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कौन और क्यों करे खेती?

icon वीरमा राम | 12
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| जून 17 , 2017 , 16:59 IST 123

वैसे तो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसान पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे हैं लेकिन सरकार या फिर मीडिया, किसी ने ज्यादा गंभीरता से लिया नहीं। इसमें वर्तमान व्यवस्था को कोसने का भी कोई मतलब नहीं है क्योंकि पिछले दो दशकों में न तो कोई बड़ा किसान आंदोलन हुआ है और न ही उन्हें कभी गंभीरता से लिया गया। (आखिरी बार राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में किसान 1988 में जुटे थे जब करीब 5 लाख किसानों ने बोट क्लब इलाके महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में लम्बा डेरा डाला था)। किसानों की इसी उपेक्षा का नतीजा थी मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच, इंदौर आदि जिलों में हिंसा और फायरिंग, जिसमें 6 किसानों की जान चली गई।

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किसान बेचारा मजबूरी में सड़क पर उतरा है। सब जानते हैं किसानी घाटे का सौदा बन चुकी है। आंकड़े बताते हैं पिछले दो दशकों में खेती की लागत कई गुना बढ़ चुकी है। मसलन बीज, खाद, दवा के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। खेती के दूसरे संसाधनों पानी, बिजली और सिंचित जमीन की किल्लत पहले से अब कहीं ज्यादा है। खत्म होती जमीन की उर्वरता भी बेहद महंगी दवाओं के भरोसे ही है। दूसरी तरफ से खेती से आमदनी स्थिर है, यहां तक कि यह ऋणात्मक भी है।

उदाहरण मेरे गृह जिले से ही हैं। कुछ दिन पहले ही जालोर जिले के नोहरा गांव के बुधा राम जी पूनिया दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि 1980 के दशक में उनके गांव में 20-25 फीट पर पानी था लेकिन अब पानी 500 फीट से भी ज्यादा नीचे जा चुका है। पूरे इलाके में कुएं तो बचे ही नहीं और आप बोरवेल खुदवा नहीं सकते क्योंकि सरकार ने इलाके को ‘डार्क जोन’ घोषित कर दिया है।

पहले तेल सस्ता था, रेस्टन, प्रेमशक्ति जैसी मशीनें चौबीस घंटे चला करती थीं, आज बिजली का कोई भरोसा नहीं है। बुधजी ने अपने जमाने को बेहद खूबसूरत (अंग्रेजी में – nostalgic) बताते हुए कहा कि उस दौर में हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी लेकिन फिर भी खेती में मजा आता था लेकिन आज के मशीनीकरण के दौर में, जहां खेती अपेक्षाकृत आसान हो चुकी है, कोई भी खेती नहीं करना चाहता। यहां बताते चलें कि बुधजी के बेटे खेती नहीं करते और अगली पीढ़ी का तो बिल्कुल भी इरादा नहीं है। करे भी क्यों जब किसानी घाटे का सौदा बन चुकी हो।

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अब एक नजर आंकड़ों पर। गुजरात की मशहूर ऊंझा मंडी में 2012 में जीरे के भाव करीब 142 रुपये प्रति किलो थे और 5 जून को यह भाव 150.6 रुपये प्रति किलो था। पांच साल पहले खुदरा बाजार में जीरा करीब 300 रुपये प्रति किलो मिलता था आज इसकी कीमत 450 रुपये प्रति किलो है। (बिग बास्केट पर एग्रो फ्रेश नाम का ब्रांड)। मतलब, मंडी में जहां जीरे की कीमत में 8-10 रुपये प्रति किलो इजाफा हुआ है वहीं खुदरा बाजार में यह इजाफा करीब 150 रुपये है।

यहां आप एक किसान को हो रहे मुनाफे और एक व्यापारी को हो रहे मुनाफे का फर्क समझ गए होंगे। किसान से बाजार तक माल आने में आढ़तिये का कमीशन, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्ट की मामूली लागत शामिल है, लेकिन यह लागत इतनी भी नहीं है जिस माल को किसान मंडी में बेच रहा है वो ही माल खुदरा बाजार में 3 गुना ज्यादा कीमत पर बिके।

