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किताबों से नहीं हटेंगी गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाएं, जानिये क्यों मचा बवाल

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 25 , 2017 , 19:16 IST | नयी दिल्ली

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मंगलवार को कहा कि स्कूली पाठ्य पुस्तकों से रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं और उनके संदर्भ को हटाने की सरकार की कोई योजना नहीं है। राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सदस्य डेरेक ओ ब्रायन की ओर से पूछे गए एक सवाल के जवाब में जावड़ेकर ने कहा कि सरकार टैगोर और उन सभी का सम्मान करती है जिन्होंने देश की आजादी और साहित्य के लिए योगदान दिया है।

उन्होंने कहा,

हम हर किसी की सराहना करते हैं और कुछ नहीं हटाया जायेगा। एनसीईआरटी की पुस्तकों, शिक्षकों और अन्य से कहा गया है कि वे पाठ्यपुस्तकों में किसी भी 'तथ्यात्मक त्रुटि' को हटाने या सुधारने के सुझाव दें।

डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सुझाव मांगे थे और आरएसएस के अनुषांगिक संगठन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का एक सुझाव था कि पाठ्यक्रम से टैगोर की रचनाओं और संदर्भों को हटा दिया जाए। तृणमूल सांसद ने कहा, 'रवींद्रनाथ टैगोर को किसी से प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है। मंत्री के बयान के बाद डेरेक ओ ब्रायन टैगोर पर आधारित तीन पुस्तकें भेंट करने के लिए जावड़ेकर के पास गए।

सपा के नरेश अग्रवाल ने कहा कि न्यास ने पाठ्य पुस्तकों से उर्दू शब्दों और मिर्जा गालिब को हटाने का भी सुझाव दिया है। जावडेकर ने कहा कि 7000 सुझाव आए हैं और 'हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे कुछ समस्या खड़ी हो। शून्य काल के दौरान भाकपा के डी राजा ने शिक्षा क्षेत्र के प्रति सरकार की 'उदासीनता ' के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी में कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के हजारों शिक्षकों के प्रदर्शन का मुद्दा उठाया।

Tagore

आपको बता दें कि आरएसएस से जुड़ी एक संस्था ने एनसीईआरटी को यह सलाह दी थी कि उर्दू, अरबी के शब्द, गालिब, पाश की कविताएं और गुरुदेव के लेख पाठ्‌यक्रम से हटायें जायें। संघ से संबद्ध इस न्यास के प्रमुख दीनानाथ बत्रा हैं, जो पहले संघ की शैक्षणिक शाखा विद्या भारती के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने पांच पन्नों के अपने सुझाव में किताबों से अंग्रेज़ी, उर्दू और अरबी शब्दों सहित रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेख, क्रांतिकारी कवि पाश और मशहूर शायर ग़ालिब की रचनाओं के साथ चित्रकार एमएफ हुसैन की आत्मकथा के कुछ अंश हटाने की सिफारिश की है। वहीं न्यास का यह भी कहना है कि हिंदी की किताबों में सूफी कवि अमीर खुसरो के बारे में बताते समय यह भी बताया जाना चाहिए कि उन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बीच खाई को बढ़ावा दिया था।


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