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4 वीर जिन्होंने अदम्य साहस से बदल दी करगिल युद्ध की तस्वीर (श्रद्धांजलि)

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 26 , 2017 , 12:36 IST | नई दिल्ली

कारगिल युद्ध में अपने अदम्य साहस और जांबाजी के बल पर दुश्मन के छक्के छुड़ा देने वाले चार शहीदों को मरणोपरांत सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इन वीरों ने 1999 में जम्मू-कश्मीर के कारगिल में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ने के लिए अपने जान की बाजी लगा दी थी। आइए जानते हैं सेना के इन चार वीर जवानों को....

1.लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय :

शहीद कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रुधा गाँव में 25 जून 1975 को हुआ था। बचपन से ही देश की सेवा करने का जज्बा उन्हें NDA तक ले गया।

जिस समय NDA के च्वाइस वाले कालम जहाँ यह लिखना होता हैं कि वह जीवन में क्या बनना चाहते हैं क्या पाना चाहते हैं वहां सब लिख रहे थे कि, किसी को चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ बनना चाहता हैं तो कोई लिख रहा था कि उसे विदेशों में पोस्टिंग चाहिए आदि आदि, उस फार्म में देश के बहादुर बेटे ने लिखा था कि उसे केवल और केवल परमवीर चक्र चाहिए! ये बहादुर और नहीं कैप्टन मनोज पाण्डेय थे जिन्हें कारगिल युद्ध के दौरान वीरगति प्राप्त हुई थी।

कारगिल का युद्ध और मनोज पाण्डेय की बहादुरी:

कारगिल के युद्ध के दौरान मनोज पाण्डेय ने अपने परिवार को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने युद्ध के हालात में भी अपने परिवार वालों से कहा था कि दुआ करें और आशीर्वाद दें कि हम दुश्मनों को जल्द से जल्द खदेड़ सकें।


मनोज पाण्डेय की यूनिट अभी-अभी सियाचिन से होकर वापस आई थी और इस वीर सिपाही ने आराम करने की बजाय देश की रक्षा के लिए जान की बाजी लगाना ही ज्यादा उचित समझा और वह पहुँच गए कारगिल सेक्टर।

लेफ्टीनेंट पाण्डेय शायद पहले पहले अफसर थे जिन्होंने स्वयं ही आगे बढ़कर सबसे पहले इस युद्ध में शामिल होने के लिए अपना नाम सेना को और अपने सीनियर अफसरों को भेजा था। अगर लेफ्टीनेंट पाण्डेय चाहते तो उन्हें छुट्टी मिल सकती थी। लेकिन सियाचिन से लौटने के बाद मनोज पाण्डेय कारगिल युद्ध में भाग लेना चाहते थे।

इस युद्ध के दौरान उन्हें प्रमोशन दिया गया और उन्हें बना दिया गया लेफ्टीनेंट से कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय और अब इस वीर सिपाही ने शुरू कर दिया था कारगिल सेक्टर में दुश्मन के गोले, बारूद और तोपों का सामना करना और चुन-चुन कर पाकिस्तानी घुसपैठियों का सफाया करना। गोलियों की बौछार से डरने वाला नहीं था ये सैनिक और निरंतर अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ता रहा जहाँ दुशमन घात लगाये ऊँची चोटी पर बैठे इस ताक में थे कि कब उन्हें कोई भारतीय सैनिक दिखे, ऐसे में ये वीर सैनिक अपनी जान की परवाह किये बिना बढ़ता रहा।
जुलाई 2 और 3, 1999 की दरमियानी रात को उनकी पलटन खालूबार की ओर कूच करते हुए अपने अंतिम लक्ष्य की तरफ बढ़ रही थी, तब आसपास की पहाड़ियों से दुश्मनों ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी। लेफ्टिनेंट पांडय को आदेश दिया गया कि शत्रु के ठिकाने नेतस्तनाबूत कर दिए जाएं ताकि सेना की टुकड़ी सूर्योदय तक दुश्मनों के कब्जे वाले खालूबार को अपने कब्जे में ले सके।

दुश्मन की भारी गोलीबारी के बावजूद युवा अधिकारी ने तेजी से अपनी पलटन को एक बेहतर जगह ले जाते हुए एक दल को दाहिने तरफ के ठिकाने को तबाह करने को भेज दिया और खुद बांयी तरफ से दुश्मनों को चकमा देते हुए आगे बढ़ने लगे।

