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ट्रंप के अमेरिका में पहली बार मोदी, इन 7 मुद्दों पर होगी अहम वार्ता

वीरमा राम, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 2
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| जून 24 , 2017 , 15:26 IST | नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली मर्तबा 'राष्ट्रपति' डोनल्ड ट्रंप से मिलने जा रहे हैं। हालांकि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों नेता कम से कम तीन बार फोन पर बतिया चुके हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 और 26 जून को अमेरिका के दौरे (इस बार सिर्फ वाशिंगटन डीसी में) पर हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से भी पीएम मोदी की अलग-अलग मंचों पर रिकार्ड आठ बार मुलाकात हुई है। मोदी और ओबामा मिलकर भारत-अमेरिकी रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले गए लेकिन मोदी का यह अमेरिका दौरा उनका सबसे चुनौतीपूर्ण विदेश दौरा माना जा रहा है। इस चुनौती की सबसे बड़ी वजह है, अमेरिका में बदला हुआ निजाम और द्विपक्षीय रिश्तों में हाल में आई ठंडक।

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तो शुरुआत इस निजाम की कहानी से ही। डोनल्ड ट्रंप नाम का यह शख्स अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पूरी दुनिया को एक के बाद एक सरप्राइज (या झटके भी कह सकते हैं) दे रहा है। मसलन, चुनाव प्रचार और चुनाव जीतने के बाद भी ट्रंप ने चीन को खूब बुरा-भला कहा था लेकिन उन्होंने चीन को तुरंत गले भी लगा लिया। पिछले महीने जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका गए तो ट्रंप परिवार ने उनकी दिल खोलकर आवभगत की। जिनपिंग दम्पत्ति को ट्रंप परिवार फ्लोरिडा स्थित अपने निजी और शानोशौकत के प्रतीक मार-अ-लागो रिसोर्ट भी ले गए (खूब नाच गाना भी हुआ)।

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चीन को लेकर पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की ‘नपी-तुली’ रणनीति के उलट ‘घेरने’ की रणनीति की वकालत करने वाले स्वच्छंदतावादी ट्रंप ने चुनाव के बाद पलटी मार दी। वजह बताई कि उत्तर कोरिया से निपटने और व्यापार के लिए चीन जरूरी है लेकिन चीन प्रति अचानक से पैदा हुई ट्रंप की नरमी और मोहब्बत से जापान जैसे अमेरिका के परम्परागत और करीबी सहयोगी तक को आपत्ति दर्ज करवानी पड़ी।

7 मुस्लिम देशों के ट्रैवल पर लगाया बैन

ट्रंप का दूसरा सरप्राइज, चुनाव जीतने के बाद इस्लामिक दुनिया के 7 देशों के नागरिकों पर ट्रेवल बैन लगा दिया लेकिन आतंकवाद की सबसे ज्यादा पौध तैयार करने वाले पाकिस्तान जैसे देश को उन्होंने इस 'बैन' की फेहरिस्त से बाहर रखा, साथ ही पाकिस्तान को लेकर हमदर्दी भी जताते रहे। इतना ही नहीं ट्रंप ने बतौर राष्ट्रपति अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए इस्लामिक वर्ल्ड (सुन्नी) के मुखिया देश सऊदी अरब को ही चुना। यहां याद रखना जरूरी है कि ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान मुसलमानों को खूब कोसा था।

भारत को दिए बड़े झटके

वैसे राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप भारत को भी कम से कम दो बड़े झटके (सरप्राइज) दे चुके हैं। पहला, IT इंडस्ट्री को लेकर पॉलिसी के जरिए जिसमें H-1B की वीजा को लेकर कुछ बंदिशें लगा दी गई है। 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के तहत ट्रंप का सीधा-सा मकसद है कि आने वाले 5-7 सालों में अमेरिकन इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में लगभग सभी भारतीयों की जगह अमेरिकियों को भर देना। साफ है भारत-अमेरिकी रिश्तों में मौजूदा ठंडक की बड़ी वजह ट्रंप की यह योजना है।

