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डाकू से सांसद बनने वाली फूलन देवी की कहानी (जन्मदिन विशेष)

कीर्ति सक्सेना, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 10 , 2017 , 10:15 IST | नई दिल्ली

22 ठाकुरों को एक साथ मौत के घाट उतारकर खौफ़ का दूसरा नाम बनने वाली फूलन देवी का गुरूवार 10 अगस्त को जन्मदिन है। प्रतिशोध की आग में जलते हुए पहले डाकू और फिर सांसद बनने तक के सफर में फूलन ने बहुत कुछ देखा। कभी पुलिस की हिट लिस्ट में रहने वाली फूलन ने अपने जीवन में वो मुकाम भी हासिल किया जब वही बंदूकधारी पुलिस उसकी सुरक्षा में तैनात हुए। मल्लाह परिवार में जन्मी फूलन जब 15 साल की थी तभी गांव के कुछ दबंगों ने उसके साथ गैंग रेप किया। अपने साथ हुए इस अत्याचार का बदला लेने के लिए फूलन ने अपराध का रास्ता चुना और देखते ही देखते अपराध की दुनिया में उसका ऐसा सिक्का चला कि लोग उसके नाम से ही खौफ खाने लगे। फूलन देवी के ऊपर एक बायोपिक भी बनी है जिसका नाम ‘बैंडिट क्वीन’ है।

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10 अगस्त 1963 को जन्मी फूलन देवी न सिर्फ सांसद रही हैं बल्कि वो अपने समय की चंबल की सबसे बड़ी डकैत भी मानी जाती थी। लेकिन एक मासूम सी दिखने वाली फूलन ने क्यों बंदूक थामी और फिर क्यों इसे छोड़ साफ जिन्दगी जीने का फैसला किया। आइये जानते हैं उनकी जिंदगी के कुछ अहम पलों के बारे में।

कुछ ऐसा था फूलन देवी का ‘बैंडिट क्वीन’ से सांसद बनने का सफर...

फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव गोरहा का पूर्वा में हुआ था। जातिगत भेदभाव होने की वजह से बचपन से ही फूलन गरीबी और लोगों के बुरे व्यवहार का शिकार बनीं थी, लेकिन उनकी जिन्दगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वो महज 11 साल की थी।

फूलन 11 साल की हुई, तो उसके चचेरे भाई मायादिन ने उसको गांव से बाहर निकालने के लिए उसकी शादी पुट्टी लाल नाम के बूढ़े आदमी से करवा दी थी। शादी के तुरंत बाद इतनी छोटी सी उम्र में ही फूलन को दुराचार का शिकार बनना पड़ा। इसके बाद फूलन अपने पिता के घर वापस भाग कर आ गई। जहां वो उनके साथ मजदूरी में हाथ बंटाने लगी।

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फूलन जब महज 15 साल की हुई, तब गांव के ठाकुरों ने उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। जिसके बाद न्याय पाने के लिए उन्होंने कई दरवाजे खटखटाए लेकिन हर तरफ से उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद जो हुआ उसने फूलन को डकैत फूलन देवी बना दिया।

फूलन तब सुर्खियों का हिस्सा बनीं जब 1981 में उन्होंने कथित तौर पर 22 सवर्ण जाति के लोगों को मौत के घाट उतारा। हालांकि फूलन हमेशा इस घटना में खुद का हाथ न होने की बात करती रहीं।

यूपी और मध्य प्रदेश की पुलिस लंबे समय तक फूलन को पकड़ने में नाकाम रहीं। साल 1983 में इंदिरा गांधी सरकार ने उसके सामने आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव रखा। जो उन्होंने मान लिया क्योंकि उस वक्त तक उनके करीबी विक्रम मल्लाह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो चुकी थी, जिसने फूलन को तोड़ कर रख दिया था।

आत्मसमर्पण के लिए भी फूलन ने अपनी शर्तें रखी थी। इसमें उसे या उसके किसी साथी को मृत्युदंड नहीं दिया जाए, उसे व उसके गिरोह के लोगों को 8 साल से ज्यादा सजा नहीं दिए जाने की शर्त थी। सरकार ने फूलन की सभी शर्ते मान लीं। शर्तें मान लेने के बाद ही फूलन ने अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था।

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11 सालों तक फूलन को बिना मुकदमे के जेल में रखा गया। इसके बाद साल 1994 में आई मुलायम सरकार ने फूलन को रिहा किया और दो साल बाद 1996 में फूलन ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और वो जीतकर लोकसभा पहुंची।

25 जुलाई 2001 में शेर सिंह राणा ने दिल्ली में फूलन देवी की उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी थी। खुद को राजपूत गौरव के लिए लड़ने वाला योद्धा बताने वाले शेर सिंह राणा ने फूलन की हत्या के बाद दावा किया था कि उसने 1981 में मारे गए सवर्णों की हत्या का बदला लिया है।

फूलन की हत्या को एक राजनीतिक साजिश भी माना जाता है। उनके पति उम्मेद सिंह पर भी फूलन की हत्या की साजिश में हाथ होने के आरोप लगे थे, लेकिन वे साबित नहीं हो सके।

डायरेक्टर शेखर कपूर ने फूलन देवी के जीवन पर आधारित मूवी 'बैंडिट क्वीन' भी बनाई थी, जिस पर खुद फूलन ने आपत्ति जताई थी। जिसके बाद कई कट्स के साथ इस फिल्म को रिलीज कर दिया गया। हालांकि बाद में सरकार ने इस फिल्म पर बैन लगा दिया था।


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