ओपिनियन

हारे हैं क्रिकेट को 'निश्चित' मानने वाले

icon अश्विनी कुमार | 0
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| जून 19 , 2017 , 17:36 IST | नई दिल्ली

बच्चे ने हाथी की मांग की। मां-बाप ने दो 'खिलौना हाथी' थमा दिया। बच्चा मान गया। चैंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तान के हाथों भारत की हार पर मीडिया का (अखबार और खबरिया चैनल दोनों का) रवैया कुछ ऐसा ही रहा। पाठकों-दर्शकों को नादान बच्चा मान लिया और हॉकी-बैडमिंटन में मिली जीत को 'खिलौना हाथी'। लेकिन न देश नादान है और न ही मीडिया उतना होशियार, जितना खुद को समझता है।

 

न अवाम का क्रिकेट के मुकाबले समर्थन। न उतना पैसा। और न ही ढेले भर की सरकारी मदद। बावजूद इसके हमारे हॉकी और बैडमिंटन खिलाड़ी बधाई के पात्र हैं। उन्हें सलाम है। न उनकी जीत क्रिकेट की जीत से किसी मायने में कम है। न उनकी हार किसी मायने में क्रिकेट की हार से कम दुखदायी होनी चाहिए। लेकिन चैंपियंस ट्रॉफी में कोहली एंड कंपनी के पिटने के बाद हॉकी और बैडमिंटन की जीत पर जयकारे लगाने वालों पर कुछ सवाल जरूर है।

मसलन,

मीडिया के काबिल साथियों ने शनिवार के दिन किदांबी श्रीकांत को कितना याद किया?

शनिवार के ही दिन या रविवार की सुबह भारतीय हॉकी टीम को कितना याद किया?

साथियों के लिए चार विकल्प हैं : 

क्रिकेट के बराबर? 

क्रिकेट के मुकाबले 50 प्रतिशत? 

क्रिकेट के मुकाबले 10 प्रतिशत ?

क्रिकेट के मुकाबले 1 प्रतिशत ?

 

दिल पर हाथ रख लें। शायद चौथा या अधिक से अधिक तीसरा विकल्प सही हो सकता है। जबकि ये दोनों ही 'बड़ी' खबरें तब भी अपनी जगह बरकरार थीं। कि रविवार को हॉकी में भारत और पाकिस्तान का मुकाबला है। और किदांबी श्रीकांत ने वर्ल्ड नंबर वन खिलाड़ी साउथ कोरिया के वान हो को हराकर इंडोनेशिया ओपन के फाइनल में जगह बना ली है और रविवार को ही टाइटल के लिए भिड़ेंगे। लेकिन तब क्रिकेट के आगे बैडमिंटन की क्या बिसात और क्या बिसात राष्ट्रीय खेल हॉकी की। दोनों में ही लगातार अच्छे प्रदर्शनों के बावजूद हमेशा की तरह शनिवार और रविवार के दिन भी इनका बाजार भाव चढ़ नहीं पाया। इनकी याद तब आई, जब ओवल के मैदान पर हमारे क्रिकेटर हारने लगे और क्रिकेट जीतने लगा।

 

इससे पहले तो क्रिकेट और अपने क्रिकेटरों के लिए बस 'विराट जुमले' गढ़े जाते रहे। मैच से पहले ही ऐलान होता रहा कि पाकिस्तान तो दरअसल बाजी हार ही चुका है। रविवार को तो सिर्फ कागजी औपचारिकताएं ही पूरी की जानी हैं। मीडिया ने ऐसी-ऐसी लाइनें गढ़ीं कि पूछिए मत। ऐसी पंक्तियां सैकड़ों में हैं लेकिन एक पर गौर करना दिलचस्प है। शनिवार की शाम एक चर्चा इस शीर्षक के साथ भी हुई- 'पाकिस्तान की निश्चित हार का विश्लेषण'। यानी मैच होने से पहले ही पाकिस्तान की जो हार हो चुकी है उसका विश्लेषण। कायदे से इसके बाद फाइनल खेलने की जरूरत ही क्या थी? लेकिन फाइनल मैच हुआ। भारत की हार हम भारतीयों के लिए दुखद रही, लेकिन क्रिकेट की जीत का सुख दुनिया ने महसूस किया होगा। वर्ना भाइयों ने तो अनिश्चितता में ही खूबसूरती वाले क्रिकेट को निश्चित मान लिया। भारत की जीत एडवांस में पक्की कर दी।

