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ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो... (जगजीत सिंह विशेष)

आरती यादव, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 10 , 2017 , 10:09 IST | मुंबई

गजल सम्राट जगजीत सिंह आज चाहे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी मखमली आवाज आज भी हमारी शिराओं में मिश्री की तरह बहती है। 10 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि है। कई भारतीय भाषाओं में अपनी गायिकी के चलते मील का पत्थर साबित हो चुके जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को बीकानेर के श्रीगंगानगर में हुआ था। बचपन के दिनों से ही जगजीत सिंह संगीत के प्रति रूचि रखा करते थे। उन्होंने संगीत की शिक्षा उस्ताद जमाल खान और पंडित छगनलाल शर्मा से हासिल की।

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शुरूआती शिक्षा के बाद वे पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। साल 1965 में गायक बनने की तमन्ना लिए जगजीत सिंह मुंबई आ गए। अपनी आवाज से लोगों के बीच पहचान बनाने वाले जगजीत सिंह 1969 में मशहूर गायिका चित्रा से प्रेम विवाह रचाया। अर्थ, प्रेमगीत, लीला, सरफरोश, तुम बिन, वीर जारा ये वो फिल्में हैं जिन्होंने उनको हिंदी सिनेमा जगत पर शिखर पर पहुंचाया।

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बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि जब जगजीत मुंबई में नए-नए आए थे, तब उनके पास रहने और खाने के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में घर चलाने के लिए वो शादियों में परफॉर्मेंस दिया करते थे। जगजीत सिंह के इकलौते बेटे विवेक सिंह की साल 1990 में एक कार दुर्घटना में मौत हो गई थी। ये जगजीत की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था। वो 6 महीने तक सदमे में थे। उन्हें इस हादसे से उबरने में काफी वक्त लगा।

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जगजीत सिंह संगीत के ऐसे फनकार थे जिनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है। दिल, मुहब्बत, जज्बात, जुदाई को सुरों में कहना कोई जगजीत सिंह से सीखे। पंजाबी, बंगाली, गुजराती, हिंदी और नेपाली भाषाओं में गाना गाने वाले जगजीत सिंह को पद्मश्री और पद्मविभूषण से नवाजा जा चुका है। उनकी हमसफर चित्रा सिंह जो कि जगजीत सिंह के जाने के बाद से तन्हा रह गयीं का कहना है कि जगजीत सिंह के जाने के बाद उन्होंने गजलें सुननी ही बंद कर दीं हैं, क्योंकि उनकी गजलें सुनकर चित्रा खुद को संभाल नहीं पातीं और उनकी आंखें भर आती हैं।

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जगजीत सिंह की गजल ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हमेशा इंसान को जिदंगी जीने का सबब देता रहेगा। मगर 22 सितंबर 2011 का दिन जगजीत सिंह को मौत और जिंदगी के बीच लाकर खड़ा कर दिया। इसी दिन मुंबई के सन्मुखानंद प्रेक्षागार में जगजीत सिंह का गुलाम अली के साथ कार्यक्रम था, लेकिन कार्यक्रम से पहले ही उन्हें ब्रेन हैमरेज की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। धीरे- धीरे उनकी हालत बिगड़ती गई और 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह साहब ने आखिरी सांसें ली।

यहां सुनिए जगजीत सिंह की मशहूर गजलें


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