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की कुर्सी को नीचा दिखा सकते हैं। 4 जजों ने मीडिया के सामने हाथ जोड़कर न्याय की दरख्वास्त की है न कि अपना पक्ष लेने की। इस बात का ध्यान हमेशा रहे कि हमें (मीडिया को) सच कहना है, सच के सिवा कुछ नहीं कहना है। और उतना ही सच कहना है, जितने की तथ्यों के साथ हमें जानकारी हो।

फिर से याद करना होगा, कि मीडिया ने भी CAG के अनुमानों को अंतिम मानकर अदालतों के एक्शन और फैसले को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इस बार ऐसा न हो। अपने साथ हुए अन्याय में 4 जजों के अनुमान में भी चूक हो सकती है। न्यायमूर्ति होने के साथ वे भी इंसान हैं।

इसके बाद रोल आता है सरकार का। प्रधानमंत्री के दूत सीजेआई की दहलीज पर पहुंचे। मुलाकात नहीं हो पाई। कितना सच है नहीं पता, लेकिन कहा गया कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अपने घर का दरवाजा नहीं खोला। हालांकि सरकार कहती है कि उसने फैसला मी लॉर्ड पर ही छोड़ा है। लेकिन एक सवाल यहां भी रह जाता है कि सुप्रीम कोर्ट नाम की संस्था क्या सरकार की सीमाओं से परे है?

एक गरिमा और संतुलन के साथ क्या मध्यस्थता की कोई गुंजाईश नहीं है? आखिर उसी सर्वोच्च अदालत ने अभी-अभी तो राम मंदिर मामले में मध्यस्थता के महत्व को अपने फैसलों से भी ऊपर रखा था। क्योंकि एक सीमा से आगे सरकार की निरपेक्षता पर सवाल भी उठ सकते हैं। वैसे भी जब बात लोकतंत्र पर खतरे की भी कही गई है। तो सरकार अपनी जवाबदेही से पूरी तरह बच भी नहीं सकती।

बहरहाल, लेटलतीफी और निचली अदालतों में भ्रष्टाचार के कुछ आरोपों के बावजूद अब तक हमारा भरोसा न्यायपालिका नाम की संस्था में डिगा नहीं है। लेकिन अब हर एक मन में शंका है और यही देश की चिंता है, तो समाधान भी जरूरी है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आए इस 'सबसे बड़े केस' में तू-तू मैं-मैं की जरूरत नहीं है। क्योंकि हमें हमारी सर्वोच्च अदालत विवादों से परे चाहिए।

हमें हमारी सर्वोच्च अदालत पूर्वाग्रहों से मुक्त चाहिए। हमें हमारी सर्वोच्च अदालत पर कोई सवाल नहीं चाहिए। इस बार भी अदालत में दो पक्ष हैं। न्याय का सामान्य सिद्धांत कहता है कि कोई तो हारेगा। लेकिन इस बार हमें किसी की हार नहीं चाहिए। हमें हमारी सर्वोच्च अदालत की हार मंजूर नहीं है। मी लॉर्ड इस केस में हमें (देश को) ऐसा ऐतिहासिक फैसला चाहिए, जिसमें हमारी ये न्याय की सर्वोच्च संस्था जीत कर निकले। 'न्याय के दीपक' सुप्रीम कोर्ट के तले न कभी अंधेरा रहा और न आगे रहे।