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विनाश-काले कांग्रेस बुद्धि!

icon कुलदीप सिंह | 0
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| जुलाई 21 , 2017 , 18:26 IST | नई दिल्ली

वैसे तो किसी राजनीतिक पार्टी की बुद्धि के बारे में मेरा टिपण्णी करना कुछ लोगों को अजीब लग सकता है लेकिन 132 साल पुरानी देश की सबसे बड़ी पार्टी के लिए गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे शंकर सिंह वाघेला ने यही शब्द इस्तेमाल किए हैं... “विनाश-काले विपरीत बुद्धि”

77वां जन्मदिन मनाते हुए गुजरात में बापू के नाम से मशहूर शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और आरोप लगाया कि राज्य में विधानसभा चुनाव सर पर हैं लेकिन अभी तक कांग्रेस के पास कोई गेम प्लान नहीं है। दरअसल शंकर सिंह वाघेला कैंप और कांग्रेस नेतृत्व में खटपट कई दिनों से चल रही थी। गुजरात में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान 11 कांग्रेस विधायकों ने एनडीए उम्मीद्वार रामनाथ कोविंद के पक्ष में वोटिंग की जिसके लिए वाघेला कैंप को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। अब ज़रा मूल सवालों पर लौट आते हैं क्या वाकई कांग्रेस का बंटाधार हो गया है? नाउम्मीदी की धुंध इस पार्टी को कभी आगे बढ़ने देगी या नहीं? आखिर कांग्रेस को हो क्या गया है? क्या देश सचमुच कांग्रेस मुक्त हो जाएगा? इन सवालों के जवाब खोजने के लिए आपको ज़रा इन तथ्यों पर नज़र डालनी होगी।

-देश के 29 राज्यों में अब सिर्फ कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मेघालय, और मिजोरम में कांग्रेस सत्ता में बची है।

-कांग्रेस के भविष्य के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की लार्जर देन लाइफ छवि के सामने बौने साबित होते हैं।

-कांग्रेस में परिवारवाद हावी है और दूसरी लाइन के नेताओं के प्रधानमंत्री या गांधी परिवार के सदस्य से भी बड़ा नेता बनने के चांस न के बराबर हैं।

-डिजिटल क्रांति के युग में कांग्रेस जनसंवाद में बेहद पिछड़ी पार्टी साबित हो रही है।

-राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस के पास कोई मास्टर-प्लान नहीं है और संकटमोचकों का पार्टी में अकाल दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस को चाहने वाले कई लोग अक्सर दलील देते हैं कि पार्टी का 100 साल पुराना इतिहास है, कांग्रेस कई बार ऐसे संकटों से गुजर चुकी है और फिर उठकर खड़ी हुई है। पार्टी में नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे कद्दावर नेता और प्रधानमंत्री देश को नई दिशा दिखा चुके हैं, लेकिन ये दलीलें देने वाले ये भूल जाते हैं कि जो आग इंदिरा, जवाहर लाल नेहरू और राजीव गांधी की शख्सियत में दिखाई देती थी वो राहुल गांधी में नदारद है।

हाल ही में कांग्रेस ने केन्द्रीय और राज्य स्तर पर जनसंवाद सुधारने के लिए डिजिटल कैंपैन चलाने का फैसला किया है और उसके डिजिटल विंग में पदों को भरने के लिए नौकरियां भी निकाली गई हैं, लेकिन सच पूछिए तो 2014 में सत्ता से आउट हुई कांग्रेस ने ये काम करने में भी देरी कर दी है। मोदी सरकार के मंत्री और विधायक सरकार की नीतियों का इतना प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि किसी को भी सरकार की कमजोरियां दिखाई ही नहीं दे रही हैं, लेकिन कांग्रेस तो खुद को मजबूत विपक्ष भी साबित नहीं कर पा रही है। ऐसा लग रहा है जैसे सत्ता में आने के लिए कांग्रेस इंतजार कर रही है, ऐसा लगता है जैसे उसके रणनीतिकार कुछ नया तो करना चाहते हैं लेकिन घिसी पिटी राजनीति चाहकर भी छोड़ नहीं पा रहे हैं। सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस न तो किसी राज्य में न ही केन्द्रीय स्तर पर लोगों के मन में जगह बना पा रही है। गुजरात, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले चुनावों में कांग्रेस कोई उलटफेर कर पाएगी फिलहाल तो दूर दूर तक इसके कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं।

राष्ट्रपति चुनाव हों या उपराष्ट्रपति चुनने की प्रक्रिया कांग्रेस हर मोर्चे में अपनी साख खोती जा रही है। इन सब वजहों के बावजूद कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी को ही स्वाभाविक अध्यक्ष प्रोजेक्ट किया जा रहा है। परेशानी की बात ये है कि राहुल के पास सोनिया गांधी की तरह राजनीतिक इच्छाओं का त्याग करके खुद को मसीहा बनाने का भी कोई मौका नहीं है। बीजेपी एग्रेसिव प्रचार-प्रसार रणनीति की वजह से देशभर में लोकप्रिय होती जा रही है, अमित शाह और मोदी की जोड़ी कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को साकार करने में लगे हैं और कांग्रेस की ऊर्जा और प्राणशक्ति को जैसे जंग लग गया है।

सोशल मीडिया पर राहुल गांधी लगातार किरकिरी का शिकार होते रहते हैं। सरकार के खिलाफ खोले गए कांग्रेस के सभी मोर्चे विफल साबित हो रहे हैं। कांग्रेस की इस हालत पर अकबर इलाहाबादी का एक शेर बिल्कुल फिट बैठता है।

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता


IMRAN KHAN

सर, आपने कांग्रेस के मौजूदा हालत पर बयां सही किया है लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आती कि चुनाव आते ही कांग्रेस के नेता अचानक से पार्टी और कांग्रेस आलाकमान से कैसे मोहभंग हो जाता है। क्या उनका इस तरफ का मोहभंग होना उनके किसी निजी फायदे का संदेश नहीं देता क्या...हां माना कि कांग्रेस में अभी विपक्ष का रोल भी उस तरह से अदा नहीं कर पा रही जिस तरह से बीजेपी ने किया था...लेकिन एक बात कहना चाहूंगा कि स्वतंत्र लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए विपक्ष का होना जरुरी है....पहले माना जाता था कि पत्रकारिता सरकार को आईना दिखना के लिए होती थी ....सरकार कितना भी अच्छा काम करें लेकिन उसको उनकी खामियों को दिखाते रहना होता था , ताकि सरकार में अहंकार पैदा नहीं हो ...पत्रकारिता के इस काम से विपक्ष को बल मिलता था....लेकिन सोशल मीडिया या आज की मीडिया के मौजूदा कामकाज से समाज में लोगों का इसके प्रति रवैया बहुत खराब है...जिससे पत्रकारिता पर गलत प्रभाव पड़ रहा है... मौजूदा सरकार पर शेर मत कर अहंकार ऐ , समय की धारा के साथ बह जायेगा, तू रह जायेगा अकेला, अकेला