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शिव के इस धाम में जल चढ़ाने से सभी बिगड़े काम बन जाते हैं! जानिये इसकी मान्यता

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 1 , 2017 , 20:24 IST | नई दिल्ली

सावन का महीना देवों के देव महादेव का महीना होता है। मान्यता है कि सावन में अगर भोले शंकर को गंगा जल अर्पित कर दिया तो मन माँगी मुराद पूरी होती है। इसलिए काँवरिया गंगा जल लेकर शिव के धाम पहुँचते हैं।

कहते है, ना आदि है, ना अंत है जिसका वो शिव हैं लेकिन धरती पर कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ शिव ज्योतिर्लिंग रूप में विराजमान हैं जैसे कि काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर , केदारनाथ , सोमनाथ आदि लेकिन भारत में बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, और इन सभी शक्तिशाली शिवधामों में अगर कोई परम धाम है तो वो है बैद्यनाथ धाम। जो झारखंड राज्य में स्थित है।

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काँवर की परंपरा जो आप आज कल प्रचलन में देखते हैं इसकी शुरुआत इसी धाम से हुई थी । दरअसल बैद्यनाथ जिसको देवघर भी कहते हैं वहाँ से 103 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज जो भागलपुर बिहार में है उत्तरवाहिनी गंगा बहती है। सावन के महीने में लाखों काँवरिये देश के विभिन्न भागों से गंगाजल लेने के लिए यहाँ आते हैं। गंगाजल बाबा बैद्यनाथ को चढाते हैं। लोग अपने शहर गाँव से यहाँ सवान के महीने में लाखों की संख्या में आते है गंगा जल भरकर अपना काँवर तैयार कर नये गेरुआ वस्त्र धारण कर, काँवरिये सुल्तानगंज से देवघर के लिए 103 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू करते हैं , रास्ते में विश्राम करते समय ये ध्यान रख जाता है कि गंगा जल का पात्र ज़मीन पर ना रखा जाए ,जगह जगह पहले से बने ऊँचे स्थानों पर कांवर रखा जाता है । जो लोग पैदल नहीं जा सकते वो गाड़ी से जाते है ।

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कुछ भक्त बोल बम का नारा लगाते हुए बिना रुके लगातार चलते हुए बाबा को जल चढ़ाते है उन्हें डाक बम कहा जाता है । तो इस प्रकार 103 किलोमीटर दूर बहती गंगा को भक्त शिव के क़रीब पहुँचाते है और बम-बम का नारे लगाते हुए शिव का आशीर्वाद पाते हैं।

भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने की आस लेकर लौटते है इस वादे के साथ कि वो फिर आएँगे बोल बल बोल का नारा गूँजेगा और माँ गंगा के जल से शिव का अभिषेक करेंगे ।

देवघर मंदिर की स्थापना

जहाँ तक इस मंदिर के इतिहास का प्रश्न है देवघर मंदिर की स्थापना वर्ष 1596 में की गई। खोया हुआ शिवलिंग बैजू नाम के एक आदमी को मिला था और उसके बाद इसका नाम बैद्यनाथ मंदिर रखा गया। पुराणों में भी बैद्यनाथ को महत्व दिया गया है। यह एक शक्तिपीठ भी है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने रावण की प्रार्थना से प्रभावित उसे एक शिवलिंग दिया था, जो रावण को अपने राज्य तक अपनी यात्रा बाधित किये बगैर ले जाना था।

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देवता दिव्य शिवलिंग को शत्रु राज्य को दिये जाने से प्रसन्न नहीं थे और इसलिए भगवान विष्णु एक ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया तथा रावण से सफलतापूर्वक शिवलिंग छुड़ा लिया , और इस प्रकार यह देवघर में छूट गया।

विश्व के सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दिखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्यलंका की सुरक्षा करता था।

वैद्यनाथ मन्दिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक वासुकिनाथ में दर्शन नहीं हो जाते । यह मन्दिर देवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमुण्डी गाँव के पास स्थित है।


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