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वो कौन सी उलझन थी, जिसे पूरी जिंदगी सुलझा नहीं पाए गुरुदत्त (पुण्यतिथि विशेष)

आरती यादव, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 10 , 2017 , 10:10 IST | मुंबई

अपनी विशेष फिल्म स्टाइल के लिए नाम और शोहरत कमाने वाले गुरुदत्त की मंग्लवार को पुण्यतिथि है। कर्नाटक के मंगलूर में 3 जुलाई 1925 को जन्मे गुरुदत्त का पूरा नाम शिवशंकर पादुकोण था। गुरुदत्त की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता में हुई।

कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ दिनों के लिए एक कंपनी में टेलिफोन ऑपरेटर की नौकरी की। नृत्य के लिए गुरुदत्त के पैर शुरू से ही बेचैन रहा करते थे। कोलकाता में एक समारोह में उनकी मुलाकात विख्यात नृत्यकार उदय शंकर से हुई। नृत्य के प्रति उनके जुनून के बारे में जानकर उदय शंकर ने उन्हें अल्मोड़ा आने का निमंत्रण दिया जहां उदय शंकर, नृत्य प्रशिक्षण संस्थान का संचालन करते थे। गुरुदत्त उनके पास पहुंच गए और साल भर उनसे नृत्य सीखते रहे।

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उदय जी के पास ही गुरुदत्त को एहसास हो गया कि फिल्मों में वे ना सिर्फ़ अपनी प्रतिभा का सही इस्तेमाल कर पाएंगे बल्कि रोज़गार से भी नाता जुड़ जाएगा। गुरुदत्त पुणे पहुंचे और थोड़े संघर्ष के बाद उन्हें प्रभात फ़िल्म कंपनी में काम मिल गया। 1945 में फ़िल्म 'लाखारानी' से उन्होंने करियर शुरू किया। 1946 में फ़िल्म 'हम एक हैं' में उन्होंने सहायक निर्देशक और नृत्य निर्देशक की ज़िम्मेदारी निभायी।1947 में प्रभात फिल्म कंपनी से गुरुदत्त का अनुबंध समाप्त हो गया।

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उन दिनों गुरुदत्त उन्हीं की तरह संघर्ष कर रहे देवानंद और रहमान के साथ एक कमरे में रहा करते थे। फिर गुरुदत्त मुंबई चले आए वे करीब लगभग 10 माह तक बेरोजगार रहे। इस दौरान उन्होंने अंग्रेजी भाषा में लिखना शुरू किया। उन्होंने ‘इलेस्ट्रेड वीकली’ में कई कहानियां लिखीं। फिर उन्होंने अमिय चक्रवर्ती और ज्ञान मुखर्जी जैसे निर्देशकों के साथ काम किया। देवानंद, रहमान और गुरुदत्त ने एक दूसरे से वादा किया था कि जब भी उन्हें काम का मौक़ा मिलेगा तो एक दूसरे को याद रखेंगे और जब देवानंद ने फ़िल्म "बाज़ी (1951)" बनाने का फ़ैसला किया तो निर्देशन की कमान गुरुदत्त को सौंपी।

फ़िल्म हिट रही। इस फिल्म के निर्माण के दौरान गुरुदत्त की मुलाकात गीता दत्त से हुई 1953 में दोनों ने शादी कर ली। 'बाज़ी' के बाद की गुरुदत्त की निर्देशित दो फ़िल्में 'जाल' और 'बाज़' व्यावसायिक रूप से फ्लॉप रहीं। 'बाज़' में गुरुदत्त हीरो बनकर पर्दे पर उतरे थे।

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गुरुदत्त को लगने लगा था कि जो वे करना चाहते हैं उसके लिए उन्हें फिल्म निर्माता भी बनना होगा। उन्होंने अपनी फ़िल्म कंपनी बना ली और उस बैनर पर पहली फ़िल्म 'आर पार (1954)' बनायी। फ़िल्म के गीत संगीत को खूब सराहना मिली। इसके बाद गुरुदत्त ने "मि.एण्ड मिसेस 55"(1955) बनायी। ओपी नैय्यर के संगीत से सजी इस फ़िल्म के गाने खूब चले।

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खासकर ठंडी हवा काली घटा आ ही गयी झूम के (गीतादत्त)", और "जाने कहां मेरा जिगर गया जी, अभी अभी यहीं था किधर गया जी (गीतादत्त और रफ़ी)" आज भी पसंद किये जाते हैं। उन्होंने आगे भी जितनी फ़िल्में बनायीं उनमें गीत संगीत का संयोजन बेमिसाल रहा। 'चौदहवीं का चांद' को तो हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ संगीत प्रधान फ़िल्मों में से एक गिना जाता है। उनकी फ़िल्मों के संगीत का आकर्षण आधी सदी से लगातार जादू जगा रहा है।

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इसके बाद गुरुदत्त ने जो फ़िल्में बनायीं उनमें प्यासा (1957) कागज़ के फूल (1959) और साहब बीवी गुलाम (1962) ने भारतीय फ़िल्मों के इतिहास में मील के पत्थर का काम किया। इन तीनो फ़िल्मों के निर्देशक और अभिनेता गुरुदत्त एक रूप हो गए। 'कागज के फूल' को तब एक असफ़ल फ़िल्म करार दिया गया था।

निर्देशक गुरुदत्त और अभिनेता गुरुदत्त पर ध्यान दें तो यह बात साफ़ हो जाती है कि अभिनेता गुरुदत्त का कद थोड़ा छोटा है। इसका एहसास खुद उन्हें भी था। अभिनय कभी उनकी पहली पसंद नही रही इसी वजह से 'प्यासा' के लिए उन्होंने पहले दिलीप कुमार का चयन किया था। फिर भी जब जब गुरुदत्त पर्दे पर आए उनके सरल संवेदनशील और नैसर्गिक अभिनय का लोहा सबने माना। गुरुदत्त के खाते में फ़िल्मों की संख्या कम है, लेकिन विषय,तकनीक और अभिनय के मामले में उनकी फ़िल्मों ने दिशा निर्धारित की।

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गुरुदत्त के जीवन में गीता दत्त के आने के बाद भी पता नहीं दिल का कौन सा खाली खोना था जिसमें वहीदा रहमान रहने लगीं। जैसे-जैसे वहीदा रहमान से उनकी नज़दीकियां बढ़ती गयीं वैसे वैसे गुरूदत्त इस मुद्दे पर भ्रमित होते गए कि आखिर वो किसे प्यार करते हैं गीता को या वहीदा को।

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रिश्तों को लेकर गुरुदत्त का दिन बन दिन बढ़ता भ्रम एक दिन उनके लिए जानलेवा साबित हुआ। 10 अक्टूबर 1964 को अधिक मात्रा में नींद गोलियां खा लेने से उनका निधन हो गया। तब उनकी आयु थी 39 साल तीन महीने। गुरुदत्त तो अब नहीं रहे, लेकिन जब तक दुनिया में सिनेमा और दर्शक बचे रहेंगे। गुरुदत्त भी ज़िंदा रहेंगे।

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