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देश की चुनावी तस्वीर बदलने वाले टीएन शेषन आज ओल्ड एज होम में बिता रहें हैं जिंदगी

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जनवरी 12 , 2018 , 10:12 IST

लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव या फिर नगर निकाय चुनाव ही क्यों ना हों, चुनाव आयोग अपनी सख्त भूमिका के साथ खड़ा नजर आता है। 90 के दशक से पहले की बात करें तो राजनीतिक दलों के अलावा शायद ही चुनाव आयोग के बारे में कोई जनता होगा। चुनाव आयोग को पहचान दिलाने का श्रेय जाता है तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को। शेषन ने ही राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की ताकत का एहसास कराया था। लेकिन चुनाव आयोग को पहचान दिलाने वाले टीएन शेषन आज खुद गुमनामी का जीवन गुजार रहे हैं। 85 वर्षीय शेषन 'ओल्ड एज होम' में दिन गुजार रहे हैं।

टीएन शेषन अपनी पत्नी के साथ चेन्नई के ओल्ड एज होम में अपने दिन काट रहे हैं। शेषन दंपती की कोई संतान नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार टीएन शेषन चेन्नई के एक ओल्ड एज होम 'एसएसम रेजिडेंसी' में अपने दिन गुजार रहे हैं। उन्हें भूलने की बीमारी है। उनके साथ उनकी पत्नी जयलक्ष्मी भी रह रही हैं। खबर बताती है कि शेषन सत्य साईं बाबा के भक्त थे। उनकी मृत्यु के बाद वह सदमे में आ गए थे। उन्हें 'ओल्ड एज होम' में भर्ती कराया था। वहां तीन साल रहने के बाद वह फिर से अपने घर चले गए, लेकिन वहां कुछ समय रहने के बाद वे फिर से 'ओल्ड एज होम' लौट आए। इन दिनों वे यहीं गुमनामी की जिंदगी गुजार रहे हैं।

1990 में बने थे चुनाव आयुक्त-

तमिलनाडु काडर के आईएएस अधिकारी टीएन शेषन 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे। दिसंबर 1990 से 1996 तक शेषन चुनाव आयोग के प्रमुख रहे थे। देश में निष्पक्ष रूप से चुनाव कराने के उन्होंने कई प्रयास किए। हर एक वोटर के लिए वोटर आईडी कार्ड उन्हीं की पहल का नतीजा था।

1996 में उन्हें रैमन मैगसेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। चुनाव आयोग से कार्यकाल खत्म होने के बाद शेषन ने साल 1997 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा, लेकिन के. आर. नारायणन से हार गए।

बिहार चुनाव में किया था बदलाव-

शेषन ने चुनाव सुधार की शुरुआत 1995 में बिहार चुनाव से की थी। बिहार में उन दिनों बूथ कैप्चरिंग का मुद्दा काफी बड़ा था। शेषन ने बिहार में कई चरणों में चुनाव कराए थे, यहां तक कि चुनाव तैयारियों को लेकर वहां कई बार चुनाव की तारीखों में बदलाव भी किया था। उन्होंने बिहार में बूथ कैप्चरिंग रोकने के लिए सेंट्रल पुलिस फोर्स का इस्तेमाल किया था, इस फैसले की उस दौरान लालू यादव ने आलोचना की थी।

उन्होंने चार बार बिहार चुनाव की तारीखों में बदलाव किया था। जरा सी भी गड़बड़ी मिलने पर वह फौरन तारीख बदल देते थे। उस दौरान बिहार में चुनावों में बड़ी संख्या में बूथ कैप्चरिंग, हिंसा और गड़बड़ी होती थी। शेषन ने इसे चुनौती के रूप में लिया। निष्पक्ष चुनाव के लिए पहली बार उन्होंने चरणों में वोटिंग कराने की परंपरा शुरू की। पांच चरणों में बिहार का विधानसभा चुनाव कराया। वह चुनाव मील का पत्थर बना था।


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