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गुरुपूर्णिमा: गुरु की साधना कर सिद्धि प्राप्त करने की ये है कहानी

अनुराग गुप्ता, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 9 , 2017 , 14:49 IST | नई दिल्ली

राजधानी समेत पूरे देश में आज गुरू पूर्णिमा मनाई जा रही है। बता दें कि गुरु पूर्णिमा आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती हैं और यह इस बार 9 जुलाई को मनाई जा रही है। आज के दिन चारों वेदों और महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्मदिन भी मनाया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में शिष्य अपने गुरु की इस दिन आराधना करते थे। मां-बाप के बाद अगर जीवन में किसी का विशेष स्‍थान होता है तो वह हैं हमारे गुरु। जीवन को सहज और सुगम तौर पर जीने का ज्ञान हमें अपने गुरु से मिलता है।

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जीवन के कठिन सफर में हमें डटकर खड़े रहने की हिम्मत अपने गुरु से ही मिलती है। अगर हम महाभारत के दौर की बात करे तो आप सबने एकलव्य के बारे में सुना होगा। एकलव्य शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास जाते है मगर निषादपुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य नहीं बनाया था।

इसके बावजूद वो गुरु द्रोण की मूर्ति बनाकर शिक्षा ग्रहण करते थे। एक दिन राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। जहां पर वो अभ्यास करते थे और एकलव्य को देख भौंकने लगा। जिसकी वजह से एकलव्य की साधना में व्यवधान उत्पन्न होने लगा अतः उन्होंने अपने बाणों से कुत्ते का मुँह बंद कर दिया।

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एकलव्य द्वारा चलाए गए बाणों से कुत्ते को कोई नुकसान नहीं पहुंचा मगर कुत्ते ने भौंकना बंद कर दिया। यह देख सब हैरान रह गए। जब द्रोणाचार्य को एकलव्य के बारे में पता लगा तो वो हैरान हो गए कि एकलव्य ने उनकी मूर्ति बनाकर यह सीखा है।

मगर गुरु द्रोण सबसे अजुर्न को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उनका अँगूठा मांग लिया और उन्होंने अपने गुरु की बात मांनकर वो अँगूठा अर्पित कर दिया। ऐसे कई उदाहरण है जो गुरु और शिष्य के अटूट रिश्ते को दर्शाता है।

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जीवन की बाधाओं को पार पाने के लिए हमें एक मार्गदर्शक की जरूरत पड़ती है, जिसे हम गुरु कहते है। गुरु हमारे जीवन को आसान तो नहीं मगर सच्चे दौर से गुजराने की ललक पैदा करते है। ऐसा कहा जाता है कि गुरु बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना आत्मा नहीं।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय


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