राजनीति

राहुल गांधी और उदार मुस्लिम बुद्धिजीवियों की मुलाकात के मायने!

गोविंद ठाकुर, एडिटर, नेशनल अफेयर्स, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 12 , 2018 , 16:52 IST

राहुल गांधी आम चुनाव से पहले सभी समुदायों से मिल रहे हैं। इससे पहले राहुल ने ओबीसी और दलित समुदायों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। इसकी सीधी सी बात है कि राहुल होने वाले लोकसभा चुनाव में हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होने देना चाहते हैं। यहाँ गौर करने वाली बात है कि इस बार कांग्रेस ने किसी भी नेता और कट्टरपंथी मुसलमानों को बैठक में नहीं बुलाया । जबकि पिछले बार सोनिया गांधी ने जमा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी को बुलाकर भेंट की थी जिसे बीजेपी ने चुनावी मुद्दा बना लिया था। 

आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए राहुल की इस मुलाकात को कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। इस मीटिंग में राहुल को मुस्लिम समुदाय की बातों से हटके गरीबी, एजुकेशन जैसे मुद्दों पर चर्चा करने की सलाह दी गई थी। आम चुनाव से पहले कांग्रेस अपनी छवि अच्छी बनाने के लिए लोगों के बीच पहुंचकर उनसे मिल रही है। ऐसे में राहुल गांधी सभी समुदायों से मिल रहे हैं। इससे पहले राहुल ओबीसी और दलित समुदायों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी।

इस पर राहुल गांधी ने स्पष्ट करते हुए कहा कि कांग्रेस का किसी खास धर्म या समुदाय के लिए खास एजेंडा नहीं है। कांग्रेस का एजेंडा सभी के लिए है जिसमें सबको न्याय दिलाना है। बैठक के दौरान राहुल ने कहा कि बीजेपी की सोच विभाजनकारी है जबकि कांग्रेस की सोचने की प्रक्रिया समावेशी है जिसमें सबको साथ लेकर चलना है।

बता दें मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ राहुल गांधी की यह बैठक अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति का हिस्सा है।

मुलाकात का मकसद

दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय से दूरी बना ली थी। क्योंकि जिस तरह बीजेपी ने कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया और हिन्दुओं को समझाने की भरपूर कोशिश की वही उनके हितकारक हैं। कांग्रेस ने भी एंटनी समिति की शिफारिश मानते हुए उदार हिन्दुत्व को अपनाया और मुस्लिम से दूरी बना ली। लेकिन समय के साथ फिर से पहल की गई है। और राहुल मुस्लिम समुदाय को ये विश्वास दिलाना चाहते हैं कि मुस्लिम कांग्रेस के शासन में ही सुरक्षित रह सकता है।

उत्तर भारत में कांग्रेस के साथ नहीं मुसलमान

हालांकि मीटिंग में राहुल ने वहां आए लोगों के सामने इस बात को कबूला कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रही, जिसकी वजह से 2014 के चुनाव में कांग्रेस हारी। बैठक में राहुल ने कहा, 'हमसे भी गलतियां हुई हैं, हम देश की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाए, इसी वजह से हम हारे।

1992 बाबरी विध्वंस की घटना के बाद से ही मुस्लिम समुदाय ने कांग्रेस से दूरी बनाये हुआ है। उत्तर भारत में मुसलमान कांग्रेस के बदले क्षेत्रीय दलों को वोट करते रहे हैं, कांग्रेस को वोट वो उसी जगह करते हैं जहां क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं। अब आप देखिए मुस्लिम असम में बदरूद्दीन अजमल को वोट करते हैं, बंगाल में ममता बनर्जी को, यूपी में सपा और बसपा को, बिहार में राजद और जदयू को, कांग्रेस को वहीं वोट करते हैं जहाँ कोई विकल्प नहीं होता। अब कांग्रेस मुसलमानों को यह बताना भी चाह रहा है कि केंद्र में बीजेपी का मुकाबला कोई क्षेत्रीय दल नहीं बल्कि कांग्रेस ही करेगी इसलिए वो कांग्रेस को वोट करे। 

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दक्षिण भारत में भी कांग्रेस को मुस्लिम समाज का पूरा साथ नहीं मिल पा रहा है।कर्नाटक में जेडिएस, आंध्रप्रदेश में टीडीपी और जगन मोहन रैड्डी, तेलंगाना में टीआरएस महाराष्ट्र में एनसीपी तमिलनाडु में मजबूत डीएमके और एआईडीएमके के बीच वोट बंटते रहे हैं। 

क्षेत्रीय दलों के बढते प्रभाव से कांग्रेस चिंतित

खेल यहां है... कांग्रेस जिस वोट बैंक के बदौलत शासन करती रही है वह मुस्लिम अगड़ी हिन्दू और दलित रहे हैं अब कांग्रेस से ऐ सभी लगभग कट चूके हैं। कांग्रेस की छटपटाहट है कि इसी मुस्लिम वोट बैंक के कारण क्षेत्रीय दल उन्हें आंख दिखा रहा है । कोई भी क्षेत्रीय दल या तो कांग्रेस से समझौता नहीं करना चाहते हैं या फिर गठबंधन में सबसे छोटा अंश देने की बात करते हैं । हालफिलहाल में बसपा और ममता बनर्जी ने कुछ ऐसा ही आफर किया है। अगर मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिले की उम्मीद बढे तो ऐ ऐसा नहीं कर सकते हैं। 

क्षेत्रीय दलों से गठबंधन भी कांग्रेस को भारी पड़ा

मंडल और कमंडल की राजनीति के परीणाम कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रादुर्भाव हुआ। जातीये समिकरणों और मुस्लिम वोटों के गठबंधन के कारण ऐ मजबूत हो गए।मजबूर होकर कांग्रेस को इनसे समझौता करना पड़ा। परीणाम हुआ कांग्रेस कमजोर होती चली गई। अब राहुल गांधी ने शाफ्ट हिन्दूत्व के साथ मुस्लिम समुदाय को भी विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वहीं उनकी रक्षा कर सकते हैं। यहाँ इस मुद्दे पर कांग्रेस बीजेपी से नहीं बल्कि अपने ही संभावित गठबंधन के साथियों के साथ लड़ रहे हैं। 

इस मुस्लिम बुद्धिजीवियों के मार्फत से कांग्रेस इस समुदाय को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है माना जा रहा है कि इनकी अपील किसी भी कट्टर पंथी मुसलमानों से अधिक होती है बताया जा है कि अब अधिकतर मुस्लिम समुदाय इन हार्ड कोर नेताओं की बात नहीं सुनते जितना कि पढे लिखे इन हस्तियों के।.दुसरी ओर ऐही लोग कई बार बीजेपी के नेताओं यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बड़े मंत्रियों से मिले हैं ।ऐसे में बीजेपी के लाख मुद्दा बनाने के बाद भी इसे तुल नहीं मिल सकता है।  


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