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इंटरनेशनल गर्ल चाइल्ड डे: 5 साल पहले हुई थी शुरुआत,असल में कितने सुधरे हालात

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 11 , 2017 , 13:14 IST | नई दिल्ली

11 अक्टूबर को ‘इंटरनेशनल गर्ल चाइल्ड डे’ के तौर पर मनाया जाता है। विश्वभर में पहला अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस 11 अक्टूबर 2012 को मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 19 दिसंबर 2011 को इस बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था। इस दिन लड़कियों को बचाने का प्रण लिया जाता है।

इसी के तहत पीएम मोदी ने 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरुआत की थी। बालिकाओं को संरक्षण और सशक्त करने के लिए 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत साल 2015 में की थी। भारतीय संविधान और कानून महिलाओं को समानता और सुरक्षा देता है। इसके बाद भी दुखद है कि सामाजिक-धार्मिक कुप्रथाओं का शिकार अक्सर बच्चियों और महिलाओं को ही होना पड़ता है। दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएं अभी भी खत्म नहीं हो सकी हैं।

तो चलिए जानते है कि भारत में लड़कियों की स्थिती कितनी सुधरी-

1.बालिका शिक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में भारत की स्थिति पिछले 1 दशक में काफी सुधरी है। अब 18 साल से कम उम्र में लड़कियों की शादी का प्रतिशत घटकर 27% रह गया है।

2. सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 17 साल की लगभग 16 प्रतिशत लड़कियां स्कूल बीच में ही छोड़ देती हैं। स्कूल ड्रॉपआउट रोकने के लिहाज से अभी भी बड़ी चुनौती कायम है।

3.वहीँ बाल विवाह पर कठोर कानूनों के बाद भी अब तक इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है। बिहार  में नाबालिग लड़कियों की शादी करने का ग्राफ बढ़ रहा है। एक रेकॉर्ड के अनुसार यहां 39.1 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले हो जाती है।

4.एक तरफ हर क्षेत्र में देश की बेटियां परचम लहरा रही हैं, दूसरी तरफ लिंग अनुपात अभी भी चिंताजनक है। सरकारी प्रयासों और जागरूकता के बाद भी लिंगानुपात 2017 में 947: 1000 ही है। शहरी क्षेत्रों और कुछ राज्यों में तो यह आंकड़ा और भी निराशाजनक है।

5.वही आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे की देश में हर 48 मिनट पर एक बच्ची किसी न किसी की हवस का शिकार बनती है। ये आंकड़े एनसीआरबी द्वारा जारी किये गए है।

6. शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो लेकिन एक कठोर सच्चाई यह है कि 21वीं सदी में भी महिलाएं लैंगिक भेदभाव और पक्षपात की शिकार हैं और इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए राष्ट्रीय राजधानी स्थित राजनयिक मिशन आगे आए हैं।

7. भारत को अभी बालिकाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य समेत कई क्षेत्रों में बड़ी दूरी तय करनी है। देश में लगभग 50   फीसदी लड़कियां कुपोषित हैं। 27,00,000 बच्चों की मौत भारत में 5 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। शिशु   मृत्यु दर में बच्चियों की संख्या लड़कों से अधिक है।

8.आंकड़ो की माने तो हर 4 में से 1 बच्‍ची 15 साल की उम्र तक पहुंचने से पहले हिंसा का शिकार होती है। दुनिया में जारी हिंसा की वजह से हर दस मिनट में एक बच्‍ची की मौत होती है।

9. 2012 में हिंसा की वजह से 30 हजार बच्चियां मारी गईं जो वैश्विक दर से दोगुना था। दुनिया भर में बीस से चौबीस वर्ष तक की तीन में से एक युवती का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है। 



10. हिंसा किशोरियों की मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह है। बच्चियों की हिंसक मौतों के मामले में दक्षिण एशिया सबसे आगे है जो बेहद शर्मनाक बात है। आपको जानकर हैरानी होगी कि साउथ एशिया के बच्‍चे दुनिया में सबसे ज्‍यादा अनसेफ है।

11. पिछले तीस वर्षो में बालिका वधुओं की संख्‍या में गिरावट के बाद भी ग्रमीण क्षेत्रों और विशेष रूप से गरीब तबके में यह चुनौती अब भी बरकरार है। अगर यही जारी रहा तो 18 वर्ष से कम उम्र में विावह होने वाली लड़कियों की संख्‍या 2020 तक बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी।



12. भारत में लड़कियों की स्थिती कुछ खास सुधरी नहीं है। आज भी परिवारों में लड़कियों को नहीं लड़कों को ज्‍यादा अहमियत दी जाती है ये कहना है उन रिपोर्टस का जिनमें कन्‍या भ्रूण को नष्‍ट करने के मामले में भारत अव्‍वल है। 


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