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स्वयंसेवक से महामहिम की कुर्सी तक, 5 कहानियों में जानिये कोविंद का पूरा सफर

अमितेष युवराज सिंह, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 20 , 2017 , 19:06 IST | नयी दिल्ली

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति के रूप में 25 जुलाई को शपथ लेंगे। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद कोविंद ने कहा कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन वे देश के राष्ट्रपति बनेंगे। आइए जानते हैं रामनाथ कोविंद के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी बातें जो उन्हें औरों से अलग करती है।

कहानी नंबर 1

रामनाथ कोविंद का जन्म कानपुर देहात के परौंख गांव में हुआ था। यहीं पर उनका बचपन गुजरा। ये गांव उत्तर भारत के किसी भी आम गांव जैसा ही है। मुख्य मार्ग से गांव तक पहुँचने के लिए संकरी सड़क, कच्चे घरों के बीच कुछ पक्के मकान, पेड़ और चारों तरफ खेत हैं। परौंख गांव की आबादी आठ हजार के करीब है और यहां सभी जाति के लोग रहते हैं। कोविंद के पिता घर में ही एक छोटी सी दुकान चलाते थे और दुकान ही उनकी आय का एकमात्र जरिया था। घर कच्चा हुआ करता था। जब कोविंद पांच साल के थे तब उनके घर में आग लग गयी और उसी हादसे में उनकी मां गुजर गईं। 

कहानी नंबर 2

रामनाथ कोविंद बचपन से पढ़ाई में बहुत तेज थे। रामनाथ कोविंद ने पांचवी के बाद घर से 6 किलोमीटर दूर खानपुर-प्रयागपुर गांव के एक स्कूल में एडमिशन ले लिया । उस समय उनके पास साइकिल नहीं थी। वह स्कूल पैदल ही जाया करते थे। रामनाथ कोविंद कानपुर देहात के खानपुर टाउन से 12वीं की पढ़ाई करके उच्च शिक्षा के लिए कानपुर चले गए। कानपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने वाणिज्य और विधि (लॉ) की पढ़ाई की। वकालत की पढ़ाई करने के बाद कोविंद लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली चले गए। दिल्ली में ही वो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने लगे। कोविंद साल 1977 से 1979 तक केंद्र सरकार की तरफ से दिल्ली हाईकोर्ट में वकील थे।

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(फाइल फोटो)

कहानी नंबर 3

केंद्र में जब जनता पार्टी की मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो कोविंद पीएम के निजी सचिव बने। जनता पार्टी से भारतीय जनसंघ के धड़े ने अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया था। जनता सरकार के गिर जाने के बाद 1980 से 1983 तक वो सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से स्टैंडिंग काउंसिल रहे। उन्होंने 1993 तक दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल 16 सालों तक प्रैक्टिस की है।

कहानी नंबर 4

दिल्ली में रहते हुए ही रामनाथ कोविंग की 1990 के दशक में उनकी मुलाकात उज्जैन के रहने वाले जनसंघ के नेता हुकुमचंद से हुई जिनकी वजह से वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी से जुड़ गए। ये पहली बार होगा कि कोई स्वयंसेवक देश का राष्ट्रपति बन रहा है। कोविंद के राजनीतिक सफर में कई मोड़ आए। इन्होंने कई तरह की भूमिका निभाई। इन्होंने एक समाज सेवी, एक वकील और एक राज्यसभा सांसद के तौर पर काम किया लेकिन इनकी पिछली पृष्टभूमि में जाए तो वो एक बहुत ही साधारण इंसान थे।

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(फाइल फोटो)

कहानी नंबर 5

रामनाथ कोविंद के गांव छोड़ने के बाद उनका पूरा मकान जर्जर होकर गिर चुका था। रामनाथ के कहने पर वहां 2001 में एक सामूदायिक केंद्र बना दिया गया। रामनाथ कोविंद आखिरी बार दिसंबर 2016 में परौंख गांव गए थे। उस समय वह बिहार के राज्यपाल थे। रामनाथ कोविंद के प्रयासों से गांव में खूब विकास हुआ है। स्कूल, बैंक खुल गए हैं और पक्की सड़कें बन गई है। और अब उसी परौंख गांव के कोविंद देश का राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं।


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