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किशोरी अमोनकर: गुम हो गई पत्थरों में जिंदगी फूंकने वाली वो आवाज...

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अप्रैल 4 , 2017 , 13:41 IST | मुंबई

शास्त्रीय संगीत की मशहूर गायिका किशोरी अमोनकर का सोमवार देर रात निधन हो गया। वह 84 साल की थीं। अमोनकर का जन्म 10 अप्रैल 1932 को मुंबई में हुआ था। वो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दिग्गज गायिकाओं में शुमार थीं।

किशोरी ने ख्याल, ठुमरी और भजन को शास्त्रीय संगीत से रंगा है। उन्होंने अपनी मां मोघूबाई कुर्दिकर से संगीत की शिक्षा ली थी। कुर्दिकर भी एक मशहूर गायिका थीं।

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मिले हैं कई सम्मान

संगीत के क्षेत्र में किशोरी अमोनकर के अहम योगदान के कारण उन्हें कई सम्मान भी मिले हैं। अमोनकर को साल 1987 में पद्म भूषण और साल 2002 में पद्म विभूषण मिला था।

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अमोनकर को नहीं पसंद था संगीत में खलल

उन्हें इंटरव्यू देना पसंद नहीं था। वो मानते थीं इससे रियाज में खलल पड़ता है। उन्हें रागों से छेड़छाड़ पसंद नहीं थी। शुद्धता की वे हमेशा से हिमायती थीं। उन्हें संगीत में खलल पसंद नहीं था। कॉन्सर्ट के बीच अगर कोई व्यवधान होता था तो उनसे बर्दाश्त नहीं होता था।

उन्होंने सुबह-सुबह कई कॉन्सर्ट किए क्योंकि सुबह के राग वो किसी और वक्त नहीं गाना चाहती थीं। उन्हें अकेले रहना पसंद था। अकेलापन उन्हें सुकून देता था

कहते हैं कि जीनियस कुछ अजीब होते हैं, कभी खड़ूस, कभी जुनूनी

किशोरी अमोनकर भी जीनियस थीं। उन्हें किस श्रेणी में रखना है ये तय नहीं किया जा सकता। लेकिन वो आम नहीं थीं। वो खास थीं। बहुत खास। उनकी विदाई ने हिंदुस्तानी संगीत से उसकी शुद्धता कम कर दी है। वो आवाज चली गई है जो पत्थरों को भी सुर से भर सकती थी। जो सम्मोहित कर सकते थी। जो आत्मा में उतर सकती थी।
इस दुनिया और दूसरी दुनिया का एक साथ अहसास कराने वाली थी वो आवाज। किशोरी अमोनकर की आवाज।

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रागों में महारत

जयपुर-अतरौली घराने की इस गायिका ने संगीत की तमाम विविधताओं में अपने रंग जोड़े। उन्हें खयाल के लिए जाना जाता है। उन्हें कुछ ऐसे रागों में महारत पाने के लिए जाना जाता है जिनके साथ न्याय करना आम लोगों के लिए संभव नहीं था।

उन्हें हिंदी, मराठी, कन्नड़ और संस्कृत भजनों के लिए जाना जाता है। ऐसे अनगिनत घर होंगे जहां किशोरी अमोनकर की आवाज से सुबह होती रही है। उनके भजन के सुरों के साथ।

जयपुर घराने से ली संगीत की तालीम

10 अप्रैल 1931 (कुछ जगहों पर जन्म का वर्ष 1932 बताया जाता है) को मुंबई में एक संगीतप्रेमी परिवार के घर पुत्री का जन्म हुआ। नाम रखा गया था किशोरी। मां मोगूबाई कुर्डीकर शास्त्रीय संगीत की जानकार थीं। उन्होंने बेटी किशोरी को संगीत सिखाना शुरू किया। मां ने जयपुर घराने में तालीम हासिल की थी।

40 के दशक में किशोरी ने भिंडी बाजार घराने से अंजनी बाई मालपेकर से भी शिक्षा ली। इसके बाद उन्होंने कई घरानों का संगीत सीखा। उन्होंने फिल्म संगीत में भी रूचि ली। उन्होने 1964 में आई फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' के लिए गाने भी गाए, लेकिन जल्दी ही वो फिल्म इंडस्ट्री के खराब अनुभवों के साथ शास्त्रीय संगीत की तरफ लौट आईं।

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50 के दशक में खोयी थी आवाज

पचास के दशक में किशोरी अमोनकर की आवाज चली गई थी। दो साल लगे आवाज वापस आने में। हालांकि, किशोरी जी ने एक इंटरव्यू में बताया है कि उन्हें इस वजह से करीब नौ साल गायन से दूर रहना पड़ा। वो फुसफुसा कर गाती थीं। लेकिन उनकी मां ने मना किया और कहा कि मन में गाया करो। इससे तुम संगीत के और संगीत तुम्हारे साथ रहेगा।
किशोरी जी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि,

संगीत पांचवां वेद है। इसे आप मशीन से नहीं सीख सकते। इसके लिए गुरु-शिष्य परंपरा ही एकमात्र तरीका है। संगीत तपस्या है। संगीत मोक्ष पाने का एक साधन है

उन्होंने कहा था कि,

अब वो इस संसार में वापस नहीं आना चाहतीं। वो मोक्ष चाहती हैं। संगीत में जिस तरह की तपस्या की जरूरत होती है उससे वो दोबारा नहीं गुजरना चाहतीं

ईश्वर उन्हें मोक्ष दे। वाकई संगीत की साधिका इससे कम की हकदार नहीं हैं।

किशोरी अमोनकर के लाइव कंसर्ट का एक वीडियो 


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