ख़ास रिपोर्ट

नक्सलवाद, गरीबी और अनदेखी झेलता छत्तीसगढ़ का ये गांव

प्रांजलि सिंह, संवाददाता, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जून 23 , 2017 , 13:25 IST | कांकेर

आज हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं। तकनीकी जगत में दिन प्रतिदिन हम क्रांति ला रहे हैं, आगे और लाने की तैयारी है पर आइये इसी क्रांति के बीच आज हम आपको भारत के एक ऐसे कोने में ले कर चलते हैं जहां के लोगों ने सवेरा कभी देखा ही नहीं..वहां विकास तो हो रहा है पर लोगों का नहीं बल्कि उनके पिछड़ेपन का, भूख का गरीबी का, और सबसे खतरनाक नक्सलवाद का!

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कभी पक्की सड़क नहीं देखी

छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला...मंडेनार, कोटकोडो, निप्रा, तमोरा, ये वो गाँव है जहां तक पहुंचने के लिए आपको घंटो पैदल चलना पड़ेगा क्योकि वहां तक आज भी कोई सड़क नहीं जाती..पक्के मकान तो छोड़ दीजिये ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो खुले में रहने को मजबूर हैं..धान की खेती साल में बस एक बार होती हैं, और उस चावल से वो पूरा साल निकाल देते हैं, कभी उसे कच्चा खाते हैं तो कभी उबाल कर। सब्जी में जंगली पत्ते, कच्चे बांस, और घास को पका कर खाते हैं..जंगली इलाका होने के कारण कई बार जंगल से चुने फलों को खा कर भी इन्हें अपना पेट भरना पड़ता हैं।

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साड़ी क्या होती हैं इन्हें पता ही नहीं...

यहां ज्यादातर घर की महिलाएं पुरुषों के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली लुंगी पहनती हैं, उन्हें पता ही नहीं की साड़ी क्या होती हैं, और उनके पास इतने पैसे भी नहीं की वो 100  या 80 रुपये की साड़ी खरीद सके, सही मायने में ये भी बात सच है की आस पास कोई दूकान भी नहीं। महीने दो महीने में जब घर के पुरुष गांव से मीलों पैदल चल कर जाते हैं तो अपने जैसे ही कपड़े घर की महिलाओं के लिए भी ले आते हैं, और कई बार तो ऐसा भी होता है कि ये यूं ही बिना कपड़ो के घूम रही होती हैं।

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गाँव वालों को मिला जवानों का साथ

इतनी भयभीत करने वाली तस्वीरों में से कुछ अच्छी तस्वीरें बता रही हैं की आज भी इंसानियत ज़िंदा हैं, अति संवेदनशील और नक्सलियों का गढ़ माने जाने के कारण इन गांवों में BSF के जवान गश्त लगाते रहते है, और जहां तक हो सके वो इन लोगों की काफी मदद करते है चाहे बच्चों को जागरूक करना हो महिलाओं को कपड़े बाँटना हो, मेडिकल की सुविधा देना हो, या फिर कैश के नाम पर कभी कभी ये जवान अपने पगार का कुछ हिस्सा भी इन गाँव वालों को बाँट देते हैं, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया ने जब इन जवानों से सम्पर्क साध कर इसका कारण जानना चाहा तो जवाब बड़ा सटीक मिला " ऐसी हालत को देखकर आप भी नहीं रह पाएंगे तो भला हम इनकी मदद क्यों न करे हमें तो रोज दिन इनसे मिलना है "

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सरकार और NGO की पहुँच से कोसो दूर है अभी ये गांव 

हमने जो जानकारी हासिल की हैं उसके मुताबिक ये बात सच है की आज तक सरकार ने कभी यहाँ तक आने की ज़हमत नहीं उठाई, शायद यही वजह है की इनको ये भी नहीं पता की इनका मुख्यमंत्री कौन है। पिछड़े इलाके होने की वजह से या कहे नक्सल गढ़ होने की वजह से कोई NGO भी आज तक यहाँ नहीं पहुँच पाया..पर हां आप एक और बात से इस गाँव के पिछड़ेपन का अंदाजा लगा सकते हैं की आज भी 6 -7 सदस्यों वाले परिवार में किसी एक बुजुर्ग को केवल 300 रुपये पेंशन मिलती हैं जिससे पूरे घर का गुज़ारा होता है...कितना दुखद है..   

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