ओपिनियन

माफ कीजिये! पुलिस और मीडिया भी हैं आरुषि के गुनहगार

icon कुलदीप सिंह | 0
1425
| अक्टूबर 12 , 2017 , 17:28 IST | नई दिल्ली

15-16 मई 2008 की रात आरुषि तलवार और तलवार परिवार के नौकर हेमराज को किसने मारा? नहीं पता ...
आप किसी से भी सवाल पूछिए कोई दावे से नहीं कह सकता कि इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम किसने दिया? लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि एक सीधे सादे डबल मर्डर केस को मीडिया की सनसनी फैलाने की सनक और नोएडा पुलिस के लापरवाह रवैये ने एक अनसुलझी गुत्थी बना दिया। अपने इस विचार को मैं यूं ही नहीं रख रहा हूं इसके पीछे तर्क भी हैं।

आरुषि मर्डर केस में बड़ा फैसला, हाईकोर्ट ने कहा- तलवार दंपति ने बेटी को नहीं मारा


मुझे याद है साल 2008 के वो दिन... देश के एक बड़े समाचार चैनल में विशेष संवाददाता होने के नाते सबसे पहले मुझे आरुषि और हेमराज के क़त्ल का रिपोर्टिंग का मौका मिला। पहले दिन यानी 16 मई 2008 को आरुषि की हत्या के बाद नोएडा पुलिस ने जिस लापरवाह तरीके से मामले की जांच की वो मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी।
मुझे याद है नोएडा पुलिस के एक चौकी इंचार्ज़ बच्चू सिंह से जब मैने पहले पहल पूछा कि आपको क्या लगता है डॉक्टर राजेश और नुपूर तलवार की बेटी को किसने मारा होगा? बच्चू सिंह का सीधा जवाब था, नौकर हेमराज गायब है कुलदीप जी उसी पर शक है हमें तो एसओ (थाना सेक्टर 20 इंचार्ज़) ने बोला है मामला ज़रा हाईप्रोफाइल है जल्दी से पंचनामा करो हम तो वही कर रहे हैं। बच्चू सिंह और उनके साथ आए सिपाहियों की हालत देखकर मैं पहले दिन ही समझ गया था कि क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन को लेकर उनकी समझ बेहद सीमित थी। वो तो बस जल्दी में थे लाश बरामद की और दूसरे नौकरों और माता -पिता से बातचीत कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। चूंकि नौकर हेमराज उस वक्त तक गायब था लिहाज़ा उसपर लूट का शक जाहिर किया गया और मेरे देखते ही देखते नोएडा पुलिस ने हेमराज को कातिल बता दिया। मीडिया में ख़बर लीक कर दी गई और वो एक सामान्य क्राइम की स्टोरी बन कर रह गई।

 की हत्या से कांग्रेस को फायदा हुआ (1)

16 मई 2008 को अखबारों और टीवी में आरुषि तलवार की मौत दिल्ली से सटे नोएडा में एक हत्या भर थी लेकिन 17 मई की सुबह कहानी में नया ट्विस्ट आ गया, डॉ. राजेश तलवार के घर की छत पर उस नौकर की लाश मिली जिसे पुलिस (बच्चू सिंह एंड पार्टी) ने संभावित क़ातिल करार दिया था । बस 17 मई से ही आरुषि-हेमराज के क़त्ल में कयासों ने जांच पर अपना साया कर लिया। तलवार दंपत्ति के घर से फोरेंसिक सुबूत जुटाए ही नहीं गए थे, बस हो ये रहा था कि जो भी इस केस के बारे में सुन रहा था क़त्ल के लिए कभी पड़ोस के नौकरों तो कभी रिश्तेदारों पर शक़ जाहिर कर रहा था। मामला उलझता जा रहा था, 23 मई 2008 को मामले पर मीडिया की ज्यादा सक्रियता देखकर आरुषि के पिता डॉ राजेश तलवार को यूपी पुलिस ने आरुषि और हेमराज की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। प्रेस कांफ्रेंस करके साबित करने की कोशिश की गई कि पुलिस ने केस को बेहद कम समय में सुलझा दिया।

Aarushi-with-her-father


पुलिस की थ्योरी पर यकीन करना लोगों के थोड़ा मुश्किल था आखिर कैसे एक पिता अपनी ही बेटी की हत्या कर सकता है? लेकिन पुलिस तो जैसे यकीन दिलाने पर आमादा थी।
यहां मैं ये भी जिक्र करना चाहूंगा कि चूंकि उन दिनों ये केस टीआरपी और रीडरशिप के लिहाज़ से टीवी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों की पहली पसंद बन गया था, मीडिया भी नई नई थ्योरियां सामने ला रहा था। मुझे याद है जिस समाचार चैनल में मैं उन दिनों नौकरी कर रहा था वहीं पर इस केस को लेकर कितनी मारा-मारी मची हुई थी। संपादक और उनके नीचे मेरे सीनियर अधिकारियों पर दबाव था दर्शकों को उलझाए रखिए, हर दिन कुछ नई सनसनी..

