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देश की राजनीति को दशा और दिशा देने वाले जेपी को शत्-शत् नमन (जयंती विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 10 , 2017 , 21:21 IST | नई दिल्ली

11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। उन्हें 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। 1998 में उन्हें भारत रत्न से सम्मनित किया गया। 1974 में जब जयप्रकाश नारायण ने ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’का नारा देते हुए मैदान में उतरे थे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा था।

शिक्षा:

पटना मे अपने विधार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता संग्राम मे हिस्सा लिया। जयप्रकाश नारायण बिहार विधापीठ में शामिल हो गए, जिसे युवा प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा, जो गांधी जी के एक निकट सहयोगी रहे और बाद मे बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री रह चुके है द्वारा स्थापित किया गया था।

वे 1922 मे वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविधालय-बरकली, विसकांसन विश्वविधालय में समाज-शास्त्र का अध्यन किया। पढ़ाई के महंगे खर्चे को वहन करने के लिए उन्होंने खेतों, कंपनियों, रेस्टोरेन्टों मे काम किया। वे मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित हुए। उन्होने एम.ए. की डिग्री हासिल की। उनकी माताजी की तबियत ठीक न होने की वजह से वे भारत वापस आ गए और पी.एच.डी पूरी न कर सके।

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जानिए जेपी के जीवन से जुड़े खास पहलुओं को:

आप को बता दें कि जयप्रकाश नारायण मूल रूप से लोकतांत्रिक समाजवादी थे और व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते थे। वे भारत में ऐसी समाज व्यवस्था के समर्थक थे जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानसिक प्रतिष्ठा और लोककल्याण के आदर्शों के अनुरूप हो। 1974 में सम्पूर्ण क्रांति की शुरुआत की। अपना सपना पूरा करने के लिये जयप्रकाश ने ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की स्थापना कर अहिंसक रास्ते से भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन का नेतृत्व किया।

जेपी ने पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित किया। यहीं उन्हें ‘लोकनायक‘ की उपाधि दी गई। इसके कुछ दिनों बाद ही दिल्ली के रामलीला मैदान में उनका ऐतिहासिक भाषण हुआ। इसके कुछ दिनों बाद इंदिरा गांधी ने देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लगा दिया। सम्पूर्ण क्रांति के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

स्मरण रहे कि दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई जेपी की आम सभा ने पूरे देश को झकझोर दिया इस सभा में तब एक लाख लोग शामिल हुए थे। विरोध के चलते आखिर आपातकाल का अँधेरा छँटा और दो साल बाद इंदिरा गाँधी ने 1977 में आपातकाल हटा दिया। जेपी के नेतृत्व में जनता पार्टी का गठन हुआ। मोरारजी देसाई को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया।

देश को नेतृत्व देने वाले जेपी की किडनियां खराब हो गई और शेष समय उन्हें डायलिसिस पर गुजारना पड़ा। 8 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हो गया और देश ने लोकतंत्र का एक सजग प्रहरी खो दिया। जेपी को मरणोपरांत भारत रत्न से विभूषित किया गया।

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जयप्रकाश कौन थे?

इसका एक ओजपूर्ण परिचय रामधारी सिंह दिनकर की उन पंक्तियों से मिलता है जो उन्होंने 1946 में जयप्रकाश नारायण के जेल से रिहा होने के बाद लिखी थी और पटना के गांधी मैदान में जेपी के स्वागत में उमड़ी लाखों लोगों के सामने पढ़ी थी.

कहते हैं उसको जयप्रकाश जो नहीं मरण से डरता है
ज्वाला को बुझते देख, कुंड में स्वयं कूद जो पड़ता है।
है जयप्रकाश वह जो न कभी सीमित रह सकता घेरे में
अपनी मशाल जो जला बांटता फिरता ज्योति अंधेरे में।

हां जयप्रकाश है नाम समय की करवट का, अंगड़ाई का
भूचाल, बवंडर, के दावों से, भरी हुई तरुणाई का
है जयप्रकाश वह नाम जिसे इतिहास समादार देता है
बढ़कर जिनके पदचिह्नों को उर पर अंकित कर लेता है।


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