अब जरा हमारे इलाके, जालौर-बाड़मेर (राजस्थान), में होने वाले कुछ और कृषि उत्पादों की कीमतों पर भी नजर डाल लेते हैं। (यहां भी ऊंझा मंडी के आधिकारिक भाव)। मंडी में इसबगोल की कीमत 2012 में 79.5 रुपये प्रति किलो थी जो आज पांच साल बाद मामूली इजाफे के बाद 5 जून को 91.25 रुपये प्रति किलो पर पहुंची है। इसके बाजारू उत्पाद की बात करें तो इसबगोल के साबूत दानों के डाबर ब्रांड की 100 ग्राम की एक डिबिया 100 रुपये में मिलती है यानि एक हजार रुपये प्रति किलो।

वहीं एक और उत्पाद ‘रायड़ा’ (सरसों का ही भाई, लेकिन रंग में काला) की मंडी में इन दिनों कीमत 31.4 रुपये प्रति किलो है जो साल 2012 में 30.5 रुपये प्रति किलो थी। यानि पिछले पांच साल में रायड़े की कीमत में एक रुपये से भी कम का इजाफा हुआ है वहीं बाजार में उपलब्ध इसके उत्पाद की बात करें तो ‘धारा’ ब्रांड का तेल 2012 में 110 रुपये प्रति लीटर मिलता था, अब उसकी कीमत बढ़कर 160 रुपये प्रति लीटर हो गई है। दोनों जगह उत्पाद और मात्रा समान। यानि किसान के उत्पाद की कीमत में 1 रुपये का इजाफा और व्यापारी के उत्पाद की कीमत में 50 रुपये का इजाफा।

एक और तथ्य, जिस रायड़े को किसान मंडी में 30 रुपये प्रति किलो बेचता है वो ही बाजार में ‘ब्रांड’ विशेष के साथ करीब 10 गुना ज्यादा कीमत में बिकता है, मसलन ‘विक्ट्री राय’ ब्रांड के साथ रायड़े के दाने 220 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकते हैं और इसी में ‘आर्गेनिक’ शब्द जोड़ ‘24 मन्त्र’ नाम का ब्रांड 350 रुपये प्रति किलो के दाम में बिकता है। मंडी से बाजार तक भाव में इतना फर्क कैसे आ जाता है यह किसी की जवाबदेही में नहीं आता। दुर्भाग्य से किसान अकेला ऐसा उत्पादक है जिसके उत्पाद की कीमत बाजार तय करता है। बाकि उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत खुद तय करते हैं।

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खैर, हाल ही में देश के सबसे बड़े (चीफ) आर्थिक सलाहकार और स्टीफंस, IIM और ऑक्सफोर्ड में पढ़े अरविंद सुब्रमण्यन ने निसंदेह कई अच्छी बातें कही है। लेकिन सरकार को इस दिशा में जमीनी स्तर पर बड़ा काम करना होगा। हालांकि, पूरे मामले में महज सरकारों को दोष देना भी उचित नहीं होगा। अब न तो महेंद्र सिंह टिकैत, शरद अनंतराव जोशी जैसे किसान नेता रहे (हां, महाराष्ट्र में शरद जोशी के चेले रहे राजू शेट्टी जैसे लोग अब भी थोड़े बहुत प्रासंगिक)। और न ही मीडिया में किसानों के लिए कोई जगह बची। किसी दौर में किसान और किसानी पर गंभीर लेखन पढ़ने को मिलता था लेकिन वर्तमान दौर में ऐसी कोई जमात दिखती भी नहीं। वैसे मीडिया की भी मजबूरी है क्योंकि किसानी कोई रोमांटिक चीज तो है नहीं और न ही किसान कोई सेलेब्रिटी। ऐसे में मीडिया के मुनाफे की वेव लेंथ पर वो (किसान) बिल्कुल फिट नहीं बैठता।

एक किसान आंदोलन मेरे गृह जिले में भी कई बरसों से चल रहा है। विक्रम सिंह पूनासा की अगुवाई में किसान कुछ पहाड़ों में सुरंग बनाकर राजस्थान के जालोर-सिरोही-बाड़मेर की बंजर और सूखी धरती तक पानी लाने की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार के मुताबिक यह अव्यावहारिक है (इसमें लागत भी एक कारक)। वैसे दिल्ली में मेट्रो ट्रेन के एक रूट की लागत और पानी लाने की इस योजना की लागत लगभग बराबर ही है। लेकिन सरकार की नजर में गांव और शहर के ‘कल्याण’ में फर्क है। यह चीज पूनासा और उनके साथी भी जानते हैं लेकिन संघर्ष तो कर ही रहे हैं।