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स्टारडम छोड़कर विनोद खन्ना बने थे ओशो के भक्त, जानिये उनकी जिंदगी की 10 खास बातें

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अप्रैल 27 , 2017 , 13:36 IST | नई दिल्ली

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता और पंजाब के गुरदासपुर से बीजेपी सांसद विनोद खन्ना हम लोगों के बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी अदाकारी और जिंदादिली की छाप हमेशा हमारे बीच हमेशा रहेगी। पेशावर में 1946 में जन्मे विनोद खन्ना ने 140 से भी ज़्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया। 1968 में सुनील दत्त की फिल्म 'मन का मीत' से फिल्मी करियर शुरू करने वाले विनोद खन्ना की आखिरी फिल्म 'एक थी रानी ऐसी भी' इसी महीने रिलीज़ हुई है।

आइये बॉलीवुड के 'दयावान' के बारे में 10 खास बातें जानते हैं। 

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1- बचपन में विनोद खन्ना बहुत शर्मीले थे। एक बार उनके टीचर ने जबरदस्ती उन्हें नाटक में उतार दिया। वो नाटक विनोद खन्ना को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपना करियर ही एक्टिंग में बना लिया।


2- विनोद खन्ना के पिता का अपना कारोबार था। वो चाहते थे कि विनोद खन्ना कारोबार में उनका हाथ बटाए ना कि एक्टिंग करे। लेकिन विनोद खन्ना की जिद सामने उनके पिता की एक नहीं चली और उन्हें दो साल का समय दे दिया। दो साल में ही विनोद खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री में पकड़ बना ली।

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3- उन्होंने अपने फ़िल्मी सफर की शुरूआत साल 1968 में आई फिल्म “मन का मीत” से की जिसमें उन्होंने एक खलनायक का किरदार निभाया था। इसके बाद कई फिल्मों में विलेन और साइड हीरो का किरदार निभाया।

4- साल 1971 में उनकी पहली लीड हीरो वाली फिल्म ‘हम-तुम’ और ‘वो’ आई जो ठीक ही चली थी लेकिन गुलजार द्वारा निर्देशित ‘मेरे अपने’ जो कि साल 1971 में आई थी जिससे विनोद खन्ना खूब लोकप्रिय हुए और इसके बाद वे लीड एक्टर में आने लगे।

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5- मुगल-ए-आजम देखने के बाद विनोद खन्ना दिलीप कुमार के बहुत बड़े फैन बन गये थे उनके अलावा उन्हें राजेश खन्ना भी बहुत पसन्द थे।

6- मल्टीस्टारर फिल्मों से जहां बहुत से स्टार्स को परेशानी होती है वहीं विनोद को इससे कोई ऑब्जेक्शन नहीं रहा। वे उस समय के सभी बड़े स्टार्स अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, सुनील दत्त के साथ आसानी से काम कर लेते थे।

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7- विनोद खन्ना की सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ की जोड़ी को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। उन दोनों ने एक साथ हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथोनी, मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्मों में काम किया जो ब्लॉकबस्टर साबित हुईं थीं।

8- अपार सफलता पा लेने के बाद साल 1982 में विनोद खन्ना ने अचानक फैसला लिया कि वे फिल्म इंडस्ट्री से दूर होना चाहते हैं। वे अपने आध्यात्मिक गुरु रजनीश (ओशो) की शरण में चले गए और ग्लैमर की दुनिया को छोड़ उन्होंने वहां बर्तन धोए और माली बनकर जिन्दगी गुजारी।  

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9- फिल्मों का मोह उन्हें फिर से बॉलीवुड खींच लाया और साल 1987 में उन्होंने ‘इंसाफ’ फिल्म से वापसी की। चार-पांच साल तक लीड एक्टर बनने के बाद विनोद विनोद गंभीर किरदार निभाने लगे।

10- इन्हें कई बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए फिल्मफेयर की तरफ से नोमिनेशन मिला है, साल 1999 में फिल्म फेयर और साल 2007 में जी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से उन्हें नवाजा गया। 


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