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हर मामले में उपराज्यपाल की इजाजत जरुरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 4 , 2018 , 10:54 IST

दिल्‍ली में उपराज्यपाल (एलजी) और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच आए दिन खुब नोक झोंक खीचतान देखने को मिली। जिसके बाद आज केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच बुधवार को फैसला सुना सकती है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। जिसमें कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल (एलजी) ही दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं और कोई भी फैसला उनकी मंजूरी के बिना नहीं लिया जाए।

इस संवैधानिक पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं। CJI दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने पिछले साल 2 नवंबर से सुनवाई शुरू की थी। महज 15 सुनवाई में पूरे मामले को सुनने के बाद 6 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। आप सरकार की ओर से पी चिदंबरम, गोपाल सुब्रह्मण्यम, राजीव धवन और इंदिरा जयसिंह जैसे नामी वकीलों ने दलीलें रखीं।

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एक सुनवाई में कोर्ट ने कहा था, ''चुनी हुई सरकार के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए, नहीं तो वह काम नहीं कर पाएगी।'' वहीं, केंद्र और उपराज्यपाल की ओर से दलील दी गई थी कि दिल्ली एक राज्य नहीं है, इसलिए उपराज्यपाल को यहां विशेष अधिकार मिले हैं।

दिल्ली सरकार की मुख्य दलीलें -:

-: चुनी हुई सरकार के पास अधिकार होना जरूरी है।

-: संविधान के अनुच्छेद-239 एए के तहत पब्लिक ट्रस्ट का प्रावधान है। यानी दिल्ली में चुनी हुई सरकार होगी और वह जनता के प्रति जवाबदेह होगी।

-: लैंड, पब्लिक ऑर्डर और पुलिस को छोड़कर राज्य और समवर्ती सूची में मौजूद मामले में दिल्ली विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है।

-: अगर संविधान में विधायिका का प्रावधान किया गया है तब उसे कानून बनाने का अधिकार होगा।

-: हम संसदीय वरीयता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं लेकिन चुनी हुई लोकतांत्रित सरकार बिना अधिकार के नहीं हो सकती।

-: अनुच्छेद-239 एए को इस तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता कि उसका मुख्य मकसद ही बेकार हो जाए। अनुच्छेद-239 एए के तहत ही दिल्ली को स्पेशल संवैधानिक दर्जा दिया गया था।

-: अनुच्छेद-239 एए आखिर एक लोकतांत्रिक प्रयोग था। इसकी व्याख्या से ही तय होगा कि ये सफल रहा या नहीं। 239एए के तहत दिल्ली को विशेष दर्जा दिया गया है। उसकी व्याख्या करनी चाहिए।

-: 239एए के तहत दिल्ली में चुनी हुई सरकार होगी जो जनता के लिए जवाबदेह होगी।

-: मंत्रियों के समूह के फैसले से अगर एलजी सहमत नहीं तो मामला राष्ट्रपति के पास चला जाता है। फिर हर मामले में एलजी ही सर्वेसर्वा हो जाते हैं।

-: अगर लोगों के प्रति फैसले में जवाबदेही नहीं होगी फिर क्या होगा।

क्या कम होगा सीएम और एलजी के बीच का टकराव?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्रशासित प्रदेशों में सीएम और एलजी के बीच टकराव की स्थिति कम होने के आसार हैं। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्रशासित प्रदेशों में एलजी और सीएम के अधिकार बांट दिए जाएंगे।

दिल्ली हाईकोर्ट उपराज्यपाल को बताया था बॉस-:

इससे पहले इस मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने उपराज्य़पाल को दिल्ली का बॉस बताया था। 4 अगस्त, 2016 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं और दिल्ली सरकार एलजी की मर्जी के बिना ना तो कानून बना सकती है और ना ही विधानसभा में इसे पेश कर सकती है।

3 साल से चल रही है केजरीवाल और उपराज्यपाल अनिल बैजल की जंग-:

फरवरी, 2015 में दूसरी बार सत्ता के आने के बाद से आप सरकार उपराज्यपाल के साथ अधिकारों की लड़ाई में उलझी है। पहले तत्कालीन एलजी नजीब जंग के द्वारा नियुक्तियां रद्द करने पर केजरीवाल ने उन्हें केंद्र सरकार का एजेंट बताया। इसके बाद उन्होंने जंग की तुलना तानाशाह हिटलर तक से की। दिसंबर, 2016 में अनिल बैजल के एलजी बनने के बाद से अब तक अधिकारों की लड़ाई जारी है।

मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट के बाद अधिकारियों की हड़ताल और घर-घर राशन वितरण की योजना को मंजूरी नहीं देने पर भी विवाद रहा। इसे लेकर पिछले दिनों केजरीवाल ने 3 मंत्रियों के साथ 9 दिन तक उपराज्यपाल सचिवालय में धरना और भूख हड़ताल की थी।


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