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'कैलाश' पर मान नहीं रहा चीन! जानें क्यों करते हैं लोग मानसरोवर की यात्रा

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जून 29 , 2017 , 20:00 IST | नयी दिल्ली

कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर चीन और भारत आमने-सामने हैं। मानसरोवर यात्रा पर निकले लोगों को चीन ने रोक दिया है। हर साल हजारों की तादाद में श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं। ये मानसरोवर कहां है और इसका महत्व क्या है? दरअसल, कैलाश मानसरोवर को भगवान शिव और माता पार्वती का घर माना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर शिव-शंभू का धाम है। यही वह पावन जगह है, जहां शिव-शंभू विराजते हैं। सर्वश्रेष्ठ पुराणों के अनुसार यहां शिवजी का स्थायी निवास होने के कारण इस स्थान को 12 ज्योतिर्लिगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश पर बर्फ से घिरे 22,028 फुट ऊंचे शिखर और उससे लगे मानसरोवर को कैलाश मानसरोवर तीर्थ कहते हैं और इस प्रदेश को मानस खंड कहते हैं।

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हिंदू धर्म के लिए खास महत्व रखने वाली मानसरोवर तिब्बत की एक झील है। जो कि इलाके में 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैली है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत और पश्चिम में राक्षसताल है। यह समुद्रतल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

हिंदू मान्यता के मुताबिक मानसरोवर झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुई थी। इसे मानसरोवर इसलिए कहते हैं क्योंकि ये मानस और सरोवर से मिलकर बनी है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर। यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उनका रूप मानकर पूजा की जाती है। हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी मानसरोवर का बहुत महत्व है। हज़ारों वर्षों से तीर्थयात्री मानसरोवर की यात्रा पर जाते रहे हैं।

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परंतु सन 1950 के चामदो युद्ध के बाद से 1951 से 1960 तक किसी भी विदेशी को चीन में मानसरोवर की यात्रा की अनुमति नहीं मिलती थी । 1980 के बाद दोनों देशों के बीच 1981 में हुए समझौते के बाद यात्रा फिर से शुरू हुई। यात्रा के लिए उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे को खोला गया। यह पथ पौराणिक माना जाता है। इस पथ से यात्रा को शिव पथ का हिस्सा माना जाता है।

केंद्र सरकार ने चीन से सिक्किम के नाथुला से यात्रा शुरू करने पर सहमति पा ली थी। पिछले साल सितंबर माह में चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान इस नए पथ को लेकर अंतिम सहमति बन गई थी। इस नए यात्रा पथ का पक्ष लेने वालों का तर्क है कि इस मार्ग से होते हुए कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले यात्रियों को पैदल नहीं चलना पड़ेगा। वे सिर्फ परिक्रमा को छोड़कर पूरी यात्रा वाहनों के जरिये कर सकते हैं। इसलिए अधिक उम्र वाले लोग भी इस यात्रा में शामिल हो सकेंगे।

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सिक्किम के नाथू-ला पहुंचे मानसरोवर यात्रा के दो जत्थों को चीन के बॉर्डर से वापस लौटा दिया गया। वैसे इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि तिब्बत में मानसरोवर की यात्रा के रास्ते में लैंडस्लाइड हुई है, लिहाजा अभी यात्रा नहीं कराई जा सकती है।

गौरतलब है कि असम में अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाले ब्रम्हपुत्र नदी पर बने देश के सबसे लंबे पुल का प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन किया था। इस उद्घाटन के बाद चीन के रवैये में बदलाव आया है। इसके बाद चीन ने नाथू-ला के जरिए मानसरोवर यात्रा के लिए पहले से तय 8 जत्थों की अनुमति को घटाकर महज 7 जत्थों तक सीमित कर दी थी। ऐसे में नाथू-ला के जरिए मानसरोवर यात्रा के लिए निकले पहले दो जत्थों को बॉर्डर से वापस लौटा देने को भी संशय की निगाह से देखा जा रहा है।


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