दूसरा बड़ा झटका ट्रंप ने पर्यावरण पर पेरिस समझौते को लेकर दिया। भारत को खरी-खोटी सुनाते ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस समझौते से अलग कर दिया। अपने चिर-परिचित अंदाज में अतिशयोक्तिपूर्ण झूठ बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर इस तरह की वार्ताओं की आड़ में विदेशी सहायता के नाम पर अथाह पैसे लेने ("billions and billions and billions") का आरोप भी लगा दिया लेकिन यहां उन्होंने इस तथ्य पर गौर करना मुनासिब नहीं समझा कि भारत को साल 2015 में 3.1 बिलियन डॉलर विदेशी सहायता मिली थी जिसमें अमेरिका का हिस्सा महज 100 मिलियन डॉलर ही है। और आने वाले दो साल में अमेरिकी सहायता में 34 मिलियन डॉलर की गिरावट अपेक्षित है। ट्रंप के इसी तथ्यहीन बकवास के चलते मोदी के वर्तमान अमेरिकी दौर को रद्द करने तक की नौबत आ गई थी।

ट्रंप एक बिजनेस एनिमल हैं और सऊदी अरब के साथ हथियारों का सौदा भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। हां, ट्रंप के दौर में परंपरागत अमेरिकी कूटनीति में बदलाव साफ देखा जा सकता है ऐसे में ट्रंप को TPP जैसी कई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं से भी दिक्कत है। हालांकि कई जानकार मानते हैं कि विदेशी मोर्चे पर ट्रंप की रणनीतियों के चलते चीन आने वाले समय मे सुपरपॉवर का स्टेटस अमेरिका से छीन लेगा।

क्या होगा वार्ता की टेबल पर

खैर, बात अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की टू-डू लिस्ट की

इमीग्रेशन

इस लिस्ट में सबसे ऊपर है, इमीग्रेशन का मसला। भारत सरकार साफ कर ही चुकी है कि मोदी के एजेंडे में H-1B वीजा का मसला सबसे ऊपर है। चूंकि ट्रंप की पहली प्राथमिकता अमेरिका में अमेरिकियों के लिए नौकरी पैदा करना है ऐसे में भारतीय IT कंपनियों और इंजीनियर्स के लिए कुछ खास खुशखबरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। 26 जून को दोनों नेताओं के बीच होने वाली आधिकारिक वार्ता के बाद इस मसले पर यदि कुछ सार्थक परिणाम सामने आता है तो वो एक और सरप्राइज ही होगा।

व्यापार

वार्ता में व्यापार दूसरा अहम मसला होगा। व्यापार को लेकर ट्रंप का रुझान भारत के लिए आशावादी चीज है लेकिन यहां ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति मोदी की 'मेक इन इंडिया' और 'डिजिटल इंडिया' जैसी पहल की विरोधाभासी है। हां, हथियारों और अमेरिकी जंगी हवाई जहाजों की खरीद पर बात बन सकती है और इसी सौदे से मोदी कुछ संतुष्टि भी कर सकते हैं। ट्रंप के पहले विदेशी दौरे से एक और चीज सामने आई कि वो अमेरिकी हथियार बेचने को लेकर खासे उतावले हैं। वैसे टाटा समूह और लॉकहिड मार्टिन की डील के साथ इस दिशा में शुरुआत भी हो चुकी है जिसे ‘मेक इन इंडिया’ से भी जोड़ा जा रहा है।

आणविक सहयोग

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में ओबामा के दौर में भारत-अमेरिका बड़े सहयोग की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन परमाणु रिएक्टर बनाने वाली कंपनी वेस्टिंगहाउस के दिवालिएपन की अर्जी के बाद भावी समझौता खटाई में पड़ता दिखाई दे रहा है। पहले NPCIL और वेस्टिंगहाउस आंध्र प्रदेश में 6 परमाणु रिएक्टर लगाने के लिए एक समझौता करने वाले थे। यह समझौता 2008 के ‘इंडो-यूएस न्यूक्लियर एग्रीमेंट’ का ही हिस्सा है लेकिन इस पर बात बनती दिखाई नहीं दे रही। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि परमाणु सहयोग पर ट्रंप का दृष्टिकोण अभी तक साफ नहीं हो पाया है।

