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संजीव कुमार जयंती: अंधविश्वास के चलते नहीं की शादी, कुंवारे रहकर अकेले ही बिता दी जिंदगी

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 9 , 2018 , 11:22 IST

हिंदी सिनेमा में बहुत से ऐसे किरदार हुए है जो सिनेमा जगत के इतिहास के पन्नों में दर्ज है। फिल्म 'शोले' के दमदार किरदार 'ठाकुर' को कौन भूल सकता है। इस दमदार किरदार का अभिनय करने वाले संजीव कुमार का आज 80वीं जयंती है।

बहुत कम लोगों को पता है कि संजीव कुमार का वास्तविक नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था। उसंजीव कुमार का जन्म मुंबई में 9 जुलाई 1938 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था। इनका पैतृक निवास सूरत था, बाद में इनका परिवार मुंबई आ गया। वह बचपन से ही फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखा करते थे। अपने जीवन के शुरूआती दौर मे रंगमंच से जुड़े और बाद में उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फ़िल्मालय बैनर की फ़िल्म ‘हम हिन्दुस्तानी’ में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला। ये आजीवन कुंवारे रहे और मात्र 47 वर्ष की आयु में साल 1984 में हृदय गति के रुक जाने से उनका निधन हो गया। वे अपने व्यव्हार, विशिष्ट अभिनय शैली के लिए जाने जाते है।

संजीव कुमार ने विवाह नहीं किया, परन्तु प्रेम कई बार किया था। उनको यह अंधविश्वास था कि इनके परिवार में बड़े पुत्र के 10 वर्ष का होने पर पिता की मृत्यु हो जाती है। इनके दादा, पिता, और भाई के साथ यह हो चुका था। संजीव कुमार ने अपने दिवंगत भाई के बेटे को गोद लिया और उसके दस वर्ष का होने पर उनकी मृत्यु हो गई। संजीव कुमार भोजन के बहुत शौकीन थे। बीस वर्ष की आयु में गरीब मध्यम वर्ग के इस युवा ने रंगमच में काम करना शुरू किया। संजीव कुमार ने छोटी भूमिकाओं से कोई परहेज नहीं किया। सितारा हो जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी नखरे नहीं किए।

यह जानना भी दिलचस्प है कि इन्होंने जया बच्चन के ससुर (शोले), प्रेमी (अनामिका), पिता (परिचय), पति (कोशिश) की भूमिकाएं भी निभाई हैं। यह रेंज था संजीव कुमार के अभिनय का! जब लेखक सलीम ख़ान ने इनसे 'त्रिशूल' में अपने समकालीन अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता की भूमिका निभाने का आग्रह किया तो उन्होंने बेझिझक यह भूमिका इस शानदार ढंग से निभाई की उन्हें ही केंद्रीय पात्र मान लिया गया।

संजीव कुमार ने अपनी करियर की शुरुआत 1960 में बनी फ़िल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ में दो मिनट की छोटी-सी भूमिका से की थी। साल 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की निर्मित फ़िल्म 'आरती' के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया, जिसमें वह पास नही हो सके। सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘निशान’ में काम करने का मौका मिला। वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। इस बीच, उन्होंने ‘स्मगलर’, ‘पति-पत्नी’, ‘हुस्न और इश्क’, ‘बादल’, ‘नौनिहाल और गुनहगार’ जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘शिकार’ में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेंद्र पर केंद्रित थी, फिर भी सजीव कुमार धर्मेंद्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘संघर्ष’ में उनके सामने हिंदी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन संजीव कुमार अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों की वाह-वाही लूट ली। इसके बाद ‘आशीर्वाद’, ‘राजा और रंक’, ‘सत्यकाम’ और ‘अनोखी रात’ जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के जरिए संजीव कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुंच गए, जहां वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे।

वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘खिलौना’ की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फ़िल्म ‘दस्तक’ में उनके लाजवाब अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद इनकी हिट फ़िल्म ‘सीता और गीता’ (1972) और ‘मनचली’ (1973) प्रदर्शित हुईं। 70 के दशक में इन्होंने गुलज़ार जैसे निर्देशक के साथ काम किया। इन्होंने गुलजार के साथ कुल 9 फ़िल्में की जिनमे ‘आंधी’ (1975), ‘मौसम’ (1975), ‘अंगूर’ (1982), ‘नमकीन’ (1982) प्रमुख हैं


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