ख़ास रिपोर्ट

BJP के लिए बुरी खबर: मोदी नहीं रहे एकमात्र विकल्प, घट रही है फैन फॉलोइंग

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
447
| अक्टूबर 9 , 2017 , 12:56 IST | नई दिल्ली

2019 में बीजेपी के लिए अच्छे दिन की संभावना कम होती दिख रही है। पीएम मोदी के विकास ब्रांड पर बीजेपी के ही घुरंधर जिस तरह लगातार हमले कर रहे हैं, उससे खुद पीएम मोदी अचानक से डिफेंसिव मूड में आ गए है। यह अकारण नहीं है कि देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था और जीडीपी में लगातार हो रही गिरावट पर जब यशवंत सिन्हा ने मोदी सरकार को फेल बताया और जेटली को एक डिफंक्ट फाइनांस मिनिस्तर तो स्वंय पीएम मोदी को जेटली के बचाव में माडिया को संबोधित करना पड़ा।

Modi 3

देश के आम आदमी में से कितने फीसदी लोग जीडीपी रेशियो को जानते हैं, कितने लोग फॉरेक्स रिजर्व से वाकिफ हैं। किस तरह देश का विदेशी मुद्रा भंडार आम आदमी के लिए फायदेमंद हो सकता है। पीएम मोदी यशवंत सिन्हा के हमले के बाद देशवासियों को भरोसा दे रहे थे कि देश की अर्थव्यवस्था चकाचक है, जबकि हकीकत काफी डरावना है। जीडीपी की दर लगातार पाताल में जा रही है। आर्थिक मंदी सामने है. नौकरियां जा रही है और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में दो सालों से काम ठप है। सरकार के बचाव में पीएम मोदी के इकोनोमिक लेक्चर का प्रभाव कितना पड़ा तो यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन खुद सरकारी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है।

क्यों फिर से गठन किया गया इकोनोमिक एडवाइजरी काउंसिल

एक ताकतवर राजनेता 2012 से जो लगातार फ्रंटफुट पर खेल रहा था, खासकर पीएम कैंडीडेट बनने के बाद, 2017 में अचानक से बैकफुट पर आ गया है। 2014 में पीएम बनते ही मोदी ने कहा कि मुझे किसी के सलाह की जरूरत नहीं है और सरकार बनते ही पहला काम किया इकोनोमिक एडवाइजरी काउंसिल को भंग करने का। तो फिर आखिर क्या नौबत आ गई कि 2017 में उन्हें फिर से इकोनोमिक एडवाइजरी काउंसिल का गठन करना पड़ा।

Yashwant 1

यशवंत सिन्हा के हमले के दूसरे दिन ही मोदी सरकार को पेट्रोल की कीमत कम क्यों करनी पड़ी? क्यों सरकार को जीएसटी में संशोधन के लिए मैराथन बैठक करनी पड़ी? जीएसटी में संशोधन के साथ व्यापारियों को राहत देने के लिए सरकार को क्यों मजबूर होना पड़ा? इन सारे सवालों के जवाब जब आप तलाशेंगे तो आसानी से पता चल जाएगा कि मोदी सरकार और बीजेपी की कोर टीम यह मान रही है कि अब मोदी का तिलिस्म खत्म हो गया है। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ जिसके मार्गदर्शन से बीजेपी संचालित होती है, वहां के आतंरिक सर्वे बताते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद मोदी सरकार का साख को बड़ा धक्का लगा है एक बड़ा वर्ग जो व्यापारियों का है, छोटे कारोबारियो का है, सरकार से नाराज चल रहे हैं। और अंदरखाने की बात यह है कि मोहन भागवत के कहने पर ही मोदी सरकार जीएसटी में बदलाव करने को तैयार हुई।

बीजेपी के सबसे बड़े सपोर्टर व्यापारी वर्ग ही पार्टी से नाराज

बनिया या कहें तो व्यापारी वर्ग जो बीजेपी के कैडर वोटर के रुप में माने जाते हैं, मोदी सरकार में सबसे ज्यादा कमर उनकी ही तोड़ी गई है। 2014 में बीजेपी के रथ पर सवार होकर मोदी ने मिडिल क्लास औऱ प्रोफेशनल भारतीयों का दिल जीतकर चुनाव जीता था। उग्र हिन्दुत्व के नारे के दम पर मोदी ने पीएम का ताज पहना था और यही वजह थी कि तीन सालों के अंदर देश में गाय और हिन्दु-मुसलमान की बहस को हवा दी जाती रही।

गुजरात यानि अपने घर में ही घिरे मोदी

1998 से गुजरात में मोदी के दम पर बीजेपी की सरकार है, लेकिन 18 साल बाद गुजरात में बीजेपी का तिलिस्म टूटता नजर आ रहा है। अपने ही घर में मोदी घिरते नजर आ रहे हैं। अमित शाह भले 150 सीट का लक्ष्य बना रखा हो लेकिन गुजरात में नाराज पाटीदार समुदाय अमित शाह पर भरी सभा में कुर्सिया फेंक कर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। हार्दिक पटेल और राहुल गांधी का कॉम्बीनेशन गुजरात में मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए जी-जान से प्रचार में जुट गई है।

Ma

देश की राजनीति के स्क्रिप्ट को बदलने के लिए अभी तो वैसे 2 साल का वक्त है लेकिन इन दो सालों में विपक्ष की ताकत कितनी मजबूत हो पाती है इस पर ही सारा दारोमदार है। क्योंकि देश में विकल्पहीनता का महासकंट अभी भी कायम है। 2014 में जिस तरह मोदी ही एकमात्र विकल्प थे अगर वही स्थिति बनी रहे तो आगे संकट का दौर है। लेकिन अगर विपक्ष मोदी के प्रशंसकों की नाराजगी को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हुआ तो फिर विजय रथ रुक सकता है।

एक कहावत है फसल खराब होने में देर नहीं लगती और इस का अहसास स्वंय मोदी को भी हो रहा है।

 

 


कमेंट करें