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मध्य प्रदेश कांग्रेस: एक अनार और कई बीमार, कौन लगाएगा नैया पार?

icon रोहित गुप्ता | 0
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| अक्टूबर 11 , 2017 , 18:38 IST | नयी दिल्ली

मध्य प्रदेश कांग्रेस को अच्छे दिनों का इंतजार करते हुए अब 14 साल हो चुके हैं। भगवान श्री राम ने भी 14 साल का वनवास ख़त्म करने के बाद सत्ता की शोभा बढ़ाई थी लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस का यह अनिश्चितकाल वनवास है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। सत्ता पक्ष ( भाजपा ) इसके लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है लेकिन जानकारों का कहना तो कुछ और ही है। देखा जाए तो इस वनवास में ना तो कोई केकई थी और ना ही मध्य प्रदेश कांग्रेस भगवान श्री राम।

कांग्रेस के इस वनवास का कारण खुद कांग्रेस ही है। लगातार 3 चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस अपने अच्छे दिनों का इंतजार कर रही है। जिस मध्य प्रदेश ने कांग्रेस को अर्जुन सिंह , मोतीलाल वोहरा, विद्याचरण शुक्ल , रविशंकर शुक्ल , डीपी मिश्र और माधवराव सिंधिया जैसे बड़े नेता दिए हैं आज वहां कांग्रेस के लिए 15 साल सत्ता से बाहर बैठना शर्मनाक है।

वैसे कांग्रेस की स्थिति मध्य प्रदेश में कभी भी इतनी बुरी नही रही । अगर पिछले 5 चुनावों पर नाजर डालें तो समझ आएगा की कांग्रेस की नैया भाजपा या किसी और ने नही बल्कि खुद कांग्रेस ने ही डुबोई है ।

विधानसभा चुनाव 1993

1993 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संयुक्त मध्य प्रदेश की 230 सीटों में से 174 पर जीत दर्ज की थी। इस सरकार में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री रहे थे ।

विधानसभा चुनाव 1998

इस चुनाव में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत रही और 172 सीटों के साथ कांग्रेस एक बार फिर सत्ता पर काबिज हुई । दिग्गी राजा एक बार फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने ।

(छत्तीसगढ़ बना नया राज्य: 1 नावंबर 2000 को छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग राज्य बना गया । छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें बची । )

विधानसभा चुनाव 2003

उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने मध्य प्रदेश की सत्ता में ज़बरदस्त वापसी की । कांग्रेस जहाँ 130 सीटों के नुक्सान के साथ 38 सीटों पर सिमट गयी वहीं भाजपा 54 सीटों के फायदे साथ सत्ता पर काबिज हुई । कांग्रेस के लिए यह हार काफी शर्मनााक थी । दिग्विजय सिंह ने इस हार के बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा । वोट प्रतिशत पर नजर डाली जाए तो इस चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से महज 5.25% कम था लेकिन सीटों के मामले में 135 सीटों पर कांग्रेस को हार हुई ।

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2003 की जीत के 1 साल के भीतर उमाभारती को इस्तीफ़ा देना पड़ा और सत्ता बाबूलाल गौर के हाथ में चली गयी । बाबूलाल गौर का सत्ता सुख भी ज्यादा दिन का नही था और तकरीबन 1 साल और 3 महीने बाद बाबूलाल गौर को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा । बाबूलाल गौर के बाद सत्ता लालकृष्ण अडवाणी के ख़ास शिवराज सिंह चौहान के हाथ आई । यह समय शिवराज सिंह चौहान का उदय था । जिसके बाद शिवराज सिंह चौहान ने अभी तक सत्ता को अपनाे हाथ से जाने नही दिया ।

विधानसभा चुनाव 2008

2008 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत में ज्यादा अंतर नही देखने को मिला । दोनाों के वोट प्रतिशत में 1% से भी कम वृद्धि हुई । लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस 38 से बढ़कर 71 सीटों पर पहुँच गयी ।

विधानसभा चुनाव 2013 

इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट प्रतिशत में ग़जब का उछाल आया । कांग्रेस का वोट प्रतिशत जहाँ 4% बड़ा वहीँ भाजपा का वोट प्रतिशत 7% बड़ा । इस चुनाव में भी भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 143 सीटों पर जीत दर्ज की, वहीं कांग्रेस को सिर्फ 71 सीटों पर संतुष्ट होने पड़ा ।

कांग्रेस के गिरते ग्राफ़ में जहाँ कई चेहरे देखने को मिले तो वहीं भाजपा के बढ़ते ग्राफ़ के पीछे सिर्फ एक चेहरा चमक रहा था और वो चेहरा था शिवराज सिंह चौहान का ।


2013 का चुनाव हारने बाद भारतीय राजनाीति में एक नया युग आया और यह युग है "मोदी युग" । मोदी युग में कांग्रेस ने एक के बाद एक कई चुनाव हारे.. 2014 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव इस लिस्ट में शामिल है ।