आरुषि मर्डर मिस्ट्री: उस रात की सुबह नहीं...


मेरे एक सहयोगी ने खुद को इस केस का नया ख़ुलासेबाज़ दिखाने के फेर में टीवी पर ये दावा भी कर डाला कि नोएडा पुलिस की थ्योरी सही हो सकती है क्य़ोंकि डॉ. राजेश तलवार और नुपूर तलवार के संबंध दिल्ली में उस बड़े हाईप्रोफाइल गैंग से हैं जो दरअसल वाइफ स्वैपिंग करता है। आप अंदाजा लगा सकते हैं उस वक्त क्या हो रहा था। एक 14 साल की लड़की और एक अधेड़ नौकर की मौत को जानकर या यूं कहें अनजाने में (सनसनी फैलाने की सनक) में तमाशा बनाया जा रहा था। मीडिया सवाल तो उठा रहा था लेकिन उसके सवाल इतने उलझे थे कि वो केस को किसी अंजाम तक ले जाने में कोई मदद नहीं कर सकते थे।


मुझे याद है उन दिन टीवी पत्रकारिता में हर वक्त कुछ एक्सक्लूसिव करने की सनक सवार थी। मीडिया में बार बार पीड़ितों की इज्जत का पंचनामा किया जा रहा था, मीडिया एक ज़रा से सुराग पर फैसला सुनाने वाला जज बन बैठा था। मेरे मीडिया के मित्र कह सकते हैं कि आप कैसे मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा सकते हैं ये मीडिया ही था जिसके सवालों के बाद आरुषि-हेमराज हत्याकांड की जांच नोएडा पुलिस से लेकर 1 जून 2008 को सीबीआई को सौंप दी गई थी।


उसके बाद क्या हुआ सभी को पता है सीबीआई की पहली टीम ने मां-बाप की जगह पड़ोस में रहने वाले तीन नौकरों पर हत्यारे होने का शक जताया । कुछ दिन बाद उनकी भी थ्योरी खारिज कर दी गई और सीबीआई की दूसरी टीम ने जांच अपने हाथों में ले ली और एक बार फिर से परिस्थिति-जन्य साक्ष्यों के आधार पर डॉ. राजेश तलवार और डॉ नुपूर तलवार को बेटी और नौकर की हत्या का जिम्मेदार बता दिया। आखिर पुलिस हो या जांच एंजेंसी उन्हें केस को किसी न किसी अंजाम तक तो ले जाना ही था। आज आरुषि की हत्या हुए 9 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन नतीजा सिफर ही है।


मैं पूछना चाहता हूं कि क्या मीडिया उस वक्त केस में सनसनी फैलाने वाली मानसिकता को छोड़कर असली तथ्यों पर गौर करने के लिए पुलिस या जांच एजेंसी को मजबूर नहीं कर सकता था? क्या मीडियाकर्मियों को उस क्रिमिनल केस का स्वंयभू जांच अधिकारी बनने के बजाए जिम्मेदार रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए थी? क्या हत्याकांड में सवाल उठाने के नाम पर आरुषि-हेमराज और आरुषि के माता-पिता के कैरेक्टर को मीडिया ने जाने अनजाने तार तार नहीं किया? मुझे लगता है इस केस से सबक लेकर अब मीडिया और पुलिस को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो जाना चाहिए...इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में साफ साफ कहा गया है कि मम्मी-पापा ने आरुषि को नहीं मारा ...लेकिन यकीन मानिए मीडिया रिपोर्ट्स में तलवार परिवार को बार-बार मारा गया उनके कैरेक्टर को तबाह कर दिया गया। उम्मीद है मीडिया अब सनसनी नहीं फैलाएगा और तलवार परिवार को किसी नए विवाद में नहीं घसीटेगा....