हैंडशैकिंग पर नजर

प्रधानमंत्री मोदी की एक खास बात रही है, दुनिया के बड़े नेताओं के साथ उनकी पर्सनल केमिस्ट्री। देखना होगा कि ट्रंप के साथ उनकी जोड़ी कितनी फिट बैठती है। हां, नजर मोदी और ट्रंप की हैंडशैकिंग (हाथ मिलाने पर) पर भी रहेगी क्योंकि ट्रंप जिस मसखरेपन के साथ हाथ मिलाते हैं वो दुनिया के कई नेताओं के लिए बड़ा बुरा और असहज करने वाला अनुभव रहा है। जापान के राष्ट्रपति शिंजो अबे और फ्रेंच राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रॉन का अनुभव इस मामले में सबसे डरावना था।

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इस बार भी होगा मोदी-मोदी

प्रधानमंत्री मोदी जब भी अमेरिका गए प्रवासी भारतीयों की 'मोदी-मोदी' की गूंज पूरी दुनिया ने सुनी। पिछली मर्तबा प्रधानमंत्री मोदी ने जब ओवल ऑफिस (अमेरिकी राष्ट्रपति का दफ्तर, व्हाइट हाउस का ही हिस्सा) में कदम रखा तो राष्ट्रपति ओबामा प्रवासी भारतीयों द्वारा मोदी इस तरह के स्वागत को लेकर गदगद थे लेकिन इस बार क्या मैडिसन स्क्वायर जैसा भव्य कार्यक्रम (स्वागत) होगा या फिर होता है तो ट्रंप उसे कैसे लेते हैं ये देखने वाली बात होगी। निःसन्देह प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा अप्रवासी भारतीयों के बीच जारी रहेगा और शलभ कुमार जैसे लोग मेगा इवेंट की तैयारी में जुटे भी हुए हैं।

ट्रंप के भारत में निजी व्यवसायिक हित

ट्रंप ने साल भर पहले भारतीय बाजार में निवेश को लेकर बड़ी रूचि दिखाई थी लेकिन हालिया खबरों के मुताबिक ट्रंप भारत में निवेश को लेकर ज्यादा इच्छुक नहीं हैं, उलटे रियल एस्टेट सेक्टर में मंदी के चलते उनके मौजूदा भारतीय प्रोजेक्ट्स से भी पीछे हटने की अटकलें लगाई जाने लगी. ‘ट्रंप आर्गेनाइजेशन’ के फिलहाल पांच बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट भारत में चल रहे हैं. भारत को इन प्रोजेक्ट्स से सिर्फ ट्रंप का ब्रांड नेम ही मिल रहा है, पैसे के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं. शातिर ट्रंप ने भारत में बिना एक पैसा निवेश किए स्थानीय डेवलपर्स के साथ सिर्फ ब्रांड-लाइसेंसिंग एग्रीमेंट कर रखा है.

कहां खड़े हो रहे हैं ‘ट्रंप टावर्स’

मुंबई - लोअर परेल में 300 अपार्टमेंट्स वाले 75 मंजिला टावर को मारवाड़ी सेठ लोढ़ा बिल्डर्स बना रहे हैं

पुणे - कल्याणी नगर में 23 मंजिला बिल्डिंग, चोरडिय़ा मारवाड़ी सेठों की पंचशील रियलिटी नाम की कंपनी खड़ा कर रही है

गुड़गांव - गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड पर बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल के रिश्तेदार ललित गोयल की कंपनी IREO एक आलीशान ऑफिस बिल्डिंग खड़ी कर रही है

गुड़गांव - बसंत और रूप बंसल की रियल एस्टेट कंपनी M3M इंडिया एक रेसिडेंशियल बिल्डिंग तैयार कर रही है

