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विज्ञापन को लेकर डव की हुई किरकिरी, नस्लभेदी होने का लगा आरोप

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 9 , 2017 , 14:07 IST | नई दिल्ली

जानी-मानी कंपनी यूनीलिवर के पर्सनल केयर ब्रांड 'डव' के एक नए विज्ञापन कैंपेन पर विवाद शुरू हो गया है। डव ने एक साथ ऐसी कई तस्वीरें दिखाई थीं, जो सीधे तौर पर नस्लभेदी थी। इसमें दिखाया गया है कि एक अश्वेत महिला बाथरूम में है और उसके बगल में एक बॉडी वॉश रखा हआ है।

महिला अपनी ब्राउन (भूरी रंग की) टीशर्ट उतारती है और उसके बाद अगली तस्वीर में एक श्वेत महिला मुस्कुराती हुई दिखाई देती है। इस नए विज्ञापन के जारी होते ही नस्लभेदी होने के आरोप में कंपनी के खिलाफ विरोध शुरू हो गया।

'डव' ने अपने फेसबुक पेज से 'तीन सेकंड का वीडियो क्लिप' डिलीट कर दिया है, और रंगभेद को लेकर असंवेदनशील विज्ञापन के लिए माफी मांगते हुए कहा है कि कंपनी 'महिलाओं के रंग को सही तरीके से पेश करने में नाकाम रही...'

डव ने सोशल मीडिया पर विवाद पैदा कर देने वाले विज्ञापन को हटा लेने के बाद कहा, "एक ऐसी तस्वीर जो हमने फेसबुक पर पोस्ट की थी, महिलाओं के रंग को सोच-विचारकर सही तरीके से पेश करने में नाकाम रही... इस तस्वीर की वजह से जो अपमान हुआ, उसके लिए हमें बेहद खेद है..."

कंपनी ने यह भी कहा, "डव विभिन्नता की खूबसूरती का प्रतिनिधित्व करने के प्रति कटिबद्ध है... जो फीडबैक हमें मिला है, अहम है, और हम उसे भविष्य में खुद को निर्देशित करने के लिए इस्तेमाल करेंगे..." इस विज्ञापन से उपभोक्ताओं में भारी नाराज़गी देखी गई थी... एक फेसबुक यूज़र ने लिखा था, "यह भद्दा है... आपको लगता है, गहरे रंग वाले लोग अपने शरीर से मेलेनिन को धो सकते हैं, और गोरे हो सकते हैं... आप दरअसल जा किस दिशा में रहे हैं...? आपको अपने क्रिएटिव डायरेक्टर को निकाल देना चाहिए..."

अमेरिका के वॉशिंग्टन पोस्ट ने भी इस बारे में सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब डव या उससे जुड़ी हुई किसी कंपनी की तरफ से नहीं दिया गया है। किसी साबुन के इस्तेमाल के बाद अश्वेत महिला का गोरा हो जाना एक नस्ल भेदी संदेश देता है। इससे ऐसा लगता है कि अश्वेत होना और गंदा होना एक जैसा है।

एटलांटा में एमोरी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर एबागेल सिवेल (34) ने फेसबुक पर लिखा, डव की मार्केटिंग टीम मौलिक रूप से जातिवादी है। एक साफ शरीर श्वेत शरीर नहीं है। अश्वेत शरीर व्यवस्थित रूप से गंदा नहीं है। मैंने हमेशा से ही डव के उत्पादों को उपयोग किया है, लेकिन अब समय आ गया है, जब उसे छोड़ दिया जाए।

उल्लेखनीय है कि साबुन विज्ञापनों में नस्लवाद की एक ऐतिहासिक विरासत है। इसी तरह का एक विज्ञापन पहले नीविया कंपनी ने भी शुरू किया था, जिसकी टैग लाइन थी 'सफेद पवित्र है' (white is pure)।


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