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मौत डायर के पीछे-पीछे लंदन तक पहुंच गई... (पुण्यतिथि-शहीद उधम सिंह)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 31 , 2017 , 12:57 IST | नई दिल्ली

देश की आजादी में अपना प्राण न्योछावर करने वाले महान क्रांतिकारी नेता अमर शहीद ऊधम सिंह की आज पुण्यतिथि है। इस मौके पर पूरा देश महान सपूत को याद कर रहा है।जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रतिशोध लेने वाले क्रांतिकारी ऊधम सिंह का जन्म 29 दिसंबर, 1869 को सरदार टहल सिंह के घर हुआ था। ऊधम सिंह के माता-पिता का देहांत बहुत ही कम अवस्था में हो गया था, जिसके कारण परिवार के अन्य लोगों ने उन पर पूरा ध्यान नहीं दिया। काफी समय तक भटकने के बाद अपने छोटे भाई के साथ अमृतसर के पुतलीघर में शरण ली, जहां एक समाजसेवी संस्था ने उनकी सहायता की। 

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मात्र 16 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने बैशाखी के पर्व पर अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार को अपनी आंखों से देखा। सभी लोगों के घटनास्थल से चले जाने के बाद वे वहां फिर गए और वहां की मिट्टी को अपने माथे पर लगाकर कांड के खलनायकों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। 

उन्होंने अमृतसर में एक दुकान भी किराये पर ली। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे अफ्रीका से अमेरिका होते हुए 1923 में इंग्लैंड पहुंच गए। वहीं क्रांतिकारियों से उनका संपर्क हुआ। 1928 में वे भगत सिंह के कहने पर भारत वापस आ गए, लेकिन लाहौर में उन्हें शस्त्र अधिनियिम के उल्लंघन के आरोप में पकड़ लिया गया और चार साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद वे फिर इंग्लैंड चले गए। 

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13 मार्च, 1940 को वह शुभ दिन आ ही गया जब ऊधम सिंह को अपना संकल्प पूरा करने का अवसर मिला। इंग्लैंड की राजधानी लंदन के कैक्स्ट्रन हॉल में एक सभा होने वाली थी। इसमें जलियावांला बाग कांड के दो खलनायक सर माइकल ओ डायर तथा भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लार्ड जेटलैंड आने वाले थे। ऊधम सिंह चुपचाप मंच से कुछ दूरी पर बैठ गए और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। 

सर माइकल ओ डायर ने भारत के खिलाफ खूब जहर उगला। जैसे ही उनका भाषण पूरा हुआ ऊधम सिंह ने ताबड़तोड़ कई गोलियां उनके सीने में उतार दी। वह वहीं गिर गए, लेकिन किस्मत से दूसरा खलनायक भगदड़ की वजह से बचने में कामयाब हो गया। भगदड़ का लाभ उठाकर ऊधम सिंह भागे नहीं, बल्कि स्वयं ही अपने आप को गिरफ्तार करवा लिया। 

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न्यायालय में ऊधम सिंह ने सभी आरोपों को स्वीकार करते हुए कहा,

मैं 21 वर्षो से प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा था। डायर और जैटलैंड मेरे देश की आत्मा को कुचलना चाहते थे। इसका विरोध करना मेरा कर्तव्य था। न्यायालय के आदेश पर 31 जुलाई, 1940 को पेंटनविला जेल में ऊधम को फांसी दे दी गई।


स्वतंत्रता प्राप्ति के 27 साल बाद 16 जुलाई, 1974 को उनके भस्मावशेषों को भारत लाया गया तथा पांच दिन बाद हरिद्वार में प्रवाहित किया गया।


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