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फिर लौट आया गुजरा ज़माना, यहां हमेशा मुस्कुराती रहेंगी मधुबाला...

आईएएनएस | 0
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| जुलाई 25 , 2017 , 18:35 IST | नई दिल्ली

बॉलीवुड के स्वर्ण युग की दिवंगत अभिनेत्री मधुबाला का मोम का यहां मैडम तुसाद संग्रहालय का हिस्सा बनेगा। यह पहला अवसर है जब हिंदुस्तान के क्लासिकल दौर की किसी हस्ती को इस गैलरी में प्रदर्शित किया जा रहा है। यह मोम का पुतला वर्ष 1960 की मशहूर फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के अनारकली के किरदार से प्रेरित होगा।



मर्लिन एंटरटेनमेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के निर्देशक और महाप्रबंधक अंशुल जैन ने कहा,

हम खुश हैं कि दिल्ली के मैडम तुसाद में मधुबाला का पुतला लगाया जा रहा है। वह अब भी पूरे देशभर में अरबों प्रशंसकों के दिलों पर राज कर रही हैं। हमें यकीन है कि उनकी चुंबकीय सुंदरता प्रशंसकों को उनके साथ एक सेल्फी लेने के लिए आकर्षित करेगी और हमें सुनहरे युग में ले जाएगी।

मैडम तुसाद दिल्ली में अमिताभ-शाहरुख


दिल्ली की प्रसिद्ध रीगल बिल्डिंग में स्थित इस संग्रहालय में बॉलीवुड के जिन सितारों की मोम की अनुकृति होगी उनमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान,गायिका आशा भोलसे और श्रेया घोषाल शामिल हैं।

 मधुबाला का जन्म 14 फरवरी, 1933 को दिल्ली में एक पश्‍तून मुस्लिम परिवार में हुआ था। मधुबाला अपने माता-पिता की पांचवीं संतान थी और उनके अलावा उनके 10 भाई-बहन थे। मधुबाला आगे चलकर भारतीय हिन्दी फ़िल्मो की एक मशहूर और कामयाब अभिनेत्री बनीं।मधुबाला के अभिनय में एक आदर्श भारतीय नारी को देखा जा सकता था। चेहरे से भावों को भाषा देना और नज़ाक़त उनकी विशेषता थी।

उनकी अभिनय प्रतिभा, व्यक्तित्व और खूबसूरती को देखकर कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री थी। मधुबाला का बचपन का नाम 'मुमताज़ बेग़म जहां देहलवी' था। कहा जाता है कि एक ज्‍योतिष ने उनके माता-पिता से ये कहा था कि मुमताज़ अत्यधिक ख्याति तथा सम्पत्ति अर्जित करेगी परन्तु उसका जीवन दुखमय होगा। उनके पिता अयातुल्लाह खान ये भविष्यवाणी सुन कर दिल्ली से मुम्बई एक बेहतर जीवन की तलाश मे आ गए।

मधुबाला नें 1942 से लेकर 1962 तक काम किया। उन्हें अक्सर हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित महिला सेलिब्रिटी के रूप में माना जाता है।

वह 'महल' (1949), 'अमर' (1954), 'मिस्टर एंड मिसेज 55' (1955), 'चलती का नाम गाड़ी' (1958), 'मुगल-ए-आजम' (1960) और 'बरसात की रात' (1960) जैसी फिल्मों में अपने जलवे बिखेर चुकी हैं।

मधुबाला ने लंबी बीमारी के बाद 23 फरवरी, 1969 को हमें अलविदा कह दिया।

संग्रहालय में वह गायिकाओं श्रेया घोषाल और आशा भौंसले के साथ अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे सितारों के साथ अपनी खूबसूरती के रंग बिखेरेंगी।

हुस्न की मलिका

मधुबाला की सुंदरता के कारण उन्हें भारतीय फिल्मों की ‘वीनस’ का खिताब दिया गया था। वैसे सौंदर्य की बाला मधुबाला अपनी जिद के लिए भी जानी जाती थीं। इसी के बल पर मधुबाला छह महीने में अंग्रेजी बोलना सीख गईं। इसी जिद के बल पर मधुबाला ने दिलीप कुमार से खुद को दूर किया और इसी जिद के कारण फिल्म निर्माण भी किया। मगर ‘शाम-ए-अवध’ के जरिये निर्देशक बनने की उनकी तमन्ना पूरी नहीं हो सकी। 1950 के दशक की इस अभिनेत्री के चाहने वाले आज भी कम नहीं है। गूगल पर उनकी लोकप्रियता बरकरार है। उनके चाहने वालों के लिए सर्च इंजन गूगल पर करीब 50 लाख पेज उपलब्ध हैं, जो उनके हुस्न, हुनर और अदाकारी के जलवे और जादू से भरे पड़े हैं।

जिद, जलवा और जादू


1955 का साल मधुबाला के लिए कमजोर रहा। इसकी वजह प्रतिस्पर्धा का बढ़ना था। ‘आजाद’ की सफलता के बाद मीना कुमारी, ‘नागिन’ की लोकप्रियता के बाद वैजयंतीमाला, ‘श्री 420’ के बाद नरगिस जैसी अभिनेत्रियां तेजी से आगे बढ़ रही थीं और उन्हें फिल्मों के खूब आॅफर भी मिल रहे थे। हालात इतने बिगड़ गए थे कि मधुबाला ने अभिनय छोड़ने का मन बना लिया था।
1944 मुमताज महल , 1947 नीलकमल, 1950हंसते आंसू , 1957 यहूदी की लड़की, 1958 हावड़ा ब्रिज, 1960 मुगल-ए-आजम


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