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Reel life की तरह राजनीति में रजनीकांत को नहीं मिलेंगे रीटेक के मौके...

icon अनिल राय | 0
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| जनवरी 1 , 2018 , 17:32 IST

फिल्मी भाषा में कहें तो 2017 की राजनीति का क्लाइमेक्स साल के बिल्कुल आखिरी दिन आया। साउथ के सुपर स्टार ने साल के सबसे बड़े सस्पेंस पर से पर्दा उठा दिया। अब ये ऑफिशियल है कि रजनीकांत का राजनीतिक अवतार हो चुका है।

वैसे देखें तो दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन रजनीकांत को आप अब तक रजानीति में आने वाले फिल्मी सितारों में सबसे बड़ा नाम जरूर कह सकते हैं। राजनीति में आने के लिए रजनीकांत लम्बे अर्से से तैयार बैठे थे। ऐसे में सवाल है कि 2018 ही क्यों? इसके जवाब कई हो सकते हैं, लेकिन जो सबसे सीधी वजह नजर आ रही है वो है तमिलनाडु की राजनीति के आसमान से जयललिता का ओझल हो जाना। और उनके जाने के बाद घर के अंदर ही घमासान में उलझी जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके। रही बात डीएमके के की, तो भले ही 2G के फैसले के बाद पार्टी के अंदर थोड़ा उत्साह हो, लेकिन कानूनी लड़ाई में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े दरबाजों से बार निकले बिना पार्टी पार्टी के दिग्गज नेता सही मायने में राहत की सांस नहीं ले सकते। साफ है कि इन हालात में तमिलनाडु की राजनीतिक जमीन नई फसल के लिए पूरी तरह से उर्वर है। और इसी उर्वर जमीन में रजनीकांत ने बगैर देर किए अपनी फसल जरूर बो दी है।

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दिचलस्प ये भी है कि अपने फैसले से रजनीकांत ने न सिर्फ क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को चौंकाया है बल्कि अपने की कुनबे के कमल हासन को भी बैकफुट पर ला दिया है। क्योंकि सबको पता है कि राजनीति के अंकुर कमल हासन के अंदर भी जरूर पनप रहे हैं। लेकिन कमल अभी अपनी रणनीति भी तय नहीं कर पाए थे कि रजनीकांत ने अपनी राजनीतिक पारी का मुहूरत शॉट फिल्मा लिया। अब इतना तो तय है कि तमिलनाडु की राजनीति में इतनी भी खाली जगह नहीं है कि एक साथ दो-दो सुपरस्टार की लॉन्चिंग को बॉक्स ऑफिस पर हिट दिला दे। वैसे चर्चा ये भी चली है कि कमल हासन अब बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो कहा जा सकता है कि कमल हासन ने शुरुआत से पहले ही राजनीति के सबसे गूढ़ रहस्य को सीख और समझ लिया है। क्योंकि वो कमल हासन ही हैं, जिन्होंने पिछले कुछ समय में नरेंद्र मोदी की नीतियों को लेकर कई मौकों पर सवाल उठा चुके हैं।

खैर, जो भी हो तमिलनाडु की राजनीति 2019 से लेकर 2021 तक काफी दिलचस्प होने वाली है। और उस दिलचस्प थ्रिलर के प्रोमो आपके लिए इस साल यानी 2018 में समय-समय पर खूब आते रहेंगे।

बहरहाल, जहां तक रजनीकांत का सवाल है, तो उनके प्रशंसक भले ही ये मान रहे हों कि राजनीति में उनकी राह आसान है लेकिन फिल्म के टिकट के लिए घंटों लाइन में लगने वाले लोगों को वोट की लाइन तक ले जाना बहुत बड़ी चुनौती होती है और इन चुनौती में सबसे बड़ा रोड़ा है रजनीकांत का बाहरी होना। मराठी परिवार और कर्नाटक का होना रजनीकांत पर हमला करने वाले विरोधियों के लिए सबसे बड़ा हथियार हो सकता है। तभी तो सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे कुछ लोग अभी से इस हथियार का इस्तेमाल शुरू कर चुके हैं। पिछले दो दशकों में जिस तरह देश में क्षेत्रवाद की राजनीति बढ़ी है, उससे पार पाना पर्दे पर एक साथ कई-कई विलेन को धराशाई करने वाले रजनीकांत के लिए बड़ी चुनौती होगी।

