ख़ास रिपोर्ट

राजस्थान के मारवाड़ी सेठ की पाकिस्तान को दो अद्भुत सौगातें

icon अमितेष युवराज सिंह | 10
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| जून 20 , 2017 , 15:25 IST

कराची में स्थापत्य कला के दो अद्भुत नमूने हैं, मोहता पैलेस और हिन्दू जिमखाना। मोहता पैलेस कराची के मशहूर पॉश इलाके क्लिफ्टन में स्थित है वहीं हिन्दू जिमखाना कराची के एम आर कयानी रोड की शोभा बढ़ा रहा है। दोनों का निर्माण लगभग एक ही समय में हुआ। मोहता पैलेस 1927 में, तो हिन्दू जिमखाना इससे थोड़ा-सा पहले 1925 में बनकर तैयार हुआ।

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पाकिस्तान की शान बढ़ा रहा है मोहता पैलेस और हिन्दू जिमखाना

इन दिनों मोहता पैलेस एक समृद्ध म्यूजियम के रूप में पाकिस्तान की शान बढ़ा रहा है तो हिन्दू जिमखाने में पाकिस्तान की नेशनल एकडेमी ऑफ परफोर्मिंग आर्ट्स का मुख्यालय है। दोनों की कहानी और इतिहास एक मारवाड़ी सेठ से जुड़ा हुआ है। जहां मोहता पैलेस सेठ शिवरतन चन्द्ररतन मोहता का ग्रीष्मकालीन घर हुआ करता था वहीं हिन्दू जिमखाना को बनाने में आई लागत का अधिकांश हिस्सा सेठ शिवरतन मोहता के परिवार ने ही दिया था, जिसके चलते इसका नाम बाद में सेठ रामगोपाल गोवर्धनदास मोहता हिन्दू जिमखाना कर दिया गया। सेठ रामगोपाल मोहता, सेठ शिवरतन मोहता के सगे भाई थे।

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हिन्दू जिमखाना

47 हजार स्क्वायर यार्ड्स में फैला और मुगल स्थापत्य शैली में बना हिन्दू जिमखाना 1947 तक कराची में रईस हिन्दुओं का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इसे बनाने के लिए स्थानीय गिज्री येलो स्टोन के साथ-साथ बीजापुर और जोधपुर से खास पत्थर मंगवाए गए। बंटवारे के बाद जब बड़ी तादाद में रईस हिन्दुओं ने पाकिस्तान छोड़ दिया तो इस बिल्डिंग को पाकिस्तान सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।

बाद में यहां पाकिस्तान सरकार के कई तरह के दफ्तर रहे। हालांकि जिमखाना समय-समय पर कानूनी पचड़ों में भी फंसता रहा। आज भी पाकिस्तान की अलग-अलग अदालतों में इससे जुड़े 17 केस लंबित हैं। 1984 में तो इसे गिराने की योजना बना ली गई थी लेकिन हेरिटेज फाउंडेशन ऑफ पाकिस्तान के दखल से ऐसा नहीं हो पाया। आजकल यहां पाकिस्तान की नेशनल एकडेमी ऑफ परफोर्मिंग आर्ट्स है जिसके चलते हिन्दू जिमखाना कराची में कलाप्रेमियों की सबसे पसंदीदा जगह बना हुआ है।

मोहता पैलेस

मोहता पैलेस की कहानी कई मामलों में बेहद खास और रोचक है. उस दौर के मशहूर और पहले मुस्लिम आर्किटेक्ट अहमद हुसैन आगा ने इस बिल्डिंग की डिजाइन को तैयार किया था। समंदर के किनारे स्थित इस महल को बनाने में जोधपुर के गुलाबी पत्थरों के साथ-साथ स्थानीय गिज्री येलो स्टोन का इस्तेमाल किया गया।

1927 में बनकर तैयार हुए मोहता पैलेस को उस दौर में ही नहीं, आज भी वैभव, भव्यता और स्थापत्य कला का नायाब प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि 18 हजार स्क्वायर फीट में फैली इस दो मंजिला भव्य इमारत की बराबरी की इमारत न तो पाकिस्तान में विभाजन से पहले थी और न ही विभाजन के बाद बन पाई है।