कोलकाता - 28 मंजिला रेसिडेंशियल बिल्डिंग को मारवाड़ी सेठ हर्ष वर्धन पाटोदिया का यूनिमार्क ग्रुप खड़ा कर रहा है

भारत-अमेरिका सम्बन्ध: कुछ तथ्य

बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन मर्तबा अमेरिका जा चुके हैं। पहली बार 27 से 30 सितम्बर 2014, दूसरी बार सितम्बर 2015 और तीसरी बार 7-8 जून 2016
पिछले तीनों अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं। बिल क्लिंटन मार्च 2000 में, जॉर्ज बुश मार्च 2006 में और बराक ओबामा दो बार नवम्बर 2010 और जनवरी 2015 (गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि) को भारत आए। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 1978 (जिमी कार्टर) के बाद सन 2000 में कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आया था लेकिन उसके बाद यह सिलसिला बदस्तूर जारी है

1949 में नेहरू बतौर प्रधानमंत्री पहली बार अमेरिका गए थे और उस दौरान कश्मीर मसले पर नेहरू ने अमेरिका की तीसरी पार्टी की मध्यस्थता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसके चलते भारत और अमेरिका लम्बे समय तक एक-दूसरे को शंका की नजर से देखते रहे

अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है (चीन पहले स्थान पर), वहीं अमेरिका के लिए व्यापार के मामले में भारत 9वां सबसे बड़ा भागीदार है
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में अमेरिका पहले नंबर पर है

दोनों देशों के बीच पिछले दस सालों में द्विपक्षीय व्यापार दोगुने से भी ज्यादा हो गया है जो 2006 के 45.1 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2016 में 115 बिलियन डॉलर हो गया। हालांकि इस दरम्यान अमेरिका के साथ भारत का व्यापार-घाटा भी बढ़ा है जो 2006 में 12.7 बिलियन डॉलर था लेकिन 2016 में 30.8 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया

भारत-अमेरिका के बीच पिछले 15 सालों में सामरिक रिश्ते (सैन्य और आणविक सहयोग) गुणात्मक रूप से सदृढ़ हुए हैं

दोनों देश पिछले कई वर्षों से ‘युद्ध अभ्यास’ और ‘मालाबार हिल’ जैसी ज्वाइंट मिलिट्री एक्सरसाइज नियमित रूप से कर रहे हैं

2008 के एतिहासिक ‘भारत-यूनाइटेड स्टेट्स सिविल न्यूक्लियर अग्रीमेंट’ (या 123 एग्रीमेंट) को भी दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज एक मील का पत्थर माना जाता है

‘गैलप’ नामक रिसर्च एजेंसी के मुताबिक भारत अमरीकियों की भारत छठा सबसे पसंदीदा देश है जहां 71 फीसदी अमेरिकी भारत को लेकर सकारात्मक राय रखते हैं

अमेरिका में 2010 की जनगणना के मुताबिक भारतीय अमेरिकियों की संख्या कुल जनसंख्या में 0.9% हिस्से के साथ 28 लाख 43 हजार 391 थीं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि 69.37% वृद्धि दर के साथ भारतीय सबसे तेजी से बढ़ने वाला प्रवासी समूह (ethnic group) है

सौ साल पहले अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या 2 हजार 545 थी

1790 में पहली मर्तबा किसी भारतीय की अमरीका में मौजूदगी की पुष्टि होती है। तत्कालीन मद्रास का रहने वाला यह शख्स व्यापार के सिलसिले में अमेरिका गया था
1899 के बाद से अमरीका में सिख किसान बसने शुरू हुए (खासकर कैलिफोर्निया राज्य में)

1912 में केलिफोर्निया के स्टॉकटन में पहले सिख गुरूद्वारे की स्थापना की गई
भारतीय अमेरिकियों में करीब 51% हिंदू, 20% ईसाई, 10% मुसलमान, 5% सिख और जैन धर्म से सम्बन्ध रखते हैं हालांकि 14% भारतीय अमेरिकी खुद को किसी भी धर्म से असंबद्ध बताते हैं

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर पीएचडी कर रहे हैं)

 


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