ओपिनियन

मोदी ने शायद सबक सीखा

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| अक्टूबर 6 , 2017 , 17:57 IST | नई दिल्ली

कंपनी सेक्रेटरियों की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो लंबा भाषण झाड़ा, वह बिल्कुल अपेक्षित था। भाजपा के पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी की कड़ी आलोचना के बाद देश में जो हवा बदली है, उस पर मोदी की प्रतिक्रिया आनी बहुत जरुरी थी। इसकी जरुरत इसलिए भी बढ़ गई थी कि सर संघचालक मोहन भागवत ने भी घुमा-फिराकर जनता के दुख-दर्द को गुंजा दिया था।

मोदी का भाषण काफी प्रभावशाली था। उसमें तथ्य और तर्क इतनी तरकीब से पेश किए गए थे कि जो लोग नोटबंदी और जीएसटी के सीधे शिकार नहीं हुए हैं, वे एकदम सम्मोहित हो गए होंगे। नीति आयोग और रिजर्व बैंक के जिन आंकड़ों से लोग मोदी की टांग खींचते हैं, मोदी ने उन्हीं आंकड़ों को अपने आलोचकों के सिर पर दे मारा। उन्होंने कहा कि मनमोहनसिंह के दस वर्षों में जीडीपी आठ बार 5.7 प्रतिशत तक गिर गई थी। तब तो किसी के सिर पर जू भी नहीं रेंगी लेकिन अभी सिर्फ एक तिमाही में इतनी गिरी तो कुछ लोग बौखलाए हुए हैं।

मोदी ने अर्थ-व्यवस्था संबंधी कई आंकड़े पेश करके बताया कि उनके तीन साल में कितनी अपूर्व प्रगति हुई है लेकिन आज ही रिजर्व बैंक ने अपनी रपट में कहा है कि मार्च 2018 तक आर्थिक प्रगति 6.7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती याने मोदी ने जो सिर्फ एक तिमाही के झटके का तर्क दिया था, उसे रिजर्व बैंक ने गलत सिद्ध कर दिया। जो भी हो, मोदी के इस भाषण में से तीन संदेश निकलते हुए मुझे साफ दिखे। पहला, मोदी को यह पता चल गया है कि उनकी नोटबंदी और जीएसटी ने उनकी सरकार को हिला कर रख दिया है।

मोदी ने अपने जीवन में शायद पहली बार इतनी विनम्रता दिखाई है। मैं सर्वज्ञ नहीं हूं। मैं विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता हूं, आदि शब्दों का उन्होंने कई बार प्रयोग किया। इसका अर्थ यह हुआ कि सड़क पर लड़खड़ा रही मोदी की रेल शायद अब पटरी पर आ जाए। आ जाए तो बहुत अच्छा। देश का भला होगा। दूसरा, अपने आलोचकों के प्रति मोदी ने जेटली की तरह उटपटांग बात नहीं की। उन्हें सम्मान दिया। तीसरा, उन्होंने व्यापारियों को, जो संघ, जनसंघ और भाजपा की रीढ़ रहे हैं, भला-बुरा नहीं कहा बल्कि उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी कठिनाइयों को दूर करने की भरसक कोशिश की जाएगी।