ख़ास रिपोर्ट

कहीं यह संपादकीय तो नहीं बनी गौरी लंकेश की हत्या की वजह! पढ़िये आखिरी संपादकीय

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
350
| सितंबर 6 , 2017 , 14:14 IST | नई दिल्ली

फॉरवर्ड प्रेस मैग्जीन और वेबसाइट के संपादक प्रमोद रंजन ने अपने फेसबुक पोस्ट पर उन कारणों को गिनाया है, जिससे जाहिर होता है कि गौरी लंकेश की हत्या किन वजहों से हुई होगी। वो लिखते हैं कि- शाम में गौरी लंकेश की हत्या की सूचना आयी। मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं था, लेकिन लिखने-पढ़ने की दुनिया मे हम एक-दूसरे को प्रायः बिना मिले भी जानते हैं।

Lankesh 1

कन्नड़ लेखक योगेश मास्टर का समर्थन करना लंकेश को पड़ा महंगा

प्रमोद रंजन लिखते हैं कि अभी कल ही ईमेल से योगेश मास्टर से बात हुई थी। गत मार्च में आरएसएस के लोगों ने योगेश के चेहरे पर कालिख मल दी थी। जिस कार्यक्रम के दौरान यह घटना हुई, वह साप्ताहिक ‘लंकेश पत्रिके’ का था। आयोजक गौरी लंकेश थीं। उस दिन लंकेश ने अन्य लेखकों के साथ मिलकर योगेश के पक्ष में मार्च निकाला और आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की थीं। मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या का भी तुरंत बयान आया कि आरोपी बख्शे नहीं जाएंगे, लेकिन जैसा कि लेखकों के मामले में होता है, कोई कार्रवाई नहीं हुई। लंकेश खुद भी कई बार कह चुकीं थीं ‘वे’ उन्हें चुप करवा देना चाहते हैं।

योगेश के उपन्यास ‘ढूंढी’ में हिन्दू देवता गणेश का किया गया अपमान

योगेश मास्टर कर्नाटक के चर्चित लेखक हैं। 2013 में उनके उपन्यास ‘ढूंढी’ को लेकर श्रीराम सेना के नेता प्रमोद मुतालिक और उसके सहयोगियों ने हंगामा मचा दिया था। उस मुकदमे में योगेश को गिरफ्तार कर लिया गया था। मुतालिक ने उन पर हिन्दू देवता गणेश का अपमान करने का आरोप लगाया था। पिछले तीन सालों से वे महिषासुर पर एक उपन्यास लिख रहे हैं, जो अब लगभग पूरा हो चुका है।

टैबलायड पत्रिका -लंकेश पत्रिके ब्राह्मणवाद- जातिवाद विरोधी विचारों का सबसे मुखर मंच

गौरी प्रसिद्ध लोहियावादी कवि, लेखक, पत्रकार पी.लंकेश की पुत्री थीं। पी. लंकेश को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। उन्होंने ही ‘लंकेश पत्रिके’ की स्थापना की थी। कन्नड़ का यह टैबलायड ब्राह्मणवाद- जातिवाद विरोधी विचारों का सबसे मुखर मंच रहा है। पिता के मृत्योपरांत गौरी लंकेश इसका संपादन-प्रकाशन करतीं थीं। पिता की वैचारिक विरासत के अतिरिक्त लिंगायत समुदाय की ब्राह्मणवाद विरोधी समृद्ध सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत भी उन्हें मिली थी। उनके नाम के साथ लगा ‘लंकेश’ भी ध्यातव्य है।

पिछले साल उन्होंने बैंगलोर मिरर में ‘रिकलेमिंग महिषासुर’ शीर्षक से एक जोरदार रिपोर्ट लिखी थी। वे कर्नाटक के अतिरिक्त उत्तर भारत मे चल रहे बहुजनों के सांस्कृतिक आंदोलनों की समर्थक थीं।

कुलबर्गी, दाभोलकर और लंकेश की हत्या में समानता

क्या यह महज संयोग है कि 2015 में मारे एम. एम कलबुर्गी भी लिंगायत परिवार से आते थे और जितने मुखर विरोधी ब्राह्मणवाद और मूर्तिपूजा के थे, उतने ही वंचित तबकों में सांस्कृतिक जागरण लाने वाले आंदोलनों के समर्थक भी। पिछले साल मैसूर के मित्र दलित आलोचक प्रोफेसर महेश चंद्र गुरु पर भी मुकदमा हुआ, जान से मारने की धमकियां दी गयीं और गिरफ्तार भी किया गया। उनपर आरोप था कि उन्होंने एक भाषण में राम का अपमान किया। प्रोफेसर गुरु कर्नाटक में महिषासुर आंदोलन करते रहे हैं और पिछले तीन-चार सालों से मैसूर में अन्य लेखक साथियों के साथ महिषा-दशहरा मानते हैं।

Gl 2

पता नहीं, मौत ने हममें से किस-किस का घर देख लिया है! बहरहाल, वह कितनों को मारेगी

कहा जा रहा है कि इस संपादकीय की वजह से हुई गौरी लंकेश की हत्या

पत्रकारिता जगत की एक बुलंद आवाज़ गौरी लंकेशको खामोश कर दिया गया है। 16 पन्नों की उनकी पत्रिका 'गौरी लंकेश पत्रिके' हर हफ्ते निकलती है, जिसकी कीमत 15 रुपये है। 13 सितंबर का अंक इसका आख़िरी अंक साबित हुआ। हमने अपने मित्र की मदद से उनके आख़िरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है, ताकि आपको पता चल सके कि कन्नड़ भाषा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी। हर अंक में गौरी 'कंडा हागे' नाम से कॉलम लिखती थीं, जिसका मतलब होता है 'जैसा मैंने देखा'। उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ के मुद्दे पर था और उसका टाइटल था - 'फेक न्यूज़ के ज़माने में'

ये है गौरी लंकेश का आखिरी संपादकीय

पढ़ें संपादकीय 'फेक न्यूज के जमाने में' का हिन्दी अनुवाद

इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे।

ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस कांफ्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.NEWS नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.NEWS में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए।

जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया। पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी।

असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी। एक्चुअली पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।

गौरी लंकेश मोदी को बूसी बूसिया लिखती थी, जिसका मतलब होता है-जब भी मुंह खोलेंगे तो झूठ ही बोलेंगे

उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17अगस्त के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)।

ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।

गौरी लंकेश ने कहा था न्यूज चैनल संघ की टीम तरह काम करते हैं

आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30लाख बढ़ गया।उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।

बंगाल दंगे को भड़काने में फेक पोस्टर का इस्तेमाल किया गया था

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महिला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं।
गूगल के नए एप्लीकेशन से फेक इमेज का पता चल जाता है

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी शेयर किया फेक इमेज

उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है,उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।

बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने फेक तस्वीर का इस्तेमाल किया

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाल पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।


कमेंट करें