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सर्जिकल स्ट्राइक: अगुआई करने वाले मेजर ने कहा- सबसे मुश्किल था वापस लौटना

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 10 , 2017 , 20:27 IST | नई दिल्ली

सीमा पार स्थित आतंकियों के लॉन्च पैड्स को ध्वस्त करने के लिए भारतीय सेना ने पिछले साल 28-29 सितंबर को सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। दुश्मन के घर में घुसकर उसको तबाह करने की कहानी जितनी रोमांचक है उतनी ही खतरनाक भी। सर्जिकल स्ट्राइक की अगुआई करने वाले मेजर के हवाले से इस ऑपरेशन के बारे में जो बातें सामने आईं हैं वह रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं।

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मेजर के मुताबिक वापस लौटना था मुश्किल

मेजर के मुताबिक हमला बहुत ठीक तरीके से और तेजी के साथ किया गया था, लेकिन अपने लक्ष्य को अंजाम देने के बाद वापस लौटना सबसे मुश्किल था। दुश्मन सैनिकों की गोलियां कानों के पास से निकल रही थीं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक के एक वर्ष पूरा होने पर प्रकाशित किताब में सेना के मेजर ने उस महत्वपूर्ण और चौंका देने वाले मिशन से जुड़े अपने अनुभव को साझा किए हैं।

डिफेंस स्ट्रैटजी की एक किताब से हुआ खुलासा

'इंडियाज मोस्ट फीयरलेस: ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिटरी हीरोज' शीर्षक वाली किताब में अधिकारी को मेजर माइक टैंगो बताया गया है। सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए उड़ी हमले में नुकसान झेलने वाले दो यूनिटों के सैनिकों के इस्तेमाल का निर्णय किया। सेना ने 'घटक टुकड़ी' का गठन किया और उसमें उन दो यूनिटों के सैनिकों को शामिल किया गया, जिन्होंने अपने जवानों को गंवाया था। किताब में कहा गया है कि,

रणनीतिक रूप से यह चालाकी से उठाया गया कदम था। अग्रिम भूमि की जानकारी उनसे बेहतर शायद ही किसी को थी, लेकिन कुछ और भी कारण थे

उसमें साथ ही कहा गया है, उनको मिशन में शामिल करने का मकसद उड़ी हमलों के दोषियों के खात्मे की शुरुआत भी था। मेजर टैंगो को मिशन की अगुआई के लिए चुना गया था।

ऑपरेशन लीड करने वाले मेजर के हाथ में थी 19 जवानों की जान

किताब में कहा गया है, टीम लीडर के रूप में मेजर टैंगो ने सहायक भूमिका के लिए खुद से सभी अधिकारियों और कर्मियों का चयन किया। उन्हें इस बात की अच्छी तरीके से जानकारी थी कि 19 लोगों की जान बहुत हद तक उनके हाथों में थी। इन सबके बावजूद अधिकारियों और कर्मियों की सकुशल वापसी को लेकर मेजर टैंगो थोड़े चिंतित थे। किताब में उनको यह याद करते हुए कोट किया गया है, वहां मुझे लगता था कि मैं जवानों को खो सकता हूं। मेजर ने कहा कि,

वास्तविक हमले से कमांडोज घबराए नहीं थे, लेकिन एलओसी पर चढ़ाई वाले रास्ते को पार करते हुए लौटना बहुत कठिन था। जिस ओर सैनिकों का पीठ था वहां से पाकिस्तानी सैनिक गोलीबारी कर रहे थे। सैनिक उनके टारगेट पर थे।' सर्जिकल स्ट्राइक के लिए आईएसआई द्वारा संचालित और पाकिस्तानी सेना से संरक्षित प्राप्त आंतकियों के 4 लॉन्चिंग पैड्स को चुना गया था

इस तरह ऑपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक को दिया गया अंजाम

किताब में बताया गया है कि मेजर के साथियों ने मास्क्ड कम्यूनिकेशन्ज के जरिए सीमा पार 4 लोगों से संपर्क साधा, जिसमें PoK के 2 स्थानीय ग्रामीण और 2 उस इलाके में सक्रिय पाकिस्तानी नागरिक थे। दोनों गुप्तचर खूंखार आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से थे, जिन्हें कुछ साल पहले भारतीय एजेंसियों ने वापस भेज दिया था।
किताब में बताया गया है कि चारों सूत्रों ने उनको सौंपे गए टारगेट के बारे में अलग-अलग जानकारी की पुष्टि की। इंटेलिजेंस के रूप में एलओसी के इस तरफ आगे और कुछ नहीं था। किताब को शिव अरूर और राहुल सिंह ने लिखा है जिसे पेंग्विन इंडिया ने प्रकाशित किया है। इसमें सर्जिकल स्ट्राइक की 14 सच्ची कहानियों को शामिल किया गया है, जो भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और पराक्रम के बारे में बताती हैं।

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मिशन संक्षिप्त था। सैनिकों को बताया गया था कि वे अपने टारगेट पर पहुंचने के बाद सेटेलाइट डिवासेज से प्राप्त नवीनतम सूचनाओं को देखें और उसके बाद दुश्मनों का सफाया कर दें। इसके लिए हथियारों और उपकरण भी तय कर लिए गए थे। मेजर के लिए 2 टारगेट चिन्हित किए गए थे। टैंगो की टीम PoK में काफी अंदर गई थी और एक-दूसरे से करीब 500 मीटर की दूरी पर थी। किताब में यह भी बताया गया है कि एलओसी पार भेजने से पहले लॉन्चिंग पैड आतंकियों के लिए ट्रांजिट स्टेज होता है। दोनों लॉन्च पैड पाकिस्तानी सेना के पोस्ट के बेहद करीब थे।

40 आतंकी और 2 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए

मेजर के मुताबिक गोलीबारी शुरू और खत्म होने में महज 1 घंटे का समय लगा। आतंकियों को तेजी से मारने के बाद दोनों टीमें एकत्रित हुईं। मारे गए आतंकियों को मोटे तौर पर गिनने के बाद सैनिक वापस लौटे। किताब में बताया गया है कि चारों टारगेट मिलाकर करीब 38-40 आतंकी और 2 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। 3 टीमों ने एकसाथ 4 लॉन्चिंग पैड्स को ध्वस्त किया।

 

 


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