मुद्दे की बात

जो गुज़र गया वो इतिहास है और राजनाीति में हमेशा इतिहास से सीख लेते हुए वर्तमान में मेहनत करनी होती है जिसका फल आपको भविष्य में मिलता है। कांग्रेस भी इतिहास से सीख लेते हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग गई है । मध्य प्रदेश कांग्रेस में आज भी दिग्गज नाेताओं की कमी नही है । कांग्रेस में आज भी ऐसे कई नेता हैं जो कांग्रेस को सत्ता पर काबिज करने का माद्दा रखते हैं।

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एक अनार और कई बीमार।

2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए कांग्रेस के पास ना तो कार्यकर्ताओं की कमी है और ना ही कद्दावर नाेताओं की । व्यापम और सिंहस्थ जैसे घोटालों के बाद कांग्रेस के पास चुनावी मुद्दों की कमी भी नही है। किसान आंदोलन का मुद्दा भी अभी तक गर्म है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतना सब होने के बाद भी कांग्रेस का रास्ता इतना कठिन क्यों है ?

दरअसल कांग्रेस की ताकत ही उसकी कमज़ोरी साबित हो रही है। अनार एक है और बीमार कई बैठे हैं। कांग्रेस में गुटबाज़ी की समस्या किसी से छुपी नही है । कांग्रेस नाेताओं की आपसी होड़ ने ही उसे 15 साल तक सत्ता से बाहर बैठने को मजबूर किया है ।

अनार का इंतजार कर रहे कांग्रेस के बीमार नाेताओं की लिस्ट - 

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दिग्विजय सिंह: कई लोग कांग्रेस के इस लंबे वनवास का कारण पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी मानते हैं। 2003 के बाद एक भी चुनाव ना लड़ने के बाद भी दिग्विजय सिंह का मध्य प्रदेश में मजबूत जनाधार है । प्रशासन पर आज भी दिग्विजय सिंह की पकड़ शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा है। दिग्विजय सिंह इस समय 3500 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा पर निकले हुए हैं। नर्मदा परिक्रमा के दौरान दिग्विजय सिंह 100 से ज्यादा विधानसभा सीट से होकर गुज़रेंगे। जिसका फायदा कांग्रेस पार्टी को 2018 चुनावों में ज़रूर देखने को मिलेगा ।  

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ज्योतिरादित्य सिंधिया: सिंधिया की युवा और बेदाग छवि उनको बाकी सभी नाेताओं से अलग खड़ा करती है। युवा कार्यकर्ताओं में सिंधिया काफी लोकप्रिय हैं। 2018 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के लिए सिंधिया का नााम सबसे ऊपर चल रहा है  

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कमलनााथ: 70 साल की उम्र में भी कमलनाथ की राजनैतिक पकड़ ग़जब की है। वर्तमान लोकसभा में सबसे वरिष्ठ(लंबे समय तक) सांसद कमलनाथ हैं। कमलनाथ छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर आते हैं। कमलनाथ का छिंदवाड़ा आज सबसे ज्यादा विकसित लोकसभा सीटों में आता है। विकास के मुद्दे पर कमलनाथ बाकी सभी नाेताओं को काफी पीछे छोड़ते हुए नजर आते हैं।

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सुरेश पचौरी: पिछले 3 चुनावों में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण ब्राह्मण वोट बैंक का भाजपा की तरफ खिसक जाना है । ऐसे में सुरेश पचौरी को मध्य प्रदेश कांग्रेस में सबसे बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर जाना जाता है। आगामी चुनाव में सुरेश पचौरी को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए काफी महँगा पड़ सकता है ।

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अजय सिंह: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में से एक रहे अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह रीवा और सतना क्षेत्र में काफी अच्छी पकड़ रखते हैं। अजय सिंह इस समय मध्य प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष हैं।

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अरुण यादव: मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव को राहुल गांधी का ख़ास माना जाता है । राहुल गांधी के ख़ास होने और बाकी नाेताओं के आपसी विवाद ने अरुण यादव को प्रदेश अध्यक्ष की गद्दी पर बिठाने में अहम किरदार नािभाया । 

कौन लगाएगा नैया पार ?


जैसे एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती उसी तरह एक नाव पर कई कप्तान सवारी नहीं कर सकते । ऐसे में सबसे बड़ी मुश्किल कप्तान के चयन को लेकर है।

कांग्रेस नेतृत्व का किरदार अहम ।


मौजूदा स्थिति में पासा अब कांग्रेस नेतृत्व मतलब गांधी परिवार के हाथों में है । मुख्यमंत्री उम्मीदवार के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनााथ का नाम मुख्य तौर पर आगे है लेकिन दिग्विजय सिंह की 3500 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा ने मध्य प्रदेश की राजनाीति में सरगर्मी ला दी है। अभी तक यह साफ़ नही हो पाया है कि दिग्विजय सिंह की इस यात्रा का आखिर लक्ष्य क्या है ? क्या दिग्विजय सिंह खुद को मुख्यमंत्री की रेस में शामिल करना चाहते है या फिर वह प्रदेश में कांग्रेस की स्तिथि सुधार रहे हैं।

ऐसे में कांग्रेस को किसी ऐसे नेता को कमान देनी होगी जिसके नाम पर पूरी प्रदेश कांग्रेस एक मत हो सके ।