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चुनौती एक और है। दक्षिण की राजनीति में फिल्म स्टार्स के प्रभाव की बात करें, तो कहीं न कहीं धीरे-धीरे इसमें कमी जरूर आई है। दो से तीन दशक पहल जिस तरह एन टी रामाराव, एम जी रामचन्द्रन और जयललिता के जलवे थे, आज वैसा मायाजाल पैदा करना आसान नहीं है। आंध्र प्रदेश के चुनावों में चिरंजीवी का हस्र हम सबने देखा। चिरंजीवी का उदाहरण साफ बता रहा है कि दर्शक और वोटर में अब बड़ा फर्क है। तो चाहे कमल हासन हों या रजनीकांत, काम सिर्फ ग्लैमर से नहीं चलने वाला, भविष्य की मजबूत योजनाएं भी उन्हें सामने रखनी होंगी और देखना ये भी होगा कि 'सोलो' रोल के साथ खुद डायरेक्शन और प्रोडक्शन संभालने में लाभ है या किसी जमे-जमाए राजनीतिक बैनर में अपने लिए कोई किरदार तलाशने में। क्योंकि चिरंजीवी जैसे मेगा स्टार को कांग्रेस ने राज्यसभा भले ही भेज दिया हो लेकिन दिल्ली का राजनीति में राज्यमंत्री की हैसियत से ऊपर देने लायक उन्हें नहीं समझा गया।

बहरहाल, तमिलनाडु की राजनीति में 2019 के लोकसभा चुनाव काफी अहम होने वाले हैं क्योंकि उत्तर भारत में चरम पर पहुंच चुकी बीजेपी अब दक्षिण में अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी है। और तमिलनाडु उसके एजेंडे में कितना अहम है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2G में डीएमके नेताओं के निचली अदालत से बरी होने के पहले ही खुद पीएम मोदी न सिर्फ करुणानिधि का कुशल-क्षेम पूछते हैं बल्कि इसके बाद उनकी पार्टी के बीजेपी से नजदीकियों के किस्से भी चर्चा में आते हैं।

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क्योंकि कर्नाटक के बाद जिस तरह से बीजेपी केरल तक में लगातार जोर लगा रही है उससे साफ है कि भगवा पार्टी तमिलनाडू में भी किसी को वॉकओवर देने वाली नहीं है। और जयललिता की मौत के बाद बीजेपी ने जिस तरह से तमिलनाडु की राजनीति में लगातार दखल रखी है, उससे अब अगर-मगर का सवाल भी नहीं बचा है।

कुल मिलाकर रजनीकांत ने राजनीति में आने का समय तो सही चुना है, लेकिन राजनीति में लंबे समय तक टिके रहने के लिए उनको अपनी हर चाल सही चलनी पड़ेगी, क्यों सिनेमा और राजनीति का सबसे बड़ा फर्क ये है कि यहां इन दिनों रिटेक का मौका नहीं मिलता। खैर, इस ताजा घटनाक्रम का सकारात्मक पक्ष ये है कि राजनीति में सितारों के प्रेमी तमिलनाडु के लोगों को अम्मा की गैरमौजूगी में एक विकल्प जरूर मिल गया है। बाकी तय उन्हें ही करना है कि पर्दे के इस सुपर सितारे को वो असल जिंदगी में कितना स्पेस देना मंजूर करते हैं? और वो उनकी उम्मीदों पर कितने खरे उतरते हैं। ये बात रजनीकांत पर भी लागू होती है और कमल हासन पर भी।