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कैराना हार के मायने...

icon कल्याण कुमार | 0
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| मई 31 , 2018 , 21:34 IST

उत्तर प्रदेश को देश का राजनीतिक आईना माना जाता है। इस प्रदेश ने देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री-मंत्री दिये और देश के नेतृत्व को सदैव दिशा दी। कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश जीत लिया तो देश जीत लिया। 2014 में ऐसा ही हुआ जब BJP और उसके सहयोगी दलों ने मिलकर 80 में से 73 लोकसभा सीटें जीत लीं और केंद्र में एक मजबूत सरकार बनाई लेकिन यही प्रदेश अब BJPको आईना दिखा रहा है, सच का आईना। पहले गोरखपुर-फूलपुर और अब कैराना लोकसभा सीटBJP के हाथों से निकल गई। इन तीनों महत्वपूर्ण सीटों पर हराकर जनता ने BJP को अपने मन की बात कह दी। यह बता दिया कि काम नहीं दिखा तो वोट नहीं मिलेगा। इसी के साथ सभी राजनीतिक दलों को भी यह संदेश दिया कि विजय की माला पहनने के बाद मतदाताओं के आदेश का सम्मान नहीं किया तो हाशिये पर सिमटाए जा सकते हैं।

जिन लोगों को लगता है कि खोखले नारों-वादों से भारतीय जनता को गुमराह किया जा सकता है, उन्हें भारतीय लोकतंत्र का इतिहास पढ़ना चाहिए। आयरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी 1977 में हार गई क्योंकि उनकी नीतियां जनता को पसंद नहीं आईं। 1984 में भारी जनमत से सरकार बनाने वाले राजीव गांधी का 1989 में पासा पलट गया क्योंकि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लग गया। भ्रष्टाचार से जंग के प्रतीक और सामाजिक न्याय के अग्रणी योद्धा विश्वनाथ प्रताप सिंह भी बामुश्किल एक साल ही प्रधानमंत्री रहे क्योंकि वह वैसा प्रताप नहीं दिखा पाए, जैसी जनता को अपेक्षा थी। भारत में आर्थिक उदारीकरण के सूत्रधार, वैश्विक अर्थसंस्कृति के जनक और 10 साल तक प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह को 2014 में नीतिगत निष्क्रियता के आरोपों के कारण जाना पड़ा। ये सभी उदाहरण ऐसे हैं, जो यह बताते हैं कि भारतीय जनता लोकतांत्रिक तौर पर परिपक्व है और जिसे लोक-लुभावन वादों से लंबे समय तक गुमराह नहीं किया जा सकता। भारतीय जनता को वास्तव में परिणाम चाहिए। 2004-09 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने किसान, मजदूर, दलित, वंचित, युवा, महिला और कामगारों को अनेक स्वर्णिम अवसर दिये, शायद यही वजह रही कि जनता ने उन्हें 2009 में दोबारा मौका दिया। अब यही कसौटी मौजूदा NDA सरकार की भी है। कैराना ही नहीं बल्कि 10 विधानसभा उपचुनावों में से 9 पर उसकी हार उसे आत्ममंथन के लिए विवश कर रही है।

चूंकि कैराना में हार के मायने तलाशे जा रहे हैं इसलिए मैं यहां भारतीय जनमानस की एक प्रवृत्ति उदाहरणस्वरूप पेश करना चाहूंगा, जिसका राजनीति से कोई नाता नहीं है। बात 1998 की है। नए-नए प्रोडक्ट लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने देश में आना शुरू कर दिया था लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। आकर्षक डिब्बों में मिलने वाले शैम्पू और अन्य ऐसे प्रोडक्ट सज तो गए लेकिन बिकने में परेशानी थी। कई विदेशी कंपनियों का घाटा इतना बढ़ गया कि वे वापसी की प्लानिंग करने लगीं। देश की ऐसी हालत पर एक अग्रणी आर्थिक अखबार ने बेहद सटीक आलेख प्रकाशित किया था। आलेख में आम भारतीय आर्थिक मानसिकता का अकाट्य उदाहरण पेश किया गया था, जिसे जानकर आप भी सहमत होंगे। जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा सौ-सौ रुपये के शैम्पू आकर्षक डिब्बों में बाजार में पेश किये जा रहे थे तभी वाराणसी में एक व्यवसायी ने पाउच में 1 रुपये का शैम्पू बाजार में उतार दिया। जिस तरह से ''शोले'' और ''दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे'' ने मनोरंजन के बाजार में धूम मचाई, उसी तरह इस 1 रुपये के शैम्पू ने घर-घर में अपनी जगह बना ली। लोगों को लगा कि बाजार ने उनके मन लायक कुछ काम किया है। इसी भारतीय आर्थिक मानसिकता ने अभी भी देशी वस्तुओं का बाजार बनाए रखा है क्योंकि ये सस्ती हैं और टिकाऊ भी।

