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सैल्यूट टू विक्रम बत्रा: शहादत के 18 साल और 'ये दिल मांगे मोर'

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 7 , 2017 , 18:53 IST | नई दिल्ली

कारगिल युद्ध को यूं तो 18 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जीत का तिरंगा लहराने वालों और अपनी जान न्‍यौछावर करने वालों के लिए शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी भी है जिसे हिन्दोस्तां कभी भूल नहीं सकता। पाकिस्‍तान के ना-पाक इरादों के बाद जो युद्ध भारत पर थोपा गया था, उसमें जीत हासिल करने के लिए कई सैनिकों ने अपनी जानें भारत माता के लिए कुर्बान कर दी थीं। इनमें से ही एक थे शहीद कैप्‍टन विक्रम बत्रा। 

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कैप्‍टन बत्रा ने जंग पर जाने से पहले कहा था कि वह या तो जीत का तिरंगा लहराएंगे या फिर तिरंगे में लिपटकर वापस आएंगे। महज 25 वर्ष की आयु में उन्‍होंने कारगिल युद्ध को फतह दिलाने वाली दो अहम चोटियों 5140 और 4875 पर तिरंगा फहराया। इन दोनों चोटियों का अपना खास महत्‍व था।

ऊंची चोटियों पर बैठकर लगातार हमलावर हो रहा था पाक

इनमें से एक 5140 श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर स्थित थी, जो भारतीय जवानों के लिए घातक साबित हो रही थी। वहीं 4875 चोटी पर कैप्टन बत्रा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आमने-सामने की लड़ाई में करीब आठ पाकिस्‍तानी सैनिकों को ढेर कर दिया था। इस लड़ाई में उनका साथ लेफ्टिनेंट नवीन दे रहे थे। आमने-सामने की लड़ाई में नवीन बुरी तरह से घायल हो चुके थे और उनके दोनों पैरों से बेतहाशा खून बह रहा था। वहीं दूसरी तरफ से दुश्‍मन की गोलियां लगातार इस ओर आ रही थीं। इसी बीच उन्‍होंने लेफ्टीनेंट नवीन को सुरक्षित स्‍थान पर ले जाने की ठानी और उन्‍हें दुश्‍मन की गोलियों से बचाने के लिए अलग घसीटने लगे। इसी दौरान 7 जुलाई 1999 को एक गोली उनके सीने में लगी और वह 'जय माता दी' कहते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

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मिला परमवीर चक्र

चंडीगढ़ से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले कैप्‍टन बत्रा ने इंडियन मिलिट्री एकेडमी में दाखिला लिया। यहां से एक लेफ्टिनेंट के तौर पर वह भारतीय सेना के कमीशंड ऑफिसर बने और फिर एक कैप्‍टन बनकर कारगिल युद्ध में 13 जम्‍मू एवं कश्‍मीर राइफल्‍स का नेतृत्‍व किया। कारगिल वॉर में उनके कभी न भूलने वाले योगदान के लिए उन्‍हें सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से अगस्‍त 1999 को सम्‍मानित किया गया।

बत्रा ने जब कहा था 'ये दिल मांगे मोर'

विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम 'शेरशाह' के साथ ही उन्हें ‘कारगिल का शेर’ की भी संज्ञा दे दी गई। उनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टीनेंट कर्नल वाईके जोशी ने उन्‍हें शेर-शाह उपनाम से नवाजा था। 5140 चोटी पर तिरंगे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो जब मीडिया में आया तो हर कोई उनका दीवाना हो गया था। इसके बाद उन्‍हें 4875 चोटी को कब्‍जा करने की कमान दी गई थी।

कुछ ऐसा था शहीद कैप्‍टन बत्रा का जीवन

साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद उनका सिलेक्‍शन मर्चेंट नेवी के लिए हो गया था। इसके लिए उन्‍हें हांगकांग जाना था, लेकिन इसको ज्‍वाइन करने से महज तीन दिन पहले ही इसमें जाने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वह इसमें नहीं बल्कि आर्मी में जाकर देश की सेवा करेंगे। इसके बाद सीडीएस के जरिए सेना में उनका सिलेक्शन हुआ। उन्‍होंने जुलाई 1996 में इंडियन मिलिट्री अकादमी (भारतीय सेना अकादमी) देहरादून में एंट्री ली। यहां पर वह बेस्‍ट कै‍डेट भी चुने गए। 6 दिसंबर 1997 को उन्‍होंने बतौर लेफ्टिनेंट 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स को ज्‍वाइन किया।

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पालमपुर में शहीद शिला

ग्रेजुएशन के लिए जब उन्‍होंने चंडीगढ का रुख किया तो साथ-साथ एनसीसी भी ज्‍वाइन की, जिसमें बेस्‍ट कै‍डेट भी चुने गए और इसी दौरान उन्‍होंने आरडी (गणतंत्र दिवस) परेड जिसमें निकलने का सभी का सपना होता है वह भी पूरी की। मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले कैप्टन बत्रा की याद में पालनपुर में उनके नाम की एक 'शहीद शिला' लगाई गई है, जिससे लोग वहां जाकर जान सकें कि किस तरह से उनके जीवन की रक्षा के लिए देश के वीर सपूतों ने अपने प्राण न्योछावर किए।

 


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