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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद: कब-कैसे और क्यों ?

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 2 , 2017 , 16:20 IST | नई दिल्ली

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले को लेकर एक बार सियासत फिर से गरमा गई है। खासकर तब जब सीबीआई की विशेष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी-मुरली मनोहर जोशी-उमा भारती समेत 12 आरोपियों पर अपराधिक मुकदमा चलाने का फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2 साल के अंदर इस मुकदमे की पूरी कार्रवाई खत्म करने का फरमान सुना रखा है। हालांकि सीबीआई की विशेष अदालत ने आडवाणी-जोशी और उमा को सुनवाई के दौरान पेशी से छूट दे रखी है। लेकिन "होइए वोही जो राम रचि रखा" शायद ये ही मानले तो भारत की बड़ी समस्याओं से ध्यान हट जाए।

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कुछ ऐसा ही एक विवाद है बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि ,जहां आस्था और कानून का टकराव कई दशकों से चल रहा है , कभी कानून की जीत होती है तो कभी भक्ति की लेकिन इस मुद्दे का जितना राजनीतिकरण हुआ है शायद ही इस देश में किसी और मुद्दे का हुआ हो । आइए इस विवाद को समझते है इन तीन शब्दों के माध्यम से कब ? कैसे और क्यों?

इतिहास का पुनरावलोकन

माना जाता है कि 1528 में अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान कहते हैं। समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर के एक सिपहसालार ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। 1853 में यह विवाद पहली बार सामने आया हिंदुओं ने आरोप लगाया कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। यहां यह बताना जरूरी है कि अंग्रेज ऐसे मुद्दे की तलाश में रहते थे जिससे हिन्दू और मुस्लिम आपसे में भीड़ेंय़। इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

अंग्रेजों ने बोया विवाद का बीज

1859 में ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी। 1885 में मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की। 23दिसंबर,1949 में करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

ऐसा बढ़ा फिर विवाद (टाइमलाइन)

16 जनवरी, 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी। उन्होंने वहां से मूर्ति हटाने पर न्यायिक रोक की भी मांग की। 5 दिसंबर, 1950 में महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया। 17 दिसंबर,1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

18 दिसंबर,1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया। 1984 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। एक समिति का गठन किया गया।

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1 फरवरी, 1986 में फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया। जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया।1 जुलाई, 1989 में भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया।

तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने मंदिर के गेट का ताला खुलवाया

9 नवंबर,1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी। 25 सितंबर,1990 में बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए, नवंबर 1990 में आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सिंह ने वाम दलों और बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई थी। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

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आडवाणी की रथ यात्रा औऱ राम मंदिर आंदोलन

अक्टूबर 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया। 6 दिसंबर,1992 में हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया, जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया।

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6 दिसंबर,1992 में मस्जिद की तोड़फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एम.एस. लिब्रहान आयोग का गठन हुआ। जनवरी 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था अप्रैल 2002 में अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

अगस्त 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। मुस्लिमों में इसे लेकर अलग अलग मत थे सितंबर 2003 में एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

लिब्रहान आयोग का गठन

जुलाई 2009 में लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी। 30 सितंबर 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर किसी एक पक्ष में फैसला नहीं आया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पूरे जमीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। फैसले के मुताबिक विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। एक हिस्सा हिंदुओं को दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को मिलेगा। हाईकोर्ट ने माना है जिस स्थान पर भगवान राम की मूर्ति रखी हुई है वही रामजन्म स्थान है और यही हिस्सा हिंदुओं को मिलेगा। हालांकि तीन महीने तक विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी।

कोर्ट ने कहा है कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए सभी पक्षों के पास तीन महीने का वक्त रहेगा। 17 नवम्बर 2011 सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन भाग में विभाजित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि यह ‘कुछ अजीब’ फैसला है क्योंकि किसी पक्ष ने भूमि को तीन भाग में बांटने की मांग नहीं की थी। 21 मार्च 2017 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की है। चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करनेको तैयार हैं।

 


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