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2014 में जब NDA की सरकार बनी तब लोगों के मन में उम्मीद जगी थी कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की तर्ज पर यह सरकार भी आम आदमी की भलाई के लिए बड़े काम करेगी। महंगाई कम होगी, रोजगार बढ़ेगा और देश के प्रत्येक वर्ग को नौकरी से लेकर अपना काम-धंधा आगे बढ़ाने में आसानी होगी। इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने कई मोर्चों पर काम किया, वित्तीय नियमन की दिशा में अनेक कदम उठाए और लेन-देन में पारदर्शिता के साथ-साथ बाबूशाही पर लगाम लगाने की कोशिश की लेकिन उसके वैसे परिणाम सामने नहीं आए, जैसी जनता को उम्मीद थी। इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन ने साफ कर दिया कि औद्योगिक क्षेत्र में सरकार खास सफलता हासिल नहीं कर पाई। कृषि क्षेत्र में उत्पादन तो बढ़ा लेकिन किसानों के लाभ में खास इजाफा नहीं हुआ। जिन-जिन राज्यों में भाव भावांतर योजना लागू की गई, वहां भी खास सफलता नहीं मिली।

नोटबदली, ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम और जीएसटी लागू होने से नकदी आधारित कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए, जिसमें लाखों लोग रोजगाररत थे। ये कदम बुरे नहीं थे लेकिन समय के अनुकूल भी इन्हें नहीं कहा जा सकता क्योंकि जिन-जिन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट आया, वे BJP या NDAसे दूर हो गए। भारत में कुटीर उद्योग हो या स्थानीय स्तर पर कारोबार, नकदी ही इनकी रीढ़ की हड्डी थी। 125 करोड़ की आबादी वाले ऐसे देश में ऑनलाइन पेमेंट व्यवस्था का जोखिम उठाना कोई दूरदर्शी कदम नहीं माना जा सकता, जहां आधी आबादी को ऑनलाइन का मतलब ही समझ में न आए और जिनके लिए कागज के नोट ही भगवान हों। कुछ ऐसी ही स्थिति GST के साथ भी बनी। बेशक सरकार साफ-सुथरे ढंग से काम करने का विश्वास दिला रही हो लेकिन आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरना उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर जनता पेट्रोलियम दरों में पाकिस्तान, भूटान, श्रीलंका से तुलना कर रही है तो उसका पुख्ता जवाब सरकार को देना ही चाहिए कि इतना भारी-भरकम टैक्स का बोझ जनता के ऊपर क्यों? अटल बिहारी वाजपेयी की 1999-2004 और डॉ. मनमोहन सिंह की 2004-09 की सरकार इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, जब जनता को अपनी सामान्य जरूरतों के लिए खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी। मैं कहता हूं कि राजनीतिक स्तर पर व्यावहारिक सोच से ही लोकतंत्र मजबूती के साथ आगे बढ़ सकता है। आज 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों के जो नतीजे घोषित हुए, उस आलोक में BJP और NDA दोनों को गहराई से सोचना पड़ेगा नहीं तो 2019 में एकजुट विपक्ष कड़ी चुनौती देने के लिए तैयार है...

लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों के नतीजे: 

लोकसभा सीटें

साल 2014

मई 2018

कैराना (यूपी)    

भाजपा

लोकदल (जीत)

पालघर (महाराष्ट्र)  

भाजपा

भाजपा (जीत)

गोंदिया (महाराष्ट्र)

भाजपा

 एनसीपी (जीत)

नगालैंड  

एनडीपीपी

 एनडीपीपी (जीत) (भाजपा की साथी)

 

विधानसभा सीटें

पहले

अब

नूरपुर (उप्र)

भाजपा

समाजवादी पार्टी

थराली (उत्तराखंड)

भाजपा

भाजपा

शाहकोट (पंजाब)   

शिरोमणि अकाली दल

कांग्रेस

जोकीहाट (बिहार)  

जद(यू)

राष्ट्रीय जनता दल

गोमिया (झारखंड)

झारखंड मुक्ति मोर्चा

झारखंड मुक्ति मोर्चा

महेशतला (पं. बंगाल) 

टीएमसी    

टीएमसी

पलूस कडेगाव (महाराष्ट्र)

कांग्रेस

कांग्रेस

सिल्ली (झारखंड)     

झारखंड मुक्ति मोर्चा

झारखंड मुक्ति मोर्चा 

चेंगन्नूर (केरल)   

सीपीआईएम  

सीपीआईएम

अंपाती (मेघालय) 

कांग्रेस    

कांग्रेस