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वैसे मोहता पैलेस की कहानी ताज महल जैसी प्रेम कहानी भी जुड़ी है। जहां मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी मृत पत्नी मुमताज की यादगार में ताजमहल बनवाया, वहीं सेठ शिवरतन मोहता ने अपनी बीमार पत्नी को जिंदा रखने के लिए यह महल बनवा डाला।

कहते हैं कि एक डॉक्टर ने सेठ शिवरतन को सलाह दी थी कि यदि वे समुद्र किनारे किसी घर में शिफ्ट हो जाएं तो उनकी बीमार पत्नी ताजा हवाओं से ठीक हो सकती हैं। मोहता ने इसके बाद समुद्र किनारे पूरा महल ही खड़ा कर डाला। इस महल की छत पर मोहता ने अपनी शिवभक्त पत्नी के लिए भगवान शिव का एक सुंदर मंदिर भी बनवाया।

खैर, मोहता परिवार इस महल में सिर्फ दो दशकों तक ही रह पाया क्योंकि इस खानदान ने बंटवारे के कुछ ही दिनों बाद कराची हमेशा के लिए छोड़ दिया।

मोहता खानदान का परिचय

मोहता सेठ मूलतः राजस्थान के बीकानेर के रहने वाले थे। दरअसल 1842 में मोतीलाल मेहता बीकानेर से दक्कन में हैदराबाद चले गए और वहां एक मारवाड़ी सेठ हीरालाल मूणलाल ढड्ढा की दुकान पर मुनीम का काम करने लगे। मोतीलाल मोहता के चार बेटे थे, शिवदास, जागनाथ, लक्ष्मीचन्द और गोवर्धनदास, जिन्होंने बाद में कोलकाता जाकर कपड़े और दूसरे कारोबारों के जरिए अथाह दौलत कमाई।

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इन चार भाईयों में एक गोवर्धनदास मोहता ने 1883 में कराची पहुंचे। यहां गोवर्धनदास ने एक दुकान स्थापित की और सर्राफ का काम शुरू किया। बाद में उन्होंने दूसरे भी कई कारोबारों में हाथ आजमाए। उनके सभी कारोबार खूब चल पड़े और थोड़े ही सालों में सेठ गोवर्धनदास कराची के व्यापारी समुदाय में जाना-पहचाना नाम बन गए। गोवर्धनदास ने आधुनिक कराची के निर्माण में बड़ा योगदान दिया। उन्होंने यहां एक विशाल कपड़ा मार्केट भी बनवाया।

कराची में बन्दर रोड स्थित पाकिस्तान के इस सबसे बड़े कपड़ा मार्केट को आज भी गोवर्धनदास मार्केट के नाम से ही जाना जाता है। गोवर्धनदास को अंग्रेजों ने 'रायबहादुर' जैसी उपाधियों से भी नवाजा।

गोवर्धनदास मेहता के दो बेटे थे। बड़े बेटे रामगोपाल (जिनके नाम हिन्दू जिमखाने का नाम रखा गया) एक विद्वान और लेखक हुए वहीं छोटे बेटे शिवरतन एक बड़े उद्योगपति के रूप ख्यात हुए। शिवरतन ने कराची के साथ-साथ भारत के कई इलाकों में स्टील मिल, सुगर मिल के साथ-साथ कई दूसरे व्यवसाय भी स्थापित किए और खूब दौलत जमा की।

व्यवसाय और शौहरत के साथ-साथ मोहता परिवार अपनी जड़ों यानि बीकानेर से भी वास्ता कायम रखा। दोनों भाई बीकानेर राज्य में कई अहम पदों पर भी रहे। शिवरतन को तो 1945 में महाराजा शादूल सिंह मंत्रिमंडल में सिविल सप्लाई मिनिस्टर बनाया गया। इतना ही अपने पिता की तरह शिवरतन भी अंग्रेजों द्वारा 'रायबहादुर' की उपाधि से नवाजे गए।

विभाजन के बाद

सन 47 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद मोहता परिवार ने कराची में ही रहने का फैसला किया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद एक स्थानीय नेता और अधिकारियों ने अचानक उन्हे महल खाली करने का फरमान सुना दिया। अधिकारियों के मुताबिक इस महल में नई-नवेली पाकिस्तान सरकार का कोई बड़ा दफ्तर बनाया जाना था।