Manoj-pandey-kargil

पहले ठोर पर हमला करते हुए उन्होंने दुश्मन के दो सैनिकों को को मार गिराया और दूसरे ठोर पर भी इतने ही सिपाही मारे। तीसरे ठोर पर आक्रमण करते हुए उनके कंधे और पांवों में गंभीर चोंटे आयीं लेकिन फिर भी अपने घावों की परवाह किये बिना वे हमले का नेतृत्व करते रहे और अपने जवानों की हौंसला अफजाई करते हुए एक हथगोले से चौथे ठोर की धज्जियां उड़ा दीं। इसी दौरान उनके सिर में गोलियां लगीं और वे वीर गति को प्राप्त हुए। मनोज पाण्डेय तबतक खालूबार पर कब्ज़ा करने की नींव रख चुके थे और इतिहास में अपना नाम एक वीर योद्धा के रूप में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने वाला कारनामा कर चुके थे। लेफ्टिनेंट पांडे के इस अदम्य साहस और नेतृत्व के कारण भारतीय सैनिकों को खालूबार पर विजय हासिल करने में मदद मिली।

कैप्टन मनोज पाण्डेय के वो शब्द, ‘मौत भी मुझे मेरी मातृभूमि की रक्षा के कर्तव्य से रोकने आई तो उसे पराजित कर दूंगा!‘ अपने आप में वीरता की कहानी कहता है।
भारत माँ के इस वीर सपूत को मरोनोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया! देश के लिए शहीद होने वाले सैनिक को इससे बढ़कर कुछ नहीं चाहिए होता है।

2. कैप्टन विक्रम बत्रा :

कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पालमपुर में डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल में प्राप्त की। 12वीं पढ़ाई पूरी करने के बाद विक्रम डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में विज्ञान विषय में स्नातक किया। इसके बाद उनका चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।

पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया।

शेरशाह के नाम से प्रसिद्ध विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें ‘कारगिल का शेर’ की भी संज्ञा दे दी गई। अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया में आया तो हर कोई उनका दीवाना हो उठा। इसके बाद सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू कर दिया। इसकी भी बागडोर विक्रम को सौंपी गई। उन्होंने जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा।

अंतिम समय मिशन लगभग पूरा हो चुका था जब कैप्टन अपने कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के लिए लपके। लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में लेफ्टीनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे। जब कैप्टन बत्रा लेफ्टीनेंट को बचाने के लिए पीछे घसीट रहे थे तब उनकी की छाती में गोली लगी और वे 'जय माता दी' कहते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र के सम्मान से नवाजा गया जो उनके पिता जीएल बत्रा ने प्राप्त किया।

2003 की फिल्म ‘एलओसी’ कारगिल युद्ध के सैनिकों के लिए एक श्रद्धांजलि के रूप में बनाई गयी, जिसमें कथित तौर पर, अभिषेक बच्चन ने कैप्टन बत्रा की भूमिका निभाई थी।

शहीद विक्रम बत्रा की कही ये बात आज भी एक जोश पैदा करती है “या तो मैं तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर। लेकिन मुझे यकीन हैं, मैं आऊंगा ज़रूर।”

3. राइफलमैन संजय कुमार :

राइफलमैन संजय कुमार का जन्म 3 मार्च, 1976 को विलासपुर हिमाचल प्रदेश के एक गांव में हुआ था। मैट्रिक पास करने के तुरंत बाद वह 26 जुलाई 1996 को फौज में शामिल हो गए। कारगिल युद्ध के दाैरान संजय 4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप प्वाइंट 4875 की ओर कूच करने के लिए राइफल मैन संजय ने इच्छा जताई की कि वह अपनी टुकड़ी के साथ अगली पंक्ति में रहेंगे।

संजय जब हमले के लिए आगे बढ़े तो एक जगह से दुश्मन ओटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी और टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसे में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संजय ने तय किया कि उस ठिकाने को अचानक कमले से खामोश करा दिया जाए। इस इरादे से संजय ने एकाएक उस जगह हमला करके आमने-सामने की मुठभेड़ में तीन दुश्मन को मार गिराया और उसी जोश में गोलाबारी करते हुए दूसरे ठिकाने की ओर बढ़े।

