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Movie Review: मजेदार इमोशंस की चाशनी में डूबी है '102 नॉट आउट'

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मई 4 , 2018 , 13:25 IST

अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर ने साथ कई यादगार फिल्में दी हैं और अब इस लिस्ट में '102 नॉट आउट' का नाम भी शामिल हो गया है। आज यानि शुक्रवार को अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की फिल्म '102 नॉट आउट' रिलीज़ हो गयी है। फिल्म की जान इन दोनों के अलावा जिमित त्रिवेदी भी हैं। फिल्म के डायलॉग्स ऐसे हैं कि आप तालियां बजाने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। फिल्म की कहानी है बाप-बेटे और नालायक पोते की। फिल्म सौम्या जोशी द्वारा लिखे गए एक गुजराती प्ले पर आधारित है।

कहानी-

फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाले 102 साल के दत्तात्रेय जगजीवन वखारिया (अमिताभ बच्चन) और उनके 75 साल के बेटे बाबूलाल दत्तात्रेय वखारिया (ऋषि कपूर) की है। दोनों मुंबई के विले पार्ले स्थित शांति निवास में रहते हैं। एक दिन जब दत्तात्रेय को पता चलता है की चीन के रहने वाले ओंग चोंग तुंग के पास 118 साल तक जीने का वर्ल्ड रिकॉर्ड है, तो वो इस रिकॉर्ड को तोड़ने का मन बनाते हैं। इसके लिए दत्तात्रेय अपने 75 साल के बेटे को वृद्धाश्रम भेजने का प्रस्ताव रखते हैं। जब वो जाने के लिए मना करता है तो धीरू (जिमित त्रिवेदी) के साथ मिलकर दत्तात्रेय, बाबूलाल के सामने एक के बाद एक शर्तें रखते जाते हैं, जिन्हे बाबूलाल पूरा करता है। अब क्या दत्तात्रेय वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ पाते हैं, कहानी में क्या ट्विस्ट-टर्न्स आते हैं? ये सब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

फिल्म के डॉयलॉग्स-

'जो बच्चा नालायक निकल जाए, उसका सिर्फ बचपन याद रखना चाहिए...'

'I hope you understand...'

'मैं आजतक कभी मरा नहीं, जब तक जिंदगी है, जिंदा रहो...' ये कुछ ऐसे डॉयलॉग्स हैं, जब फिल्म में आते हैं तो आप अपने आंसुओं को रोक नहीं पाएंगे।

डायरेक्शन -

फिल्म के नाम के अनुसार यह मात्र 102 मिनट की फिल्म है और जिस तरह से 3 लोगों को लेकर उमेश ने पूरी कहानी सुना डाली है वो काबिल-ए- तारीफ़ है। फिल्म की लिखावट जबरदस्त है और स्क्रीनप्ले भी बढ़िया। संवाद ऐसे हैं जिन्हें सुनकर आप हंसते भी हैं और दुःख में भी आपके चेहरे पर मुस्कान नजर आती है। ऐसी कहानी के लिए उमेश बधाई के पात्र हैं।

'102 नॉट आउट' की कहानी काफी साधारण है, लेकिन इसे निर्देशक उमेश शुक्‍ला की तारीफ ही कहेंगे कि उन्‍होंने इस सिंपल से प्‍लॉट को मजेदार इमोशंस की चाशनी से सजा कर पेश किया है। फिल्‍म ज्‍यादा लंबी नहीं है, तो बोरियत महसूस नहीं होती। वरना तीन किरदारों और एक घर में बनाई गई इस फिल्‍म का हश्र खराब हो सकता था। फिल्‍म के पहले सीन से ही आपके चेहरे पर एक मुस्‍कान ठहर जाएगी और फर्स्‍ट हाफ आपको मुस्‍कान से सीधे हंसी और ठहाकों के सफर पर ले चलेगा। फर्स्‍ट हाफ में कई सीन ऐसे हैं, जहां जमकर हंसी आती है लेकिन फिल्‍म का सेकंड हाफ हंसी के साथ ही फिल्‍म की तहें खोलने लगता है और आप कई तरह की भावनाएं महसूस करेंगे।

एक्टिंग -

इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की एक्टिंग के लिए कुछ भी लिखना कम होगा। दोनों ही बहुत उम्दा अभिनय करते नजर आते हैं और कहानी को अलग ही लेवल पर लेकर जाते हैं। गुजराती फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेता जिमित त्रिवेदी ने भी बढ़िया अभिनय किया है। 27 साल के बाद बड़े परदे पर साथ आये अमिताभ और ऋषि कपूर के अभिनय के विषय में बात करना सूरज को रौशनी दिखने के बराबर है। मगर इतना ज़रूर है कि उम्र के इस पड़ाव में इन दोनों अभिनेताओं ने पूरी फिल्म में एक पल भी ऐसा नहीं छोड़ा जहां आपको किसी और एलिमेंट यानि रोमांस, एक्शन, आइटम या स्पेशल गाने, हीरोइन की की कमी महसूस हो। अक्सर जहां बच्चन होते है वहां किसी और कलाकार की खास गुंजाइश नहीं होती मगर इस फिल्म में ऋषि कपूर ने भी अपने ज़बर्ज़स्त अभिनय के साथ लोगों का दिल जीत लिया। ऋषि कपूर ने हर एक सीन में बच्चन को कॉम्प्लीमेंट दिया है। वह बहुत प्यारे लगे हैं इनके अलावा जिमिथ त्रिवेदी की भूमिका खास है। इन दोनों दिग्ग्जों के बीच जगह बना पाना अपने आप में एक उपलब्धि है जो जिमीथ ने कर दिखाई है।

कमजोर कड़ी-

फिल्म की रफ़्तार थोड़ी स्लो है और अगर आप लॉजिक लगाने की कोशिश करेंगे तो शायद आपको ये पसंद ना आए।

क्यों देखें-

इसे देखने के कई कारण हैं, फिल्म की स्क्रिप्ट, डायरेक्शन, मुंबई की अलग खूबसूरती, 27 साल बाद सिल्वर स्क्रीन पर अमिताभ और ऋषि कपूर की जोड़ी, अमिताभ, ऋषि और जितिन त्रिवेदी की एक्टिंग, एक अच्छा मेसेज, और अगर आप अमोल जैसी संतान नहीं हैं तो अपने मां-बाप को ये फिल्म दिखाइये, उन्हें आप पर गर्व होगा।


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