और जब हार गए, तो हॉकी और बैडमिंटन की जीत का मुखौटा ले आए। क्रिकेट में पाकिस्तान के हाथों मिली हार की झेंप मिटाने के लिए।

तभी तो सोमवार को अचानक किदांबी श्रीकांत याद आ गए। 

पाकिस्तान को हराने वाली हमारी हॉकी टीम याद आ गई।

इन दोनों की जीत क्रिकेट की हार से बड़ी लगने लगी।

 

दरअसल, ये सब याद आने लगे, तो इसके पीछे भी वही धूर्तता छिपी है, जिसने इन खेलों को क्रिकेट के मुकाबले कभी भी आगे नहीं बढ़ने दिया। बल्कि सच तो ये है कि कई बार इन खेलों की हत्या की कोशिश की गई। क्रिकेट में मिली एक हार को युद्ध हार जाने जैसी कुंठा से ग्रस्त हो चुके लोगों का सौभाग्य कहिए कि हॉकी और बैडमिंटन ने उन्हें इसका मौका भी दे दिया। मतलब साफ है कि दूसरे खेल एक बार फिर क्रिकेट के लिए इस्तेमाल होते दिखे। और दुर्भाग्य से क्रिकेट की कीमत पर खुद को कुर्बान कर चुका अपना हॉकी भी इसमें शामिल है।

 

चतुराई ये भी हो सकती है। जरा समझिए।

पैसे के लिए 24X7 की ड्यूटी में मशीनी रूप अख्तियार कर चुके अपने क्रिकटरों को वेस्टइंडीज में एक सीरीज खेलनी है। 

उसके बाद श्रीलंका का दौरा है। वेस्टइंडीज आज एक ऐसी टीम है, जो आईसीसी की कथित रैंकिंग के पैमाने पर पहले से आठवें नंबर तक कहीं नहीं है। कोहली एंड कंपनी के पाकिस्तान से पिटने के बाद अब इस भारत-विंडीज सीरीज का रोमांच कितना रहेगा, आप खुद समझ सकते हैं। सीरीज की कामयाबी को लेकर डरे हुए बाजार के लिए क्या ये मुफीद नहीं है कि हॉकी और बैडमिंटन की जीत को ढाल बनाकर क्रिकेट में पिटी टीम के चेहरे को पांच-सात दिनों के लिए छुपा लिया जाए? 

 

न्यूज वर्ल्ड इंडिया ने शनिवार को एक चर्चा की थी। कि क्रिकेट को क्रिकेट ही रहने दो, जंग का नाम न दो। तब हमने कहा था कि विराट या उनकी टीम ने कभी जंग का अभ्यास किया और न ही सरफराज अहमद के साथियों ने। इन दोनों ने ही क्रिकेट का रियाज बड़ी शिद्दत से जरूर किया है। तभी तो ये दोनों फाइनल खेल रहे हैं। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दोनों पर बेइंतहां दबाव रहा।

न हमारी सैन्य क्षमताओं के सामने वो कहीं ठहरते हैं। न उनका अर्थतंत्र हमारे मुकाबले कहीं खड़ा होता है। और तो और, उनका लोकतंत्र भी तो हमारे सामने कच्चा और बौना ही है। फिर हम क्रिकेट को युद्ध में तब्दील कर उन्हें बराबरी के मुगालते का मौका भी हम ही देते हैं। देश जीते। इसकी ख्वाहिश बुरी नहीं है। जश्न अपनी जीत पर जरूर हो। लेकिन दूसरों की हार पर युद्ध जीतने जैसा उन्माद कितना सही है, बहस इस पर भी हो। और एक मैच में हार जाने पर लुट जाने के अहसास पर भी।

क्रिकेटर कभी नहीं कहते कि वो जंग लड़ने जा रहे हैं। क्रिकेटर कभी नहीं कहते कि 365 दिनों में वो कितने दिन क्रिकेट खेलने में सहज हैं। तय बाजार करता है। तय बाजार से गठबंधन करके बैठे प्रबंधक करते हैं। डेढ़ महीने का आईपीएल। फिर इंग्लैंड से सीरीज। फिर चैंपियंस ट्रॉफी। और अब वेस्टइंडीज के साथ सीरीज। और फिर श्रीलंका का दौरा। सिलसिला जारी रहना है।

