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Movie Review: दर्शकों की उम्मीदों पर पहले दिन खरी नहीं उतरी ‘इंदु सरकार’

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 28 , 2017 , 18:03 IST | मुंबई

रिलीज के पहले विवादों में आई मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। 1975 से 1977 के बीच भारत में लागू की गई इमरजेंसी के बैकग्रॉउंड पर बनी फिल्म का कांग्रेस ने जबरदस्त विरोध किया। हालाँकि सेंसर बोर्ड ने इसे हरी झंडी दे दीं। बता दें सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने वाले मधुर इससे पहले ‘पेज 3’, ‘फैशन’ और ‘ट्रैफिक सिग्नल’ जैसी फिल्म बना चुके हैं।

फिल्म की कहानी - 

इंदु सरकार की कहानी 27 जून 1975 के दौरान देश लागू हुई इमरजेंसी से शुरू होती है। आपातकाल के 21 महीनों को फिल्म दिखाया गया है। आपातकाल के 21 महिनों को तुर्कमान गेट (पुरानी दिल्ली) के अतिक्रमण और नसबंदी को दिखाया गया है। तुर्कमान गेट पर बस्ती पर बुलडोजर चलाने के दौरान इंदू (कीर्ति कुल्हारी) को दो बच्चे मिलते हैं। इंदू का पति नवीन सरकार (तोता रॉयचौधरी) एक सरकारी मुलाज़िम है। इमरजेंसी के दौरान वह भी और लोगों की तरह खूब पैसे बनाने की चाहत अपने दिल में पाले रखता है। इंदू एक कवियत्री है और वह कविता लिखती है। इमरजेंसी लागू होती है और इसी दौरान ही कुछ ऐसा हादसा होता है जिसकी वजह से इंदु अपने हस्बैंड को छोड़कर देशहित के लिए आगे निकल जाती है। काफी उतार चढ़ाव के बीच अंतत इमरजेंसी को खत्म होते दिखाया गया है।

अभिनय–

फिल्म में पात्रों के अभिनय की बात करें तो सभी किरदारों ने अपना रोल बखूबी निभाया है। ‘पिंक’ के बाद कीर्ति इंदू के किरदार में भी दमदार दिखी हैं। नील नितिन मुकेश का लुक उन्हें संजय गांधी के किरदार में हुबहु ढालता है लेकिन अदाकारी में थोड़ी और कसावट की गुंजाइश नजर आ रही है।

अनुपम खेर हमेशा की तरह अपने रोल के साथ न्याय करते नजर आये हैं लेकिन कुछ खास या अलग नहीं कर पाए हैं। वहीं सुप्रिया विनोद के लिए फिल्म में एक्टिंग करने को कुछ है ही नहीं। ऐसा लगता है कि सिर्फ कन्ट्रोवर्सी के लिए उन्हें इंदिरा गांधी की डमी की तरह इस्तेमाल किया गया है।

रिव्यू-

कुल मिलाकर फिल्म के बारे में कहा जाए तो फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। फिल्म से दर्शकों को इससे ज्यादा की उम्मीद थी। लीक से हटकर सिनेमा देने वाले मधुर भंडारकर पेज-3 और फैशन का मैजिक रीक्रिएट नहीं कर पाए हैं। ऐसा लग रहा है कि फैक्ट और फिक्शन में मधुर उलझ कर रह गए हैं। कहानी दमदार है लेकिन उसमें पेस की कमी है।

फिल्म कहने को इमरजेंसी के दौरान की है लेकिन उस वक्त के पूरे हालातों को समेट नहीं पायी है और सिर्फ नसबंदी और मीडियाबंदी में उलझी सी मालूम पड़ रही है। मधुर न तो पूरी तरह से काल्पनिकता को सजीव कर पाये हैं और न ही सच्चाई को दमदार तरीके से फिल्म के तानेबाने में बुन पाए है। फिल्म का फर्स्ट हॉफ सिर्फ कहानी को जमाने में निकल गया है और फिल्म का बाकी आधा हिस्सा हद से ज्यादा उबाऊ हो गया है।

सही मायनों में देखा जाए तो फिल्म में कन्ट्रोवर्सी जैसा कुछ नहीं है फिल्म के कुछ किरदारों का लुक अगर बदल दिया जाता तो शायद विवाद का मुद्दा उठाने जैसा कुछ भी होता ही नहीं। शाह कमीशन की रिपोर्ट और सरकारी महकमों के इनपुट जुटाने के बाद भी ऐसा लग रहा है कि फिल्म आपातकाल पर बनी तो जरूर है लेकिन उसमें विषय की गहराई में घुसने से परहेज कर रही है। लग रहा है 'इंदू सरकार' नाम देकर और किरदारों को कांग्रेस के कुछ नेताओं से मिलता जुलता लुक देकर हमेशा के तरह मधुर विवादों में आना तो चाहते थे लेकिन विवादों में फंसना नहीं चाहते थ। यही कारण उन्होंने फूंक-फूंक के कदम रखा है।

कमजोर कड़ियां-

इमरजेंसी पर बनी इस फिल्म में उस दौर के कुछ और किस्सों को कहानी में जोड़ा जा सकता था। वहीं फिल्म की एडिटिंग थोड़ी और बेहतर की जा सकती थी।

किस मीडिया हाउस ने फिल्म को दिए कितने स्टार -

आज तक - 5 में से 4

नवभारत टाईम्स- 5 में से 3 स्टार

दैनिक भास्कर- 5 में से 3.5 स्टार

दैनिक जागरण-  5 में से 3.5

अमर उजाला- 1/2


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