राइफल मैन इस मुठभेड़ में खुद भी लहूलुहान हो गए थे, लेकिन अपनी ओर से बेपरवाह वह दुश्मन पर टूट पड़े। इस आकस्मिक आक्रमण से दुश्मन बौखला कर भाग खड़ा हुआ और इस भगदड़ में दुश्मन अपनी यूनीवर्सल मशीनगन भी छोड़ गया। संजय कुमार ने वह गन भी हथियाई और उससे दुश्मन का ही सफाया शुरू कर दिया।

संजय के इस चमत्कारिक कारनामे को देखकर उसकी टुकड़ी के दूसरे जवान बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने बेहद फुर्ती से दुश्मन के दूसरे ठिकानों पर धावा बोल दिया। इस दौर में संजय कुमार खून से लथपथ हो गए थे लेकिन वह रण छोड़ने को तैयार नहीं थे और वह तब तक दुश्मन से जूझते रहे थे, जब तक वह प्वाइंट फ्लैट टॉप दुश्मन से पूरी तरह खाली नहीं हो गया। इस तरह राइफल मैन संजय कुमार ने अपने अभियान में जीत हासिल की।

4. ग्रिनेडियर योगेंद्र सिंह यादव :

सबसे कम आयु में ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाले इस वीर योद्धा योगेन्द्र सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के औरंगाबाद अहीर गांव में 10 मई, 1980 को हुआ था। 27 दिसंबर, 1996 को सेना की 18 ग्रेनेडियर बटालियन में भर्ती हुए योगेंद्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सेना की ही रही है, जिसके चलते वो इस ओर तत्पर हुए। उनके पिता भी करन सिंह यादव भी भूतपूर्व सैनिक थे वह कुमायूं रेजिमेंट से जुड़े हुए थे और 1965 तथा 1971 की लड़ाइयों में हिस्सा लिया था।

कारगिल युद्ध में योगेंद्र का बड़ा योगदान है। उनकी कमांडो प्लाटून 'घटक' कहलाती थी। उसके पास टाइगर हिल पर कब्जा करने के क्रम में लक्ष्य यह था कि वह ऊपरी चोटी पर बने दुश्मन के तीन बंकर काबू करके अपने कब्जे में ले। इस काम को अंजाम देने के लिए 16,500 फीट ऊंची बर्फ से ढकी, सीधी चढ़ाई वाली चोटी पार करना जरूरी था।

इस बहादुरी और जोखिम भरे काम को करने का जिम्मा स्वेच्छापूर्णक योगेंद्र ने लिया और अपना रस्सा उठाकर अभियान पर चल पड़े। वह आधी ऊंचाई पर ही पहुंचे थे कि दुश्मन के बंकर से मशीनगन गोलियां उगलने लगीं और उनके दागे गए राकेट से भारत की इस टुकड़ी का प्लाटून कमांडर तथा उनके दो साथी मारे गए। स्थिति की गंभीरता को समझकर योगेंद्र ने जिम्मा संभाला और आगे बढ़ते बढ़ते चले गए। दुश्मन की गोलाबारी जारी थी। योगेंद्र लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहे थे कि तभी एक गोली उनके कंधे पर और दो गोलियां जांघ व पेट के पास लगीं लेकिन वह रुके नहीं और बढ़ते ही रहे। उनके सामने अभी खड़ी ऊंचाई के साठ फीट और बचे थे।

उन्होंने हिम्मत करके वह चढ़ाई पूरी की और दुश्मन के बंकर की ओर रेंगकर गए और एक ग्रेनेड फेंक कर उनके चार सैनिकों को वहीं ढेर कर दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना यादव ने दूसरे बंकर की ओर रुख किया और उधर भी ग्रेनेड फेंक दिया। उस निशाने पर भी पाकिस्तान के तीन जवान आए और उनका काम तमाम हो गया। तभी उनके पीछे आ रही टुकड़ी उनसे आकर मिल गई। आमने-सामने की मुठभेड़ शुरू हो चुकी थी और उस मुठभेड़ में बचे-खुचे जवान भी टाइगर हिल की भेंट चढ़ गए। टाइगर हिल फतह हो गया था और उसमें योगेंद्र सिंह का बड़ा योगदान था। अपनी वीरता के लिए ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह ने परमवीर चक्र का सम्मान पाया।  


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