क्रिकेटर टकसाल हैं। बीसीसीआई रिजर्व बैंक। और इसके कर्ता-धर्ता ऐसी 'सरकार', जिसकी चिंता सिर्फ राजकोष बढ़ाने की है। सामाजिक जिम्मेदारियों से किसी का कोई सरोकार नहीं। न क्रिकेट की अति से खिलाड़ियों को हो रहे नुकसान की चिंता, न खुद क्रिकेट के हो रहे कबाड़े का गम।

क्रिस गेल, केरेन पोलार्ड, सुनील नारायण अपने देश के लिए क्रिकेट खेलने को लेकर अनमने हैं। खेलना ही नहीं चाहते। वजह सबको पता है। एक तरफ आईपीएल नाम का धनवान दैत्य है। और दूसरी तरफ कैरेबियाई कंगाल क्रिकेट बोर्ड। कभी क्रिकेट पर राज करने वाली विंडीज की टीम अगर आज गर्त में है, तो किसी ने इसकी वजह में जाने और उसे दूर करने की कोशिश नहीं की। क्या ये क्रिकेट के लिए खतरनाक स्थिति नहीं है? अगर हम क्रिकेट से प्यार करते हैं, तो हमें बीसीसीआई की दादागीरी पर गर्व नहीं करना चाहिए। भले ही हम भारतीय हैं।

बल्कि अगर हम क्रिकेट से प्यार करते हैं, तो क्रिकेट के व्यापक हित में होने वाले फैसलों के साथ खड़े होना चाहिए। आईपीएल बुरा नहीं है। ये सैकड़ों क्रिकेटरों को आगे आने का जरिया बना है। लेकिन एक लीग को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर नकारात्मक असर डालने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

 

कोहली हर मैच से पहले कहते हैं। धोनी भी कहते थे। कि वो किसी भी मुकाबले को बस एक मुकाबले की तरह लेंगे। ऐसा कहते हुए वो दरअसल, प्रार्थना कर रहे होते हैं कि खेल को युद्ध न बनाओ। लेकिन बाजार का भला क्रिकेट को युद्ध और भारत-पाकिस्तान मैच को विश्व युद्ध बनाने में ही है। और बाजार यही करता है। माफ कीजिएगा। बाजार का एक हिस्सा मीडिया भी है। बड़ा हिस्सा है। तभी तो इस एक मैच को ओलंपिक से ज्यादा दर्शक मिलते हैं। कमाई अरबों में पहुंचती है। कम या ज्यादा। कुछ न कुछ हर किसी के हिस्से में आता है।

 

और हां, पाकिस्तान चैंपियंस ट्रॉफी का नया चैंपियन है। देखें तो बाजार के लिए ये खबर भी कम अच्छी नहीं है। घरेलू परेशानियों की वजह से पाकिस्तान का क्रिकेट दम तोड़ रहा था। बमुश्किल आठवीं रैंकिंग की टीम बनकर उसे आईसीसी के इस टूर्नामेंट में दाखिला मिला था। इस जीत से बहुत कुछ बदलेगा। पाकिस्तान की धरती पर फिर से क्रिकेट शुरू करने की मांग उठेगी। पाकिस्तानी कप्तान सरफराज ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। भारत की तरह ही एक और जुनूनी देश में क्रिकेट का बाजार जी उठेगा। 

क्रिकेट बाजार से चलता है। और बाजार जुनून के सहारे। क्रिकेट के असल चरित्र और संस्कार तो कब के चले गए। इस क्रिकेट पर अपने आंसू न खर्चें। क्रिकेट के बाजार के साहूकार आपके आंसुओं को भी कैश कर लेंगे। पाकिस्तान की जीत से क्रिकेट जीता है। क्रिकेट अनिश्चित था। अनिश्चित रहेगा। भारत हारा नहीं है। भारत की जीत को निश्चित मान लेने वाले हारे हैं।


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अश्विनी कुमार

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में आउटपुट एडिटर हैं

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