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मौत का तालिब हूं मैं, मेरी लबों पे जान है....उर्दू में होने वाली इस रामलीला को देखिए

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 3 , 2017 , 13:03 IST | फरीदाबाद

देशभर में रामलीला और नवरात्र का समापन हो चुका है। अयोध्या वापसी पर राम जी की आरती उतारी गई और खुशियां मनाईं गईं। जहां दुनिया भर में अलग-अलग तरह से रामलीला का मंचन हुआ वहीं हरियाणा के फरीदाबाद में रामलीला की एक नई मिसाल देखने को मिली। लीला राम की, पर संवादों में शब्दों का प्रयोग निखालिस उर्दू का।

कहा जाता है कि उर्दू के लफ्जों यानी शब्दों का जब कोई उच्चारण करता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि हर लफ्ज चाशनी में घुल कर आ रहा हो। जी हां, हरियाणा के फरीदाबाद में उर्दू जबान में रामलीला होती है। जहां राम से लेकर रावण तक सब उर्दू में अपने डायलॉग बोलते हैं।

‘महाराजा जनक अपनी जु़बान को संभालो और ऐसे बेहूदा अल्‍फ़ाज़ अपने मुंह से न निकालो। घर पर बुलाकर किसी की बेइज्‍जती करना कहां की अक्लमंदी है, बल्‍कि आलादर्जे की खुद पसंदी है...’

‘मौत का तालिब हूं मैं, मेरी लबों पे जान है, दो घड़ी का यह मुसाफिर आपका मेहमान है...’

‘यह पीछे से फिकर करना मुझे बदला दिलाने की, कोई तजवीज कर पहले तू अपनी जां बचाने की...’

इस रामलीला में सभी किरदार चौपाई की जगह शेरो-शायरी में अपनी बात रखते हैं। भारत-पाक विभाजन के दौरान पाकिस्तान से आए हिंदू चौपाई वाली रामलीला की जगह शेर-ओ-शायरी वाली रामलीला का मंचन करते हैं। इसका मंचन फरीदाबाद और पलवल और लखनऊ में होता है।

वहां से आए 70 साल हो रहे हैं लेकिन उर्दू आज भी उनके काफी नजदीक है। उनके पूर्वज बंटवारे से पहले पाकिस्‍तान में उर्दू शब्‍दों की बहुलता वाले संवाद ही रामलीला में सुनाया करते थे। फरीदाबाद में ऐसी रामलीला एनएच-1 और सेक्‍टर-15 में होती है।

एनएच-एक में होने वाली विजय रामलीला के संरक्षक विश्‍वबंधु शर्मा कहते हैं कि ‘पाकिस्‍तान के हिंदू उर्दू पढ़ते और अच्‍छी तरह समझते थे। इसलिए स्‍क्रिप्‍ट में शेरो-शायरी खूब हैं। हमारे बुजुर्ग जब बंटवारे के बाद पाकिस्तान से यहां आए तो उर्दू भाषा की यह स्क्रिप्ट अपने साथ लाए थे। तब से हमने इसमें मामूली बदलाव किए हैं लेकिन आधार वही है। कोशिश यह है कि उर्दू भी जिंदा रहे और स्क्रिप्ट ज्यादा न बदले।’

शर्मा कहते हैं कि भारत-पाक विभाजन की त्रासदी में लाखों लोग इधर से उधर हुए। घर-बार छूट गए लेकिन उन्‍होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत नहीं छोड़ी। यहां की रामलीलाओं में दो भाषाओं और संस्कृतियों का मिलन होता है।

उर्दू रामलीला के डायरेक्टर अनिल चावला बताते हैं कि उनके पूर्वज पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनवा इलाके के रहने वाले थे। जो बंटवारे के बाद भारत आ गए थे।

अनिल चावला ने बताया कि हमारे पूर्वज पाकिस्तान से आए थे। तो उनके साथ उर्दू में लिखी रामलीला भी भारत आ गई। भारत में आने के बाद भी उन लोगों ने उर्दू नहीं छोड़ा। और फिर हम लोगों ने इसे अपना लिया।

ऐसे शब्‍दों का होता है प्रयोग-

कायरपन, बुजदिली, शुमार, जुमले, जुल्‍म, हलक, पैगाम, कत्‍लेआम, आबरू, नुमाइश, मुतस्‍सर, जौहर, बेहूदा अल्‍फाज, अफसोस, तिलमिलाना, गुस्‍ताख, नाहक, दुहाई, गुनाहगार, लख्‍ते-जिगर, संग दिल, गुफ्तगू, तालिब, गैरमौजूदगी, आइंदा और लगाम जैसे शब्‍दों का संवाद में इस्‍तेमाल यहां आम है।

शर्मा कहते हैं कि चौपाई की जगह शायरी दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है। संवाद याद करना आसान होता है। समय-समय पर जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव भी किया गया है। राधेश्‍याम और जसवंत सिंह टोहानवी की लिखी रामायण के अंश डाले गए हैं।

(साभार- द क्विंट)


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