हालांकि इस महल को जिन्ना परिवार के लिए खाली करवाया गया था लेकिन मोहता परिवार को यह नहीं बताया गया। एक जानकारी के मुताबिक, यदि ऐसा मोहता परिवार को मालूम होता कि उनके घर की जरूरत कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार को है, तो शायद वे अपने इस आलीशान और महलनुमा घर को मोहम्मद अली जिन्ना को भेंट ही कर देते।

स्थानीय नेता और अधिकारियों के व्यवहार से मोहता परिवार इनता आहत हुआ कि परिवार ने तुरंत कराची छोड़ने का फैसला करते हुए रातो-रात मुंबई की राह पकड़ ली। इतना ही नहीं कराची छोड़ने के बाद मोहता परिवार का कोई भी सदस्य कभी दुबारा पाकिस्तान ही नहीं गया।

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विभाजन के बाद मोहता पैलेस में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का मुख्यालय बनाया गया। सालों तक मोहता पैलेस की तस्वीर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मोनोग्राम के रूप में इस्तेमाल होती रही। 1964 में इस महल को मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना को सौंप दिया गया। फातिमा यहीं से ही अपनी तमाम राजनीतिक गतिविधियां भी चलाती रहीं जिनमें अय्यूब खान के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना भी शामिल है।

9 जुलाई 1967 को फातिमा जिन्ना इसी मोहता पैलेस में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गईं। फातिमा की मौत के बाद यह जगह कानूनी पचड़ों में फंस गई। हालांकि बाद में सिंध हाईकोर्ट ने पैलेस को मोहम्मद अली जिन्ना की दूसरी बहन शिरीन जिन्ना को सौंप दिया। 1980 में शिरीन की मौत के बाद मोहता पैलेस को सिंध सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। कानूनी झमेलों के बीच कुछ सालों तक यह भव्य महल सील कर दिया गया। इसके बाद 1984 में मोहता पैलेस को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। आखिरकार 1995 में मोहता पैलेस को सिंध सरकार ने खरीदकर इसे एक म्यूजियम के रूप में तब्दील कर दिया।

भूत, सुरंग का रहस्य और मोहता पैलेस

वैसे महल से जुड़ी और भी कई कहानियां हैं जिनमें से कई बड़ी रहस्यमयी भी है। मसलन, इस महल से एक सुरंग करीब एक किलोमीटर दूर स्थित शिवमंदिर तक जाती है जिसके दोनों छोर अब बन्द कर दिए गए हैं। यही नहीं, मोहता पैलेस पाकिस्तान के सबसे भुतही जगहों में से एक है। लोगों का कहना है कि यहां कई विचित्र घटनाएं घटती रहती हैं। यहां रखी चीजों की जगह अपने आप बदल जाती है। लाइटें धीमी हो जाती हैं और किसी की डरावनी मौजूदगी को महसूस किया जाता है।

मोहता पैलेस समय-समय पर खबर भी बनता रहता है। कुछ साल पहले सिंध असेंबली में MQM के नेता सदन ने मारवाड़ी सेठ से महल को जबरदस्ती छीने जाने को निहायत ही खेदजनक बताया था। बकौल MQM नेता सैयद सरदार अहमद, जिस मारवाड़ी सेठ ने पाकिस्तान में ही रहने का फैसला किया था, उससे इस तरह महल को लेना गलत था। वहीं सिंध असेंबली में हिन्दू जिमखाने को वापस हिन्दू समुदाय को सौंपने की मांग समय-समय पर उठती रही है। अच्छी बात यह है कि इस तरह की मांग बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय के जनप्रतिनिधियों की तरफ से की जाती रही है।

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वैसे मोहता पैलेस का आधिकारिक नाम कैसर-ए-फातिमा है लेकिन पाकिस्तान और पूरी दुनिया में इसे मोहता पैलेस के नाम से ही जाना जाता है। यहां तक की म्यूजियम की वेबसाइट भी इसी नाम से है।

(लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में कार्यरत है और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से भारत-जापान सम्बधों पर पीएचडी कर रहे हैं)

 


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं

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