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सेलफोन से हो सकता है कैंसर, वैज्ञानिकों के बाद अदालत ने भी लगाई मुहर

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जून 17 , 2017 , 21:55 IST | कैलिफोर्निया

सेल फोन के इस्तेमाल से कैंसर हो सकता है ये सवाल कई वर्षों से हमारे इर्द गिर्द घूम रहा है, दरअसल साल 2014 में प्रकाशित हुई WHO की रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि लंबे वक्त तक सेल फोन पर बातें करने वालों को ब्रेन-ट्यूमर (कैंसर) का ख़तरा हो सकता है। लेकिन हाल ही में इटली की एक अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए वैज्ञानिक अवधारणा को कानूनी जामा पहनाने की पुरजोर कोशिश की है। इटली की एक अदालत ने याचिकाकर्ता रॉ़र्बटो रोमियो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इस दलील को समर्थन किया कि हर दिन तीन से चार घंटे फोन पर बात करने से ब्रेन-ट्यूमर हो सकता है। रोमियो ने दलील दी थी कि काम के सिलसिले में उसे हर दिन 3-4 घंटे लगातार फोन पर बात करनी होती थी इसलिए उसे ब्रेन ट्यूमर हो गया। 

(यहां पढ़ें पूरी ख़बर- https://morningconsult.com/opinions/cellphone-use-linked-cancer-italian-court-thinks/ )

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैनल का भी ये निष्कर्ष है कि सेलफोन ‘संभवत कारसिनोजेनिक ’(कैंसर का कारण बनने वाले) होते हैं। इससे यह लोकप्रिय उपकरण भी उन चुनिंदा ड्राईक़्लीनिंग रसायनों और कीटनाशकों की श्रेणी में आ जाता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए संभावित खतरे हैं। अमेरिकी न्यूज संस्थान CNN में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्य्यन में पाया गया है कि मोबाइल रेडिएशन (Cell Phone Radiation) से इंसानों में कैंसर हो सकता है। 

यहां देखें WHO का लिंक 

(http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs193/en/

14 देश के 31 वैज्ञानिकों का अध्ययन

यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलीफोर्निया के भौतिकशास्त्री सह कैंसर विज्ञानी तथा पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के नेशनल कैंसर एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य डॉ. जॉनाथन एम. सैमेट के नेतृत्व में 14 देशों के 31 वैज्ञानिकों ने कई मौजूदा अध्ययनों की समीक्षा की जो मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी और मैगनेटिक फील्ड के स्वास्थ्य प्रभावों पर केंद्रित थे।

सीएनएन से बातचीत के दौरान डॉ. सैमेट ने कहा कि,

मोबाइल फोनों को ‘‘संभवत: कारसिनोजेनिक’’ के रूप में श्रेणीबद्ध करने का पैनल का फैसला मुख्य रूप से उस मेडिकल डाटा पर आधारित था जो दिखाता है कि मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल करने वालों में एक दुर्लभ किस्म का मस्तिष्क का ट्यूमर,ग्लियोमा, होने का ख़तरा बढ़ जाता है

उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन और पैरोटिड के कैंसर तथा मोबाइल फोन और अकूस्टिक न्यूरोमा में भी संबंध देखा गया है। कान के पास एक लार ग्रंथि को पैरोटिड कहते हैं, जबकि अकूस्टिक न्यूरोमा वहाँ होता है जहां कान दिमाग से जुड़ता है।

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जितना ज्यादा करेंगे मोबाइल का इस्तेमाल उतना बढ़ेगा ग्लियोमा का खतरा

पिछले साल 13 देशों में इंटरफोन नाम के एक अध्ययन ने पाया कि जिन प्रतिभागियों में मोबाइल फोन इस्तेमाल का स्तर सबसे ऊंचा था, उनमें ग्लियोमा का खतरा 40 प्रतिशत अधिक था।(अगर इस बढ़े हुए ख़तरे की पुष्टि हो जाती है तो भी तुलनात्मक रूप से ग्लियोमा दुर्लभ होता है और व्यक्तिगत ख़तरा बहुत कम रहता है।)

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी और द नैशनल कैंसर इंस्टिट्यूट समेत अधिकांश मुख्य मेडिकल संघों ने कहा है कि मोबाइल फोन और सेहत संबंधी मौजूदा डाटा आश्वस्त करने वाला है। सालों तक मोबाइल फोन के स्वास्थ्य प्रभावों पर जताए जा रहे सरोकारों को खारिज किया जाता रहा है।

मोबाइल के अलावा कई और पदार्थ कारसिनोजेनिक

विश्व स्वास्थ्य संगठन पैनल के फैसले के अनुसार मोबाइल फोन को केवल कैटेगरी 2बी में ही श्रेणीबद्ध किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि वे संभवत: मनुष्यों के लिए कारसिनोजेनिक हैं। इसी श्रेणी में 240 अन्य पदार्थ भी आते हैं जैसे कि कीटनाशक डीडीटी, इंजन का धुआं, सीसा और कई दूसरे औद्योगिक रसायन। इसी सूची में दो जाने-माने खाद्य पदार्थ भी हैं, आचारी सब्जी और कॉफी, और मोबाइल फोन उद्योग जगत ने इस ओर इशारा करने में कोई समय नहीं गंवाया।

हम क्या कर सकते हैं?

उपर लिखी बातों को पढऩे के बाद हमारी क्या प्रतिक्रिया हो सकती है? यह शोध खुले तौर पर नहीं कह रहा कि मोबाइल फोन से कैंसर हो सकता है, लेकिन ऐसा लगता है कि इससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जरूर जाता है। चूंकि मोबाइल फोन का इस्तेमाल अभी भी बहुत हाल की घटना है, इतनी जल्दी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं।

बच्चों को मोबाइल का विकिरण जल्दी करता है प्रभावित

इस ख़बर का सबसे भयावह पहलू ये है कि बच्चे मोबाइल फोन रेडिएशन का आसान शिकार बन सकते हैं। आज रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक बच्चे मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके मस्तिष्क तेजी से बढ़ रहे हैं और उनके कपाल भी पतले हैं। उन पर और अधिक प्रभाव पड़ सकता है।

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वे लोग जो संभावित खतरों के प्रति चिंतित हैं उनके लिए एक साधारण हल है कि वह तार वाला या बेतार ब्लूटुथ हेडसेट इस्तेमाल करें। यह विकल्प सुविधाजनक तो नहीं है और कुछ आलोचकों ने ब्लूटुथ जैसे बेतार उपकरणों पर चिंता जताई है जिनके ट्रांसमीटर कान के अंदर लगाने की जरूरत पड़ती है।

 

वीडियो साभार- CNN


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