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देशभर में करवाचौथ की धूम, सुहागिनों ने पतियों की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 8 , 2017 , 20:04 IST | नई दिल्ली

देशभर में बड़ी धूम-धाम से करवा चौथ का त्योहार मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं अपने पतियों का चेहरा देखकर व्रत तोड़ रही हैं। सुबह से शादीशुदा महिलाएं सजधज कर पूजा की तैयारियों में जुटी हैं। करवा चौथ को करक चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है।  अपने पति की लंबी आयु के लिए महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और अपने चंद्रमा की पूजा करती हैं। यह नीरजल व्रत होता है, जिसमें चांद देखने और पूजने के बाद ही अन्‍न व जल ग्रहण किया जाता है। करवा चौथ का व्रत कार्तिक हिन्दू माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है।

व्रत विधि-

करवा चौथ के दिन सुबह उठ कर स्‍नान आदि करके व्रत का संकल्‍प लें। दीवार पर गेरू और पिसे चावलों के घोल से करवा बनायें। इस चित्र को वर कहते हैं और इस प्रक्रिया को करवा धरना कहा जाता है। एक सांकेतिक गौरी बना कर उसे लकड़ी के आसन पर बिठाएं। उसको चुनरी उढ़ायें। शाम को करवा की पूजा के समय बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें। पूजा के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें और उसमें जल भरें। करवे पर ढक्‍कन रखें और अपनी परंपरांओं के अनुसार समान उस पर रखें। करवे पर रोली से स्‍वास्‍तिक बनायें। इसके बाद गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करते हुए पति की दीर्घायु की कामना करें और कथा सुनें। कथा सुन कर छन्‍नी से चंद्र दर्शन करें और उसे अर्घ्य प्रदान करें। इसके बाद सभी सम्‍मानित परिवार जनों के पैर दूकर आर्शिवाद लें, इसके बाद भोजन ग्रहण करें।

करवा चौथ के दिन किसी भी महिला को सफेद चीज, जैसे सफेद कपड़े, दूध या चावल देना अशुभ माना जाता है। वहीं इस दिन महिला द्वारा किसी बुजुर्ग का निरादर भी अपशकुन माना जाता है।

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Karwachauth

करवाचौथ का महत्‍व-

करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी एक ही दिन होता है। संकष्‍टी पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है और उनके लिए उपवास रखा जाता है। करवा चौथ के दिन मां पारवती की पूजा करने से अखंड सौभाग्‍य का वरदान प्राप्‍त होता है। मां के साथ-साथ उनके दोनों पुत्र कार्तिक और गणेश जी कि भी पूजा की जाती है। वैसे इसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है। इस पूजा में पूजा के दौरान करवा बहुत महत्वपूर्ण होता है और इसे ब्राह्मण या किसी योग्य सुहागन महिला को दान में भी दिया जाता है। करवा चौथ के चार दिन बाद महिलाएं अपने पुत्रों के लिए व्रत रखती हैं, जिसे अहोई अष्‍टमी कहा जाता है।

व्रत कथा-

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन थी जिसका नाम करवा था। सभी भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। शादी के बाद एक बार जब उनकी बहन मायके आई हुई थी। तो चतुर्थी के व्रत वाले दिन शाम को जब भाई खाना खाने बैठे तो अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे। बहन ने बताया कि उसका आज उसका व्रत है और वह खाना चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे चतुर्थी का चांद हो। उसे देख कर करवा उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। जैसे ही वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और तीसरा टुकड़ा मुंह में डालती है तभी उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बेहद दुखी हो जाती है। 

उसकी भाभी सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। इस पर करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर चौथ का दिन आता है, तो वह व्रत रखती है और शाम को सुहागिनों से अनुरोध करती है कि 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' लेकिन हर कोई मना कर देती है। आखिर में एक सुहागिन उसकी बात मान लेती है। इस तरह से उसका व्रत पूरा होता है और उसके सुहाग को नये जीवन का आर्शिवाद मिलता है। इसी कथा को कुछ अलग तरह से सभी व्रत करने वाली महिलायें पढ़ती और सुनती हैं।


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