राजनीति

जिन्ना पॉलिटिक्स पर भारी पड़ी गन्ना राजनीति, कैराना में BJP की शर्मनाक हार

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मई 31 , 2018 , 14:18 IST

उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हार तय हो गई हैं। कैराना में राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन बीजेपी प्रत्याशी मृगांका सिंह से लगभग 41,162 मतों से आगे चल रही है।

कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट के लिए मतगणना गुरुवार सुबह शुरू हो गई थी। कैराना और नूरपुर सीटों के लिए सोमवार को हुए मतदान के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें आई थीं। कैराना सीट पर कल 73 मतदान केंद्रों पर पुनर्मतदान कराया गया था।

भाजपा सांसद हुकुम सिंह के निधन के कारण कैराना सीट पर उपचुनाव हुआ है। उनकी बेटी मृगांका सिंह यहां से भाजपा प्रत्याशी हैं। इस सीट पर रालोद से तबस्सुम हसन मैदान में थीं जिन्हें सपा, बसपा और कांग्रेस का समर्थन भी प्राप्त है।

उत्तर प्रदेश के कैराना में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने जीत भले हासिल की हो लेकिन सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद पार्टी की इस सीट पर दावेदारी कमजोर होती चली गई। हालांकि, राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) की ओर से अजित सिंह और जयंत चौधरी ने विपक्षी एकता की नाव पर सवार होकर सियासी अस्तित्व को बचाने की दिशा में पूरी ताकत झोंक दी है।

...तो क्या हो गया आरएलडी 'पुनर्जन्म'....?

इन सबके इतर अजित सिंह ने कैराना में फतह हासिल करने के लिए जाटलैंड में प्रचार की कमान खुद और बेटे जयंत के हाथों में सौंपी जबकि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की जिम्मेदारी तबस्सुम को दे दी। अजित सिंह की यह तैयारी कहीं न कहीं कारगर भी नजर आई।

बहरहाल, आरएलडी के पुनर्जन्म के साथ ही कयासों का दौर भी शुरू हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव के वक्त महागठबंधन बनने की स्थिति में अजित सिंह ज्यादा सीटों का दावा करेंगे।

विपक्ष की एकजुटता बनी बीजेपी की हार की वजह-:

तेलंगाना सीएम के चंद्रशेखर से मिले थर्ड फ्रंट के फॉर्म्युले में कुछ फेरबदल के साथ कर्नाटक में जहां जेडीएस-कांग्रेस एकजुट हुए वहीं उत्तर प्रदेश में कैराना उपचुनाव के लिए भी बीजेपी के विपक्षी पार्टियां आरएलडी के साथ एक जुट हो गईं। आरएलडी को एसपी, कांग्रेस का तो साथ मिला ही और बहुजन समाज पार्टी ने भी विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन का साइलेंट सपॉर्ट किया।

कैराना में चला अजीत सिंह का गन्ना कार्ड-:

कैराना सीट पर हुए उपचुनाव में प्रत्याशी तबस्सुम हसन को जीत दिलाने और बीजेपी को मुकाबले में पछाड़ने के लिए जयंत चौधरी ने 149 गांवों में प्रचार किया तो अजित भी इस दौरान उनके साथ खड़े रहकर पार्टी को मजबूत करने में जुटे रहे। उपचुनाव के प्रचार के दौरान बीजेपी ने भी कोई मौका नहीं छोड़ा।

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हालांकि, बीजेपी की ओर से ध्रुवीकरण के लिए खेले गए 'जिन्ना' कार्ड पर आरएलडी की ओर से गन्ना कार्ड खेल दिया गया। गन्ना किसानों के बकाए पर जब अजित सिंह ने यूपी की योगी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को घेरा तो बीजेपी की मुश्किलों में और इजाफा हो गया।

कौन हैं RLD की उम्मीदवार तबस्सुम हसन-:

तबस्सुम हसन के परिवार की तो तीसरी पीढ़ी भी अब राजनीति में आ चुकी है। उनके ससुर चौधरी अख़्तर हसन सांसद रह चुके हैं जबकि पति मुनव्वर हसन कैराना से दो बार विधायक, दो बार सांसद, एक बार राज्यसभा और एक बार विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं।

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हुकुम सिंह की तरह हसन परिवार भी कई राजनीतिक दलों के बीच घूमती रही है। 1984 में चौधरी अख्तर हसन कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए। उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे चौधरी मुनव्वर हसन ने संभाली और 1991 में पहली बार वो कैराना सीट से विधायक बने।

रियाज़ हाशमी बताते हैं, "साल 1993 में भी मुनव्वर हसन विधायक बने। 1996 में कैराना लोकसभा सीट से वो सपा के टिकट पर और 2004 में सपा-रालोद गठबंधन के टिकट पर मुज़फ़्फ़रनगर से सांसद चुने गए। मुनव्वर हसन राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्य भी रहे।"

2009 में मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन बसपा के टिकट पर कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। 2014 में लोकसभा सदस्य बनने के बाद जब हुकुम सिंह ने कैराना विधानसभा सीट खाली की तो ये सीट एक बार फिर हसन परिवार के पास आ गई। अबकी बार मुनव्वर हसन और तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन ने सपा के टिकट पर यहां से जीत दर्ज की।

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बाद में 2017 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने ये सीट मृगांका सिंह को हराकर अपना कब्ज़ा बनाए रखा। इलाक़े के लोग बताते हैं कि राजनीतिक रूप से दोनों परिवार एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भले ही हों लेकिन सामाजिक ताने-बाने में दोनों का संबंध 'घरेलू' है।


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