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100 साल पुराना है गोरखालैंड आंदोलन का इतिहास, फिर क्यों धधक रही है आग?

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 6 , 2017 , 17:23 IST | दार्जिलिंग

पिछले कई दिनों से अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग में चल रहा आंदोलन उग्र होता जा रहा है, तनाव की स्थिति बरकार है। इंटरनेट को रोक दिया गया है , दवाइयों की दुकानें छोड़कर स्कूल,होटल, कॉलेज, दुकानें सभी बंद है। आइए हम आपको बताते हैं क्या है गोरखालैंड आंदोलन और कितना पुराना है गोरखालैंड आंदोलन का इतिहास।

Gorkha 1

100 साल से हो रही अलग गोरखालैंड की मांग

गोरखालैंड का विवाद दरअसल सौ साल पुराना विवाद है। सन 1780 में गोरखाओं का राज्य तिस्ता से सतलुज तक फैला हुआ था। इनके इलाक़े में दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी, शिमला, नैनीताल तथा कुमाऊँ के पहाड़ी क्षेत्र थे। मगर 1816 के एंग्लो नेपाल युद्ध में गोरखा हार गए और उनके इलाके उनसे जाते रहे। गोरखा लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए 1907 में हिलमेंस एसोसिएशन ने मोरले मिंटो रिफॉर्म कमेटी से एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग की और यह सिलसिला 1937 तक चलता रहा मगर कोई सफलता हाथ ना लगी। 1948 से 1952 तक संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी CPI ने भी एक अलग गोरखिस्तान की मांग का समर्थन किया जिसमें उनके साथ अखिल भारतीय गोरखा लीग ने भी दार्जिलिंग समेत अन्य पहाड़ी इलाकों को भी बंगाल से अलग करने की मांग की।

Subhash ghising

सुभाष घीसिंग और गोरखालैंड आदोलन (1976 से 1988)

गोरखा नेशनल लिबरल फ्रंट के सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में इस संघर्ष ने उग्र रूप धारण किया। 28 महीने के उस हिंसक आंदोलन में लगभग 1200 लोग मारे गए तथा 10 हजार से ज्यादा घर जला दिए गए। अंत में सुभाष घीसिंग के साथ समझौता हुआ एवं गोरखा नेशनल हिल काउंसिल यानी गोरखा राष्ट्रीय पर्वतीय परिषद का गठन 1988 में हुआ। दार्जिलिंग डिस्ट्रिक्ट को सीमित प्रशासनिक अधिकार दिए गए।

Vimal gurung

2010 में बिमल गुरूंग ने संभाला गोरखा आंदोलन का कमान

2010 में बिमल गुरुंग जो सुभाष घीसिंग के करीबी माने जाते थे । उन्होंने अपनी नई पार्टी जीजेएम बनाई और गोरखालैंड के अलग राज्य के लिए समर्थन जुटाना शुरू हुआ। 2011 से 2013 के दौरान ममता बनर्जी की सरकार के पश्चिम बंगाल में आने के बाद डी॰जी॰एच॰सी॰ की जगह गोरखा टेरिटॉरीयल एडमिनिस्ट्रेशन का गठन हुआ और उसके हेड बने बिमल गुरुंग। 2013 में तेलंगाना के राज्य बनने तक शांति बनी रही परंतु तेलंगाना के बनने के बाद बिमल गुरुंग ने इस्तीफा दे दिया।

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10वीं में बांग्ला भाषा अनिवार्य किए जाने पर फिर भड़का आंदोलन

दार्जिलिंग के हालात 1986-88 वाली स्थिति की याद दिला रहे हैं,अभी आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 10 वीं तक बांग्ला भाषा अनिवार्य कर दिए जाने से हुई। गोरखाओं ने इसका विरोध किया। उनका तर्क है कि नेपाली उनकी भाषा है और वहां के ज्यादातर लोग नेपाली बोलते हैं, इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। हालांकि ममता बनर्जी ने बाद में बयान दिया कि बांग्ला को अनिवार्य नहीं किया जा रहा है।

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यह बात कहने में कोई आपत्ति नहीं है कि गोरखाओं के पहाड़ी क्षेत्र की हर स्तर पर अनदेखी हुई है। इसलिए हर कुछ समय पर वहां के लोग किसी ना किसी बहाने गोरखालैंड की मांग करते हैं और हर बार जान देने और जान लेने के लिए तैयार रहते हैं। और जैसा कि हम देख रहे हैं पिछले 20 दिनों में जानमाल का भारी नुक़सान हो चुका है।

 


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